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November 2016 Blog Posts (119)

डबडबाई आँखें

कभी हँसते कभी रोते समय की कानों में आहट

अरमानों की उतरती-चढ़ती लम्बी परछाइयाँ

आकारहीन अँधेरे में अंधों की तरह

अभी भी हम एक-दूसरे को खोजते हैं

इस खोज में तेरे आँसुओं ने मुझको

बहुत दिया

इतना दिया कि मुझसे आज तक 

झेला नहीं गया

काँपती परछाइयों में तुम आई, हर बार

मन का पलस्तर उखड़ गया

स्वर तुम्हारे, कभी स्वर मेरे रुंधे हुए

खोखले हुए

तुमको, कभी मुझको सुनाई न दिए

पर सुन लेती हैं…

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Added by vijay nikore on November 15, 2016 at 3:08pm — 10 Comments

इस घर से .... (200 वीं प्रस्तुति )

इस घर से .... (200 वीं प्रस्तुति )

कितना
इठलाती थी
शोर मचाती थी
मोहल्ले की
नींद उड़ाती थी

आज
उदास है
स्पर्श को
बेताब है
आहटें

शून्य हैं


अपनी शून्यता के साथ
एक विधवा से
अहसासों को समेटे
झूल रही है
दरवाज़े पर
अकेली
सांकल

शायद
इस घर से
इस घर को
घर बनाने वाला
चला गया है
इक
बज़ुर्ग


सुशील सरना
मौलिक एवम अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on November 15, 2016 at 1:39pm — 14 Comments

ग़ज़ल

1222 1222 1222 1222



तेरे जलवे से वाकिफ हूँ तेरा दीदार करता हूँ ।

मुहब्बत मैं तुझे सज़दा यहां सौ बार करता हूँ ।।



नज़र बहकी फिजाओं में अदाएं भी हुई कमसिन ।

बड़ी मशहूर हस्ती हो नया इकरार करता हूँ ।।



न जाने कौन सी मिट्टी खुदा ने फिर तराशा है ।

है कारीगर बड़ा बेहतर बहुत ऐतबार करता हूँ ।।



नई आबो हवा में वो कली खिल जायेगी यारों ।

गुलाबी रोशनाई से लिखा रुख़सार करता हूँ ।।



यहां बेदर्द ख्वाहिश है वहां कातिल निगाहें हैं ।

बड़ी…

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Added by Naveen Mani Tripathi on November 15, 2016 at 2:00am — 5 Comments

दर्द लिखता था मैं अपना और तराना बन गया

2122   2122   2122   212

 

दर्द लिखता था मैं अपना और तराना बन गया|

इस तरह लिखने का देखो इक बहाना बन गया|

मैं परिंदा था अकेला मस्त रहता था यहाँ

एक दिन नज़रों का उनकी मैं निशाना बन गया |

 

है बड़ा कमजर्फ वो भी देखिये इस दौर में ,

डालकर हमको कफस में ख़ुद सयाना बन गया|

 

दासतां मत पूछिये हमसे हमारे प्यार की

काम उनका रूठना अपना मनाना बन गया|

 

जिंदगी की राह में मैं भी अकेला था मगर,

हमसफ़र…

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Added by BAIJNATH SHARMA'MINTU' on November 14, 2016 at 10:00pm — 10 Comments

बेपर्दा ....



बेपर्दा ....

तमाम शब्

अधूरी सी

इक नींद

ज़हन की

अंगड़ाई में

छुपाये रहती हूँ

इक *मौहूम सी

मुस्कान

लबों पे

थिरकती रहती है

सुर्ख रूख़सारों पे

ज़िंदा है

वो तारीकी की ओट में लिया

इक गर्म अहसास का

नर्म बोसा

डर लगता है

सहर की शरर

मेरी हया को

बेपर्दा न कर दे

जिसे छुपाया

अपनी साँसों से भी

कहीं ज़माने को

वो

ख़बर न कर…

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Added by Sushil Sarna on November 14, 2016 at 3:30pm — 6 Comments

शर्म हमको मगर नही आती

“शर्म नहीं आती ?”

“शर्म क्यों आयेगी… ?” वह बोला- “अपने पैसे से पीता हूं । भीख नहीं मांगता । मुझे क्यों शर्म आयेगी ?“

मैने भिखारी से कहा- “हट्टे कट्टे होकर भीख मांगते हो शर्म नहीं आती ?”

“शर्म क्यों आयेगी भीख मांगता हूं , कोयी चोरी तो नही करता । शर्म तो चोर को आनी चाहिये ।“

मै चोर के पास गया ।

“शर्म नहीं आती ?” मैने कहा ।

“क्यों भाई ? मुझे शर्म क्यों आयेगी ? कोई मुफ़्त मे करता हूं… निछावर देना पड़ता है । कहां से दूंगा ? धंधा है भाई , कमाऊंगा नही तो…

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Added by Mirza Hafiz Baig on November 14, 2016 at 11:28am — 3 Comments

दिवाली

अँधेरे को चीर कर ज्वाला

चमक रही है दीप-माला

नज़र उठाके दखो झोपडी, महल के पीछे वाली

कहो, झोपडी में कैसे मने दिवाली |…

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Added by Kalipad Prasad Mandal on November 13, 2016 at 3:30pm — 1 Comment

गजल(अगर हो नागवारी....)

1222 1222 1222 1222

अगर हो नागवारी तो भुलाना भी जरूरी है

भले कुछ हो हमारा पास आना भी जरूरी है।1



बटोरे थे बहुत धन अबतलक कुछ इस कदर मैंने

पचाना हो गया मुश्किल बताना भी जरूरी है। 2



चुने मैंने महज चमचे बदलने को पुराने सब

असीमित नोट हैं अब तो गिनाना भी जरूरी है।3



पड़े छापे बहुत अबतक पड़ेंगे और भी कितने

अगर हों साथ कुछ अपने दिखाना भी जरूरी है।4



पकड़ में आ न जाये धन सँजोया वक्त गाढ़े का

जलाना या बहा गंगा नहाना भी जरूरी… Continue

Added by Manan Kumar singh on November 13, 2016 at 12:56pm — 2 Comments

माला

माला

छल, कपट ,धोखे के मोतियों
की माला ही पहना दो ।
इसे पहनकर एहसास ही
कर लूँगी ।
अपने दिल के करीब भी
रख लूँगी ।
सज जाऊँगी पूर्णतः ।
दर्द शायद कम हो जाये तुम्हारा
जीत का जश्न
फिर तुम मना लेना ।
आऊँगी संग तुम्हारे
उसी माला को पहन
रहूँगी साथ तब भी ।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on November 13, 2016 at 9:52am — 2 Comments

क्या गरज़ है कि अपाहिज के लिए तुम रूक्को----ग़ज़ल

2122 1122 1122 22

क्या गरज़ है कि अपाहिज के लिए तुम भी रुको
अपनी रफ़्तार की तेजी को न यूँ दफ़नाओ

ग़र तुम्हें साथ में चलने में परेशानी है
राह में छोड़ के आगे भी निकल सकते हो

अपने अंदाज़ में चलने का चलन ही है यहाँ
न मना ही है किया और न टोका तुमको

तुम चलो मैं भी मिलूँगा जी वहीँ मंज़िल पर
जाके खरगोश व कछुए की कथा फिर से पढ़ो

राह में रात भी होगी तो किधर जाओगे
मेरी ग़ज़लों की ये सौगात उजाले ले लो


मौलिक अप्रकाशित

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on November 13, 2016 at 7:00am — 3 Comments

आज भी रोती है वह नदी

रात के सन्नाटे में

कहते हैं

आज भी रोती है वह नदी

 

जिन्होंने भारत में

पूर्व से पश्चिम की ओर

ऊंचाइयों पर

पथरीले कगारों के बीच से

बहती उस एक मात्र पावन चिर-कुमारिका

नदी का आर्तनाद कभी सुना है

 

जिन्होंने की है कभी उसकी

दारुण परिक्रमा

जो विश्व में

केवल इसी एक नदी की होती है ,

हुयी है और आगे होगी भी

 

वे विश्वास से कहते है -

‘इस नदी में नहीं सुनायी देती

रात में…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 12, 2016 at 8:00pm — 11 Comments

गज़ल (12122-12122)

गज़ल (12122-12122)

हमें मुहब्बत जतानी होगी
ये दिल की लब तक तो लानी होगी॥
दीवार चुप की गिरानी होगी
कि बात कुछ तो बनानी होगी॥
जो फेंक डाली है तूने बोतल
तो आँख से अब पिलानी होगी॥
शराब भी तो है इश्क जैसी
चढ़ेगी जितनी पुरानी होगी॥
जो चाहता है धुआँ न उठ्ठे
तो आग ज़्यादा बढ़ानी होगी॥
तू हँस के चाहे निभा ले रो के
तुझे मुहब्बत निभानी होगी॥
जुबान चुप है,है आँख पत्थर
ज़ुरूर दिल में विरानी होगी॥
(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by Gurpreet Singh jammu on November 12, 2016 at 7:30pm — 2 Comments

बोलते नोट (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"नहीं भाई, ग़लती पर तुम हो, यह औरत नहीं!" दुकान में खड़े शिक्षक ने दुकानदार से कहा- "ऐसे समय में जबकि लोग राष्ट्रीय मुद्रा के पुराने अमान्य नोटों को सरकारी आदेशानुसार बैंक में जमा करने के बजाय जलाकर या फेंक कर मुद्रा का अपमान कर रहे हैं, इस औरत ने दस रुपये के इस ज़रा से फटे नोट की अपनी सुविधा व सूझबूझ से रक्षा ही की है पन्नी (पोलीथिन पाउच) में रखकर! नम्बर व ज़रूरी चीज़ें तो स्पष्ट हैं न इस नोट में! यह नोट तुम्हें स्वीकार करना चाहिए न!"



"मासाब, एक बार की बात नहीं, ये लोग तो हमेशा ही… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on November 12, 2016 at 6:55pm — 6 Comments

सर्द हवा (कविता)

सर्द हवा

इन सर्द हवाओं में
घुली हुई हैं यादें
वो वादियाँ पहाड़ों की
बर्फीली चादर ओढ़े
चले थे कभी
कदम दो कदम
साथ हुई थीं
बर्फीली नदी के धार
ठंडे पानी में
नहाने की ज़िद्द
छोटे छोटे कंकड़ पत्थर
रंग बी रंगी किनारे पर
चमकते थे
श्वेत पानी के बीच ।
उस पर से प्यार का एहसास
तुम्हारे करीब होने का आभास
याद आते है
सर्द हवा के झोंके
आज भी ।
लगता है करीब हो
तुम आज भी ।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on November 12, 2016 at 3:00pm — 6 Comments

ग़ज़ल (उदास रात के साये में ख़्वाब पहने हुए)

उदास रात के साये में ख़्वाब पहने हुए 

निकल पड़ा है मुसाफ़िर अज़ाब पहने हुए

डरा सकेगी नहीं जुगनुओं को तारीकी 

निकल पड़े हैं वो तो आफ़ताब पहने हुए

नज़र-नज़र से मिली और खा गये धोक़ा 

वो दिलफ़रेब मिली थी नक़ाब पहने हुए

यहाँ उदास मैं भी हूँ, वहाँ उदास वो भी है 

बहार भी है ख़िज़ां के गुलाब पहने हुए

लो आ गया मिरा महबूब फिर ख़्यालों में 

''सितारे ओढ़े हुए माहताब पहने हुए''

मौलिक व…

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Added by दीपक कुमार on November 12, 2016 at 9:30am — 4 Comments

मास्टर स्ट्रोक--



मौसम तो कमोबेश वही था लेकिन घर का माहौल कुछ बदला बदला सा लग रहा था| ऑफिस से घर आने में लगभग एक घंटा लग जाता था इसलिए इस एक घंटे में देश दुनियां में क्या हुआ, इसका पता शर्माजी को घर पहुँचने पर ही लगता था| लेकिन घर पहुँचते ही टी वी खोलने का मतलब शेर के मुंह में हाथ डालना होता था| शर्माजी का घर पहुँचने का समय वैसे ही कुछ ऐसा था कि श्रीमतीजी का दिमाग चढ़ा ही रहता था और उसपर कहीं गलती से पहुँचते ही टी वी खोल दिया तो फिर पता नहीं क्या क्या सुनना पड़ जाता था| उस दिन भी ऐसा ही कुछ हुआ, घर पहुँचते…

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Added by विनय कुमार on November 11, 2016 at 10:24pm — 4 Comments

ज़िन्दगी (कविता)

ज़िन्दगी

सोचा थोडा खेल लें
ज़िन्दगी मिली है
सो थोडा खेल लें
समय चलेगा अपनी चाल
समय के मोहरे बन
थोडा खेल लें ।
कभी पहाड़ों पर
चढ़ जाएँ
कभी बादलों पर घूम आयें
कभी मिटटी के बुत बन जाएँ
कभी माली बन
बगवान सवाँर ले।
कभी महके गुलाब की तरह
कभी काँटा बन चुभ जाएँ ।
ज़िन्दगी है
तो खेल है
खेलते रहे खिलाड़ी बन
ज़िन्दगी शायद ज़ी जाएँ ।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on November 11, 2016 at 9:30pm — 2 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
एक सामयिक ग़ज़ल - अरुण कुमार निगम

एक सामयिक ग़ज़ल.....

(१२२ १२२ १२२ १२)

समाचार आया नए नोट का

गिरा भाव अंजीर-अखरोट का |

 

दवा हो गई बंद जिस रात से

हुआ इल्म फौरन उन्हें चोट का |

 

मुखौटों में नीयत नहीं छुप सकी

सभी को पता चल गया खोट का |

 

जमानत के लाले उन्हें पड़ गए

भरोसा सदा था जिन्हें वोट का |

 

नवम्बर महीना बना जनवरी

उड़ा रंग नायाब-से कोट का |

 

मकां काँच के हो गए हैं अरुण

नहीं आसरा रह गया ओट का…

Continue

Added by अरुण कुमार निगम on November 11, 2016 at 4:30pm — 4 Comments

यार गर फिर बावफ़ा हो जाएगा(ग़ज़ल)/सतविन्द्र कुमार राणा

बह्र2122 2122 212



यार गर फिर बावफ़ा हो जाएगा

प्यार मेरा फिर हरा हो जाएगा।



साथ मिल कोशिश करें सब ही सही

तो जहाँ फिर खुशनुमा हो जाएगा।



हाँ पकड़ कर बह्र को गर तुम चलो

तो गजल कहना भला हो जाएगा।



हो अकेले में जरा गर हौंसला

फिर तो पीछे काफिला हो जाएगा।



हो सही हिम्मत खुदी में दोस्तो

साथ में फिर तो खुदा हो जाएगा।



साथ रहकर बात हमदम से करो

छोड़ते ही बेवफ़ा हो जाएगा।



कुछ मुहब्बत जो करें कुदरत से…

Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on November 10, 2016 at 1:30pm — 4 Comments

गजल( होते-होते कुछ हो जाता)

22 22 22 22

*********************

होते-होते कुछ हो जाता

वक्त सभी का मोल बताता।1



गाढ़े का जोड़ा धन धुँधला

बेसाबुन कोई धो जाता।2



हँसते रहते गाँधी बाबा

झुँझलाता कोई रिसिआता।3



रोते-मरते धन्ना कितने

चाय पिला चँदुआ मुसुकाता।4



नोट बड़े सब शून्य हुए हैं

छोटा लल्ला है इठलाता।5



चैन लुटा कितनों के घर का

काला धन कुछ बाहर आता।6



पीट रहे सब खूब लकीरें

वेग समय का बदला जाता।7



सोना दूभर करता… Continue

Added by Manan Kumar singh on November 10, 2016 at 11:54am — 4 Comments

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