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Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s Blog (165)

मैं आज अपने दिल के ज़ज़्बात भर कहूँगा

फ़ाइलातुन मफ़ऊल फ़ाइलातुन

2212 122 2212 122



मैं आज अपने दिल के ज़ज़्बात भर कहूँगा।

तुम पास आज बैठो मैं बात भर कहूँगा।



तुम मुस्कुराके सुनना, मुझे गुनगुनानें देना।

ग़ज़लों में इस हृदय के हालात भर कहूँगा।



ज़ुल्फ़ों के बादलों से ये चाँद झाँकने दो।

तुम चाँदनी बिखेरो मैं रात भर कहूँगा।।



छलका रही हो मदिरा,मयकदे नज़र से।

मधु रस की सिर्फ इसको बरसात भर कहूँगा।।



बेसुध हुआ हूँ ऐसे जैसे कोई शराबी।

मदिरा ए हुश्न की मैं सौगात भर… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on September 29, 2015 at 11:30pm — 14 Comments

तभी हुई है ग़ज़ल ( इस्लाह के लिये)

म'फ़ा'इ'लुन फ़'इ'लातुन म'फ़ा'इ'लुन फ़ा'लुन

1212 1122 1212 112



सजल नयन से नदी उतरी तो हुई है ग़ज़ल।

जो पीर वाली फसल निखरी तो हुई है ग़ज़ल।।



न पूछो मिलती किधर हमको जी प्रेरणा ये कहाँ ।

हंसी प्रियम के अधर बिखरी तो हुई है ग़ज़ल।।



कभी कहीं जो सुवासित हवायें बहनें लगी।

जो रूपसी कहीं सव्री तो हुई है ग़ज़ल।।



कोई पथिक जो चला जीवन की इस कठिन सी डगर।।

किसी के सिर पे पड़ी गठरी तो हुई है ग़ज़ल।।



कहीं पे रिश्ता जो नाता है भंग होता कभी।

जो… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on September 26, 2015 at 12:00am — 14 Comments

आप से इस हृदय का अनुबंध तोड़ा ना गया

2122 2122 2122 212

प्रीत या अनुराग का अनुबंध कब तोड़ा गया।

इस हृदय का आप से सम्बन्ध कब तोड़ा गया।।



तोड़ देता किस तरह से साँस अपनी ही स्वयं।

धड़कनों पर आपका प्रतिबन्ध कब तोड़ा गया।।



तोड़ देता किस तरह से साँस अपनी ही स्वयं।

धड़कनों पर आपका प्रतिबन्ध कब तोडा गया।।



गीत मैं सुर हो तुम्हीं हाँ शब्द मैं सरगम तुम्हीं।।

इस पुरुष का तुझ प्रकृति से बन्ध कब तोड़ा गया।।



राजपथ पर ख़्वाब के हो हमसफ़र बस एक तुम।

तुझसे अरमानों का सब गठबन्ध कब तोड़ा… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on September 23, 2015 at 8:00pm — 12 Comments

इखलास का ईनाम गरल कर के चल दिए

221 2121 1222 212
इखलास के ख़याल गरल कर के चल दिए।
अरमाने दिल तमाम तरल कर के चल दिए।।

शमशीरे ज़फ़ा ऐसे चली दिल के शहर पे
चुन चुन के सारे ख़ाब मसल कर के चल दिए।।

मेरी वफ़ा ए इश्क़ की कीमत तो देखिये।
चैन ओ सुकून में ही ख़लल कर के चल दिए।।

मेरे खुदा ए इश्क़ की रहमत तो देखिये।
सज़दे सलाम सारे विफल कर के चल दिए।।

अपनी भी आदतों को कहाँ हम बदल सके।
उनके करम कलम से ग़ज़ल कर के चल दिए।।

मौलिक अप्रकाशित

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on September 15, 2015 at 3:30pm — 15 Comments

मैं ग़ज़ल लिखूँ चाहे जो बह्र है काफ़िया बस एक तू।।

2121 22 2212 2212 2212

जो निगाहे हाला का है असर वो साक़िया बस एक तू।

मैं ग़ज़ल लिखूँ चाहे जो बह्र है काफ़िया बस एक तू।।



तेरे हुश्न साग़र में ये मेरा मन उतर कर तैरता।

इस मेरे इश्कां की नाव का है नाहिया बस एक तू।।



मेरा मन किसी भी दूजी बगिया में न अब जाता कभी।

मेरी इन निग़ाहों के ख़ाब की है बादिया बस एक तू।।





मेरी सांस हो मेरी आस मेरी धड़कनों की प्यास में।

मेरी ज़िन्दगी का हसीनतम है सानिया बस एक तू।।



तेरे नाम से होती सुबह तेरे नाम से… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on September 15, 2015 at 3:00pm — 5 Comments

जहाँ को अमिय से भिगोने चला हूँ

मयक़श हूँ मैं आज, जीने चला हूँ।

ग़म भर के अपने, सीने चला हूँ।

मैं अंगूरी मदिरा का, आशिक नहीं हूँ।

गरल इस ज़माने के, पीने चला हूँ।।



मन वेदना से, पिघलने लगा है।

नैनों से दरिया, निकलनें लगा है।

कहीं पर भी दिल को, राहत नहीं है।

किसी नाज़नीं की, ये चाहत नहीं है।



जमानें को देने, नगीने चला हूँ।

गरल इस जमानें के, पीने चला हूँ।।



कहीं भूख से, छटपटाता कोई तन।

कभी टीन-छत से, टपकता जो सावन।

किसी आँख में जब, झलकती विवशता।

कोई बाप… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on September 12, 2015 at 2:12pm — 5 Comments

मैं नदिया के पार क्षितिज के पास मिलूँगा

मैं नदिया के पार क्षितिज के पास मिलूंगा।

यादों की फुलवारी में बन सांस मिलूंगा।।



पास नहीं हम दोनों लेकिन सपने तो हैं।

जब सोचोगी मैं बनकर एहसास मिलूंगा।।



काजल की रेखाएं बनकर मैं आँखों में।

घुंघरू की आवाज़ें बनकर मैं पावों में।

प्रथम किरण के संग तेरी अरदास करूंगा।

यादों की फुलवारी में बन सांस मिलूंगा।।



तेज धूप से तुझे बचाता बादल बनकर।

रिमझिम रिमझिम झरता हुआ सा सावन बनकर।

प्रिय तुझसे मैं तो बनकर बरसात मिलूंगा।

यादों की फुलवारी… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on September 12, 2015 at 1:04pm — 2 Comments

है दूर मन्ज़िल घना तिमिर है

121 22 12122 12122 12122



है दूर मन्ज़िल घना तिमिर है कलम की राहें अग़र कठिन हैं।

नहीं थकेंगे कदम हमारे हमारा व्रत भी मगर कठिन है।।



चलो उठाओ तमाम बातें जवाब सारा कलम से होगा।

चले भले ही कदम अभी कम पता है हमको सफ़र कठिन है।।



मना ले जश्नां मज़े उड़ा ले ज़माने फिर भी सलाम तुझको।

सलाम वापस इधर ही होंगे हालाँकि तुमसे समर कठिन है।।



दुआएं उनको जो साथ में हैं दुआ उन्हें भी जो घात पर हैं।

मगर बता दूँ हताश ना कर प्रयास का हर असर कठिन… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on September 11, 2015 at 11:44pm — No Comments

बंजारा

एक मुसाफ़िर नगर नगर में देखो घूमता, है बंजारा।

हर बस्ती की सरहद को बस छूके लौटता, है बंजारा।।  

रमें कहाँ पर बसे कहाँ पर स्थिर खुद को करे कहाँ पर।

डेरा अपना कहाँ जमाये ठौर ढूँढता, है बंजारा।।  

प्यासा प्यासा बादल बरखा को दर दर बस ढूँढ़ रहा है।

पानी पानी अपने जीवन का रस खोजता, है बंजारा।।  

सोच रहा है अपना नसीबा अपने करम से कहाँ बिगाड़ा।

रफ़ के पन्नों जैसी पुस्तक खुद ही बाँचता, है बंजारा।।

 

किस पर क्रोध करेगा…

Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on September 10, 2015 at 5:15am — 7 Comments

तू ग़ज़ल लिखे चाहे जो बह्र, अशआर में वो ज़ुरूर है।।(ग़ज़ल इस्लाह के लिये)

कोई हर्फ़ लब पे न हो भले, इज़हार में वो ज़ुरूर है।

तू ग़ज़ल लिखे चाहे जो बह्र, अशआर में वो ज़ुरूर है।।



ये भी खूब है हाँ खूब है, मुरझा रहे हो तुम यहाँ।

जिस हुश्ने उपवन की तलब, हाँ बहार में वो ज़ुरूर है।।



जो कभी गले से मिला नहीं, सर वो ही शानों पे ढूँढता।

तू गज़ब सितम खुद पर करे, तेरी हार में वो ज़ुरूर है।।



यहाँ रात का पल जल रहा, वहाँ ख़्वाब नैनों में पल रहा।

जो पिघल रहा तेरी आँखों से, मिला प्यार में वो ज़ुरूर है।।



ये खुली पलक दहलीज़ पर, यूँ ही… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on September 8, 2015 at 6:30pm — 16 Comments

जब तक लोभ नहीं त्यागोगे भारत नहीं सुधरने वाला

2 2 22 12122 2212 12222

कुछ भी नारा भले लगा लो, कुछ भी नहीं बदलनें वाला।

जब तक हम खुद ना सुधरेंगे, भारत नहीं सुधरनें वाला।।



मन तो स्वार्थ राग में डूबा, तन को बस आराम सुहाये।

जन जन जब तक नहीं जगेगा, भारत नहीं उबरनें वाला।।



हिन्दू मुस्लिम चिल्लाओ सब, राम रहीम भले गाओ सब।

जब तक लोभ नहीं त्यागोगे, भारत नहीं निखरनें वाला।।



जब तक हिंसा नफरत का, कारोबार प्रगति पर है।

तब तक किसी हाल में अपना, भारत नहीं सम्भलनें वाला।।



सरकारें सब ठीक… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on September 1, 2015 at 4:30pm — 10 Comments

पास आ, आह्वान करता

फासला, मैं अमान करता।
आप का, अवधान करता।।
हो ख़फ़ा, आख़िर भला क्यों।
मान जा, अविगान करता।।। (अविगान= मतैक्य)

रात्रि सा, छाया तिमिर है।
चन्द्र का, अरमान करता।।

भज रहा, तेरी भजन हिय।
देख ना, गुणगान करता।।

सांस का, है क्या भरोसा।
जान जा, मैं बयान करता।।

प्राण ना, मिलने निकल दे।
पास आ, आह्वान करता।।

मौलिक अप्रकाशित

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 31, 2015 at 10:42am — 6 Comments

आज फिर इक सुहागन अभागन हुई

आवरण छोड़ कर तुम चले तो गये, आभरण आज उसका उतारा गया।

आज फिर इक सुहागन अभागन हुई, उसका सिन्दूर धुल के बहाया गया।।  

मयकदे से तुम्हारी लगन क्या लगी, देख ले ना गृहस्थी अगन में जली।

आचरण के असर से भले तुम गये, एक दुल्हन को बेवा बनाया गया।।  

कल्पना से परे चेतना से परे, जाने संसार में कौन से तुम गये।

हे भ्रमर किस सफर पर चले तुम गये, रंग तेरे सुमन का मिटाया गया।।  

कितने संताप आँखों के रस्ते बहे, कितने सपने सुलग कर भशम हो…

Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 29, 2015 at 11:58pm — 7 Comments

खुद को प्रांजल कैसे लिख दूँ

खुद को शुद्ध नहीं कर पाया, तुझ को कश्मल कैसे लिख दूँ।

मन पर पाप का बादल छाया, खुद को निर्मल कैसे लिख दूँ।।



प्रतिपल भजन लोभ के गाऊँ, हर पल स्वार्थ साधना चाहूँ।

लोभ का दमन नहीं कर पाया, खुद को निश्छल कैसे लिख दूँ।।



भ्रम की पर्त चढ़ी है नैन, कटती नहीं कठिन ये रैन।

तिमिर को दूर नहीं कर पाया, आत्मा उज्जवल कैसे लिख दूँ।।



चलता जाता मैं प्रतिदिन, पकड़नें अपना ही प्रतिबिम्ब।

अब तक प्राप्त नहीं कर पाया, खुद को निश्चल कैसे लिख दूँ।।



कण्ठ तक आ… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 27, 2015 at 9:56pm — 10 Comments

बाल श्रमिक (कविता)

हरिया का बेटा हरिलाल

उम्र यही कुछ आठ साल

पढ़ता था तीसरी कक्षा में

आता था प्रथम प्रत्येक साल।।



बापू ने लगा दिया उसको

पास ही के इक भट्ठे पर

भरी जीवन का कुछ बोझा

लाद दिया उसके सर पर।।



वह बालक जिसकी उम्र यही

पढ़ लिख कर कुछ बननें की थी

जिसके जीवन की गिनती

मात्र अभी थी शुरू हुई।।



वह हाथ लिए फरसा झौव्वा

अब नित्य काम पर जाता था

बदले में रोटी की ख़ातिर

कुछ कमा धमा कर लाता था।।



समझाया मैंने हरिया… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 25, 2015 at 9:57pm — 5 Comments

हम भी दबंग हैं, दमदार किसम के

221 122 221 122



एक नए किस्म की- नए प्रयोग वाली ग़ज़ल

=======================================

मुस्कान दिखा के, बे-हाल बना के।

होंठों की लकीरों, का जाल बिछा के।।



यूँ आँख मिला के, जो तीर चलाया।

आया हूँ मैं जाना, दरख्वास्त लिखा के।।



जाओ न ज़रा तुम, जाओगे कहाँ अब।

दीवाने दरोगा, की नींद उड़ा के।।



संगीन दफ़ा है, चालान करेंगे।

करना है हवाले, तुमको वफ़ा के।।



तुम्हें प्रेम पाश में, गिरफ्तार करेंगे।

हम भी दबंग हैं, दमदार… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 23, 2015 at 11:30am — 13 Comments

होश खोने की तलब है और मयखाना वहाँ

होश खोने की तलब है और मयखाना वहाँ।

है असम्भव आदतों को छोड़ दे पाना यहाँ।।



किस तरह तन्हा गुज़ारें ज़िंदगी का ये सफ़र।

नींद आँखों में नहीं कैसे हो सो जाना यहाँ।।



राह सुनी ही रही अब तक निगाहें हैं खुली।

आज भी हासिल रहा उनका नहीं आना यहाँ।।



चैन का आलम न पूछें नब्ज़ में तूफ़ान है।

है कठिन बरसात के मौसम को रुकवाना यहाँ।।



हसरतों की नाव सागर के हवाले छोड़ना।

एक मांझी की ख़ता मुश्किल है बतलाना यहाँ।।



कोई उनको बोलिये नैनों के सागर के… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 23, 2015 at 11:30am — 13 Comments

हम "पत्थर" भी पूजे जाते

आ जाते इक बार अगर जो

तुम हमको भी चूमे जाते।

कई शिलाएं देव हुई हैं

हम "पत्थर" भी पूजे जाते।।



राहों में बेजान पड़े हैं

अपनी गति को ढूंढ रहे हैं।

कभी इधर तो कभी उधर को

राहों में बस घूम रहे हैं।।



अपने सुर्ख गुलाबी वाले

मुझमें रंग जो भरके जाते।

कई शिलाएं देव हुई हैं

हम "पत्थर" भी पूजे जाते।।1।।



ये तन है पर प्राण नहीं है

सांस का कुछ भी पता नहीं है।

दिल तो है पर शांत बहुत है

जीवित हूँ यह एक भ्रान्ति… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 21, 2015 at 10:06pm — 15 Comments

बहुत ज़रूरी है

तेरी आँखों की पलकों का, उठना बहुत ज़रूरी है।

इस चेहरे पर प्रेम पत्र है, पढना बहुत ज़रूरी है।।



कितनें सपनें इन आँखों नें, बुन रक्खे हैं तेरे लिए।

इन आँखों का हर इक पन्ना, खुलना बहुत ज़रूरी है।।



इस सीनें में जो इक दिल है, सरगम कोई सुनाता है।

धड़कन की इस मधुर राग को, सुनना बहुत ज़रूरी है।।



मेरे अधरों पर सदियों की, प्यास नें रेखाएं खींची हैं।

मधु सिंचन कर रेखाओं का, मिटना बहुत ज़रूरी है।।



इस बस्ती का घना अँधेरा, अपने चाँद को ढूंढ रहा… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 21, 2015 at 7:27pm — 11 Comments

सकल धरा पर तेरे रूप का ग्रन्थ लिखूँ

जितनी सुन्दर तुम हो उतने, सुंदर सुंदर छन्द लिखूँ।

जी करता है सकल धरा पर, तेरे रूप का ग्रन्थ लिखूँ ।।



झुकी निगाहें बिखरे गेसू, मन का मौसम सरस हुआ।

जी करता बस देखूँ देखूँ, तेरी छवि का दरश हुआ।।



रिमझिम बरस रहे सावन की, शीतल शीतल बूँद लिखूँ।

जी करता है सकल धरा पर, तेरे रूप का ग्रन्थ लिखूँ।।1।।



टपक रहीं बालों से बूँदें, धुली हुई इक पुष्पलता सी।

खुले अधर पर ठहरी बूँदें, जगी अभीप्सा यहाँ ख़ता की।।



बेसुध कर दे मन को पल में, ऐसी तुझे सुगंध… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 15, 2015 at 11:24am — 10 Comments

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