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वीनस केसरी's Blog – December 2014 Archive (1)

ग़ज़ल - गुज़ारिश थी, कि तुम ठोकर न खाना अब

ग़ज़ल श्री गिरिराज भंडारी जी की नज्र ...





गुज़ारिश थी, कि तुम ठोकर न खाना अब

चलो दिल ने, कहा इतना तो माना अब



न काम आया है उनका मुस्कुराना अब

यकीनन चाल तो थी कातिलाना .... अब ?



ये दिल तो उन पे अब फिसला के तब फिसला

ये तय जानो, नहीं इसका ठिकाना अब



जो दानिशवर थे सब नादान ठहरे हैं

ये किसका दर है, तुमको क्या बताना अब

ये मौसम खूबसूरत था ये माना पर

वो आये तो हुआ है शायराना अब …



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Added by वीनस केसरी on December 24, 2014 at 5:00am — 18 Comments

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