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April 2020 Blog Posts (88)

ग़ज़ल 2122 1212 22

इश्क़ हो या कि हादसा कोई
सब का होता है कायदा कोई

वो पुराने ज़माने कि बात हैं
अब नहीं करता हैं वफ़ा कोई

ज़िन्दगी के जद्दोजहद अपने
मौत का हैं न फ़लसफ़ा कोई

सब यहाँ बे अदब हैं मेरी जां
अब करे क्या मुलाहिज़ा कोई

दिल का हैं टूटने का ग़म 'नाहक'
था सलामत मुआहिदा कोई


मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by dandpani nahak on April 9, 2020 at 2:17am — No Comments

ग़ज़ल मनोज अहसास

2×15

एक ताज़ा ग़ज़ल

मैं अक्सर पूछा करता हूँ कमरे की दीवारों से,

रातें कैसे दिखती होंगी अब तेरे चौबारों से.

सौंप के मेरे हाथों में ये दुनिया भर का पागलपन,

चुपके चुपके झाँक रहा है वो मेरे अशआरों से.

नफरत ,धोखा ,झूठे वादें और सियासत के सिक्के,

कितने लोगों को लूटा है तूने इन हथियारों से.

प्यार, सियासत, धोखेबाजी और विधाता की माया,

मानव जीवन घिरा हुआ है दुनिया में इन चारों से.

घोर अंधेरा करके घर में…

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Added by Manoj kumar Ahsaas on April 8, 2020 at 12:04am — No Comments

ग़ज़ल: अमर नाथ झा

चाहते हो तुम मिटाना नफ़रतों का गर अँधेरा

हाथ में ले लो किताबें जल्द आएगा सवेरा

है जहालत का कुआँ गहरा बहुत मत डूबना तू

लोग हों खुशहाल गुरबत ख़त्म हो ये काम तेरा

ज़ह्र भी अमृत बने जो प्यार की ठंढी छुअन हो

नाचती नागिन है बेसुध जब सुनाता धुन सपेरा

गुफ़्तगू के चंद लमहों ने बदल दी ज़िंदगी अब

बन गया सूखा शजर फिर से परिन्दों का बसेरा

आग का मेरा बदन मैं आँख में सिमटा धुआँ हूँ

इश्क़ में अब बन गया सुख चैन का ख़ुद मैं…

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Added by Amar Pankaj (Dr Amar Nath Jha) on April 7, 2020 at 9:00pm — No Comments

क्षणिकाएँ :

क्षणिकाएँ :

थरथराता रहा

एक अश्क

आँखों की मुंडेर पर

खंडित हुए स्पर्शों की

पुनरावृति की

प्रतीक्षा में



बहुत सहेजा

अंतस के बिम्बों को

अंतर् कंदरा में

जाने

किस बिम्ब के प्रहार से

बह निकला

आँखों के

स्मृति कलश से

गुजरे पलों का सैलाब

तुम्हें

पता ही नहीं चला

तुम जन्मों से

कर रहे हो

वरण

सिर्फ़

मृत्यु का

हर कदम से पहले

हर कदम के बाद

सुशील सरना…

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Added by Sushil Sarna on April 7, 2020 at 7:23pm — 1 Comment

"विश्व स्वास्थ्य दिवस" पर एक मुक्तक

विश्व स्वास्थ्य दिवस" पर एक मुक्तक
*****************************

सर्वे भवन्तु सुखिनः की आज करें मिल प्रार्थना
स्वास्थ्य दिवस की आज है बस यह शुभकामना
कोई भूखा न रहे और न कोई अस्वस्थ
विश्व शांति की जाग उठे सब में शुद्ध भावना

------ मौलिक व अप्रकाशित

Added by Dr Vandana Misra on April 7, 2020 at 1:36pm — No Comments

संकट इस वसुंधरा पर है...

विश्व आपदा में ईश्वर से प्रार्थना

हे मनुष्यता के पृतिपालक हे प्रति पालक हे मनुष्यता

क्या भूल हुई क्या गलती है अब क्षमा करो हे परमपिता।

अब राह दिखाओ दुनिया को मुश्किल सबकी आसान करो

हे कायनात के संचालक सारे जग का कल्याण करो।

ये कैसी विपदा है भगवन कैसा ये शोर धरा पर है

जो सदियों से जीवित है अब संकट उस परम्परा पर है।

जग त्राहि माम कर बैठा है नेतृत्व विफल है प्राणनाथ

शाखों के परिंदों को अपने इन्द्रियातीत मत कर…

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Added by atul kushwah on April 6, 2020 at 10:30pm — No Comments

एक ग़ज़ल

आज आंखें नम हुईंं तो क्या हुआ

रो न पाए हम कभी अर्सा हुआ



आपबीती क्या सुनाऊंगा उसे

आज भी तो है गला बैठा हुआ



ढूंढता हूँ इक सितारे को यहाँ

दूर तक है आसमां फैला हुआ



क्यों  क़रीने से रखें सामान को

घर को रहने दीजिये बिखरा हुआ



नींद  पलकों  पर  कहीं ठहरी हुई

ख़्वाब आंखों में वहीं सहमा हुआ



जी  रहा  हूँ  बस  इसी उम्मीद से

लौट  आएगा  समय  बीता हुआ



हादसे  ऐसे   भी  तो   होते   रहे…

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Added by सालिक गणवीर on April 6, 2020 at 8:29pm — 4 Comments

ग़ज़ल (अन्दाज़ ए नज़र )

रौशनी दिल में नहीं हो तो ख़तर बनता है,

आग सीने में लगी  हो तो शरर  बनता है।

जिसको ढाला न गया हो किसी भी साँचे में, 

इब्ने आदम यूं ही हरगिज़ न बशर बनता है। 

टूट  जाते  हैं कई  रिश्ते  ग़लत  फ़हमी  से,

रंजिशें ख़ुद ही भुला दे जो, बशर बनता है।

बात जो निकली ज़बां से न वो फिर रुकती है,

राज़  हो जाए  अ़यां  गर, तो ज़ह'र  बनता है।

अदबियत जिसको विरासत में ही मिल जाती हो,

तब कहीं  जा के  'अ़ली'  कोई  'जिगर'…

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Added by अमीरुद्दीन 'अमीर' on April 6, 2020 at 6:26pm — 5 Comments

इक देश बनाएं सपनों का

सुख-दुख में साथ निभाएं अपनों का |

आओ, इक देश बनाएं सपनों का ||

फसलों पर, ना मौसम की मार पड़े |

कृषि हो उन्नत, ना हों परिवार बड़े |

घर-घर नलका, बिजली, शौचालय हो |

गाँव-गाँव रुग्णालय, विद्यालय हो |

तजि कुरीति, संग धरें नव चलनों का |

आओ, इक गांव बसाएं सपनों का ||

जन-जन को, उपयुक्त रोजगार मिले |

जीवन को, सुरभित स्वच्छ बयार मिले |

सुलभ निवास, सुविधाजनक प्रवास हो |

धवल सादगी का बिखरा प्रकाश हो |

फीकी जो करे चमक, नव…

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Added by Dharmendra Kumar Yadav on April 6, 2020 at 4:00pm — 4 Comments


मुख्य प्रबंधक
अतुकांत कविता : निर्लज्ज (गणेश बाग़ी)

अतुकांत कविता : निर्लज्ज

=================

उसने कहा,

मेरे पास गाड़ी है, बंगला है

बैंक बैलेंस है

तुम्हारे पास क्या है ?

मैने कहा,

मेरे पास हैं...

फेसबुकिये दोस्त

जो नियमित भेजते रहते हैं

गुड मॉर्निंग, गुड इवनिंग,

गुड नाईट, स्वीट ड्रीम वाले संदेश

उसने कहा,

मूर्ख हो तुम

निपट अज्ञानी हो

मैंने कहा,

हाँ, हो सकता है मैं हूँ

किंतु...

सक्रिय हो जाती है छठी इंद्रीय

जब…

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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 6, 2020 at 12:30pm — 2 Comments

जुबान इतनी तेरी दोस्त आतिशीं मत रख (८१ )

(1212 1122 1212 22 /112 )

जुबान इतनी तेरी दोस्त आतिशीं मत रख

कि जिसमें मार* पले ऐसी आस्तीं मत रख (*सॉंप )

**

मैं तज़र्बें की बिना पर ये बात कहता हूँ

बहुत दिनों के लिए कोई दिलनशीं मत रख

**

सजाने ज़ुल्फ़ को कुछ देर यासमीं काफ़ी

तवील वक़्त की ख़ातिर तू यासमीं*मत रख 

**

फिसलते दस्त हैं जब हमकिनार करता हूँ 

क़बा पहन के नई यार रेशमीं मत रख

**…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on April 5, 2020 at 5:30pm — 2 Comments

मीठे दोहे :

मीठे दोहे :

चौखट से बाहर नहीं, रखना अपने पाँव।

घर के अंदर स्वर्ग से, सुंदर अपना गाँव।।

घर के अंदर स्वर्ग से, सुंदर अपना गाँव।

मीठे रिश्तों की यहाँ, मीठी लगती छाँव।।

मीठे रिश्तों की यहां,मीठी लगती छाँव।

बार-बार मिलती नहीं,ऐसी मीठी ठाँव।।

बार बार मिलती नहीं, ऐसी मीठी ठाँव।

अंतस की दूरी मिटे, नफ़रत हारे दाँव।।

अंतस की दूरी मिटे, नफ़रत हारे दाँव।

घर के अंदर स्वर्ग से, सुंदर अपना…

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Added by Sushil Sarna on April 4, 2020 at 4:54pm — 4 Comments

मृदु-भाव

मृदु-भाव

प्रात की शीतल शान्त वेला

हवा की लहर-सी तुम्हारी मेरे प्रति

मृदु मोह-ममता

मैं बैठा सोचता मेरे अन्तर में अटका

कोलाहल था बहुत

क्यूँ किस वातायन से किस द्वार से कैसे

चुपके से आकर मेरे जीवन में

घोल दिए सरलता से तुमने मुझमें

प्रणय के पावन गीत

किसी सपने की मधुरिमा-सी

सच, प्यारी है मुझको तुम्हारी यह प्रीत

नए प्यार के नवजात गीत की नई प्रात

तुम आई,…

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Added by vijay nikore on April 4, 2020 at 4:31pm — 4 Comments

ग़रीब हूँ मैं मगर शौक इक नवाबी है(८०)

(1212 1122 1212 22 /112 )

ग़रीब हूँ मैं मगर शौक इक नवाबी है

ख़िज़ाँ की उम्र में भी दिल मेरा गुलाबी है

**

अधूरा काम कोई छोड़ना नहीं आता

कि मुझ में बचपने से एक ये ख़राबी है

**

मेरे लिए ही सनम क्यों हया का है…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on April 4, 2020 at 12:30pm — 8 Comments

कोरोना

नहीं हमारी नहीं तुम्हारी

अखिल विश्व में महा-बिमारी

आई पैर पसार

भैया मत छोड़ो घर-द्वार

भैया मत छोड़ो घर-द्वार 

निकल चीन से पूर्ण जगत में डाल दिया है डेरा

यह विषाणु से जनित बिमारी, खतरनाक है घेरा

रहो घरों में रहो अकेले

नहीं लगाओ जमघट मेले

कहती है सरकार

भैया मत छोड़ो घर-द्वार 

नहीं आम यह सर्दी-खाँसी इसका नाम कोरोना

नहीं दवाई इसकी, होने पर केवल है रोना

इसीलिए मत घर से निकलो

धीर धरो पतझड़ से निकलो

मानो…

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Added by आशीष यादव on April 4, 2020 at 11:33am — 2 Comments

ग़ज़ल मनोज अहसास

1222   1222   122

यूँ तुझपे हक़ मेरा कुछ भी नहीं है

मगर दिल भूलता कुछ भी नहीं है

तेरी बातें भी सारी याद है पर

कहा तेरा हुआ कुछ भी नहीं है

तेरी आंखों में है गर कोई मंजिल

तो फिर ये रास्ता कुछ भी नहीं है

ग़ज़ल अपनी कलम से खुद ही निकली

तसल्ली से लिखा कुछ भी नहीं है

मेरा अफसाना जो तुम पढ़ रहे हो

ये कुछ लायक है या कुछ भी नहीं है

नज़र जिसमें तेरी…

Continue

Added by Manoj kumar Ahsaas on April 4, 2020 at 12:30am — 2 Comments

ग़ज़ल

ग़ज़ल 

1222    1222      1222       1222

कोई कातिल सुना जो  शहर में है बेजुबाँ आया

किसी भी भीड़ में छुप कर मिटाने गुलिस्तां आया

 

धरा रह जायेगा  इन्सान का हथियार हर कोई 

हरा सकता नहीं कोई वह होकर खुशगुमां आया

 

घरों में कैद होकर रह गए हैं सब के सब इंसाँ

करें कैसे मदद अपनों की कैसा इम्तिहाँ आया

 

अवाम अपने को आफत से बचाने में हुकूमत को

अडंगा दीं लगाए कैसा यह दौर-ए-जहाँ आया

 

अगर महफूज रखना है  बला…

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Added by कंवर करतार on April 3, 2020 at 6:00pm — 6 Comments

एक पंथ दो काज - लघुकथा -

एक पंथ दो काज - लघुकथा -

"हल्लो, मिश्रा जी, गुप्ता बोल रहा हूँ।"

"अरे यार नाम बताने की आवश्यकता नहीं है।मेरे मोबाइल में आपका नाम आ गया। बोलो सुबह सुबह कैसे याद किया?"

"आज आपकी थोड़ी मदद चाहिये।"

"कैसी बात करते हो मित्र।आपके लिये तो आधी रात को तैयार हैं।हुकम करो।"

"अरे भाई आज राम नवमी है।कुछ बच्चे बच्चियों को जिमाना है।मैडम का आदेश हुआ कि सोसाइटी में से अपने दोस्तों के बच्चे बुलालो।"

"ये तो बहुत टेढ़ा मामला है।लॉक डाउन का सरकारी आदेश है।उसकी अवहेलना तो…

Continue

Added by TEJ VEER SINGH on April 3, 2020 at 5:55pm — 6 Comments

समय :

समय :

न जाने किस अँधेरे की जेब में

सिमट जाता है समय

न जाने कब उजालों के शिखर पर

कहकहे लगाता है समय

अंतहीन होती है समय की सड़क 

बिना पैरों का ये पथिक

अपने काँधों पर ढोता है सदा

कल, आज और कल की परतों में

साँस लेते लम्हों की अनगिनित दास्तानें

और नुकीली सुईयों के पाँव के नीचे रौंदे गए

आफ़ताबी अरमानों के बेनूर आसमान



क्षणों की माल धारण किये

उन्नत भाल का ये आहटहीन अश्व

सृष्टि चक्र का वो वाहक है…

Continue

Added by Sushil Sarna on April 3, 2020 at 3:00pm — 4 Comments

क्षणिकाएँ :

क्षणिकाएँ :

क्या ख़बर
हम फिर
मिलें न मिलें
मगर
छोड़ जाऊँगा मैं
समय के भाल पर
हमारे मिलन की गवाह

परछाईयाँ
काँपते चाँद की

.............................

झुलसे हुए होठों पर
रुक गया
फिसल कर
एक अश्क
बेवफ़ाई का

....................

खाली घड़ा
सूखी रोटी
टूटे छप्परों से झाँकती
झूठी आस की
धवल चाँदनी


सुशील सरना /2.4.20
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on April 2, 2020 at 5:20pm — 4 Comments

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