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दिनेश कुमार's Blog – September 2015 Archive (3)

ग़ज़ल -- आईना बना ले मुझको .... दिनेश कुमार

2122-1122-1122-22



अहले महफ़िल की निग़ाहों से छुपा ले मुझको

मैं तेरा ख़्वाब हूँ आँखों में बसा ले मुझको



अपनी मंज़िल पे यकीनन मैं पहुंच जाऊँगा

कोई बस राहनुमाओं से बचा ले मुझको



रात कटती है न अब दिन ही मेरा तेरे बग़ैर

मेरी आवारगी नेजे पे उछाले मुझको



सबके दुखदर्द में जब मैंने मसीहाई की

इस ग़मे जाँ में कोई क्यूँ न सँभाले मुझको



शख़्सियत तेरी सँवारूंगा ये वादा है मिरा

अपनी तक़दीर का आईना बना ले मुझको



दिल के दरिया में… Continue

Added by दिनेश कुमार on September 15, 2015 at 4:30pm — 11 Comments

ग़ज़ल -- कोई रास्ता मिले ...( बराए इस्लाह ) .... दिनेश कुमार

221-2121-1221-212



मंज़िल मिले न मुझको कोई रास्ता मिले

सहरा-ए-ज़िन्दगी में फ़क़त नक्शे पा मिले



मरने से भी ग़ुरेज़ न मुझ जैसे रिन्द को

लेकिन ये हो कि मर के मुझे मयकदा मिले



क़ैद-ए-नफ़स से रूह जो आज़ाद हो मिरी

फिर उसको पैरहन न कोई दूसरा मिले



बेचैन हूँ मैं गर्मी-ए-अहसास-ए-हिज्र से

अब तो तुम्हारे प्यार की ताज़ा हवा मिले



पुरपेंच पुरख़तर है ये जीवन की रहगुज़र

अच्छा हो रहनुमा जो अगर आप सा मिले



तूफाँ की ज़द में आ गयी कश्ती… Continue

Added by दिनेश कुमार on September 8, 2015 at 4:38pm — 18 Comments

ग़ज़ल -- कौन है यह रूबरू.... दिनेश कुमार

2122-2122-2122-212



वक़्त के गुज़रे हुए लम्हात की तफ़्सीर है

मेरी हस्ती मेरी माँ के ख़्वाब की ताबीर है



मुझको दुनिया भर की दौलत से नहीं कुछ वास्ता

मेरे क़दमों में पड़ी अलफ़ाज़ की जागीर है



आइना देखा जो बरसों बाद, मैं हैरान हूँ

कौन है यह रूबरू, किस शख़्स की तस्वीर है



अहले महफ़िल के लिए बेशक मआनी और हो

शाइरी मेरे ग़मों की पुरख़लिश तहरीर है



नित नई परवाज़ केवल ख़्वाब ही रह जाएगा

इन परिन्दों को बताओ बुज़दिली ज़ंजीर है



भूख… Continue

Added by दिनेश कुमार on September 4, 2015 at 7:00am — 7 Comments

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