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"यादें" (आईये लिखे कुछ ऐसी यादों को जो भूलता ही नहीं)

हमारे जीवन मे बहुत सारी ऐसी घटनाये हो जाती है जो भुलाये नहीं भूलती, और कभी सोच सोच कर आँखों मे आंशु तो कभी होंठो पर मुस्कान आ जाती है, ये यादें बचपन, जवानी या बुढ़ापा किसी भी समय की हो सकती है, बाल काल की नादानीया, युवा काल की गलतिया या कुछ अच्छाईया अथवा और भी ऐसी यादें जिसे बाटने का जी करे,


तो आइये ना , ऐसी ही कुछ यादों को ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार के बीच बाटें.........
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    Arvind Chaudhari

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    ख़याल बढ़िया है l
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      Abhinav Arun

      बागी जी , मैं तो यहाँ आकर इस पेंटिंग में खो सा गया .अपने आप में यादों का मंज़र यही है. अब टी. वी. और अखबारों में तमाम तस्वीरों में कितनी हैं जो हमारा ध्यान खींचती हैं ,और हमें ले जाती हैं ,ख्यालों और यादों की दुनिया में.अच्छी पहल है. मैं भी फुर्सत निकालता हूँ ,यादों की डोंगी के सफ़र पर निकलने को.
      डोंगी से मुझे अपना गाँव याद आ गया. बरसात में गाँव की नहर नदी का रूप ले लेती थी . हम छोटे बच्चे खूब धमा चौकड़ी करते. छोटी छोटी चमकीली मछलियाँ पकड़ते. उन्हें घर में लाकर बर्तन में रखते .माना ये ठीक नहीं था पर बचपन को इतनी समझ कहाँ थी .अब शहर में गंगा तो है पर खुशियों के वो छोटे छोटे चहक भरे पल कहाँ?
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        rakesh gupta

        वन्दे मातरम दोस्तों,
        यादों की इस कड़ी में मैं भी कुछ यादे आपके साथ बांटना चाहता हूँ .....
        बात है 11 सितम्बर 1992 की ....... शाम के लगभग चार बजे का समय था ... मैंने देखा की न्यू उस्मान पुर (जहाँ मैं रहता हूँ उस जगह का नाम है) की गली न.- 12 में एक लड़का घायल अवस्था में पड़ा है... कोई भी उसकी मदद नही कर रहा था ....... उसके सिर में कुछ बदमाशों ने केंची और पेट में चाकू घोंप दिया था ...... मेरे खून में फटे में टांग अड़ाने का शायद कोई कीड़ा है ... मैंने बिना आगा पीछा सोचे 100 न. पर फोन कर दिया .... उस लडके को पानी पिलाकर उसे होश में लाने का प्रयत्न किया ...... कुछ ही मदर में पुलिस आ गई और पुलिस की जिप्सी से ही उस घायल युवक को गुरु तेग बहादुर अस्पताल ले जाया गया.......
        मुझे नही मालूम उसके बाद क्या खिचड़ी पकी मगर रात तकरीबन दस बजे मुझे थाने बुलाया गया, थाने पहुंच कर मुझसे एस आई शिव नाथ त्यागी जी द्वारा कहा गया की गुप्ता जी आपको इस क्षेत्र के बारे में काफी जानकारी है ....... इस युवक ने कुछ नाम बताये हैं शायद इन लोगों तक आप हमे पहुंचा सके ... मैं इनमे से कुछ लोगों को जानता था (मेरा जन्म ही न्यू उस्मान पुर का है और मैं उस समय सोसलिस्ट यूनिटी सेंटर(SUCI)  का सक्रिय कार्यकर्ता था और और न्यू उस्मानपुर क्षेत्र में मेरी अच्छी पकड़ के कारण ) इन बदमाशों में से कुछ को रात भर की मेहनत के बाद पुलिस ने पकड़ भी लिया इस प्रक्रिया में सुबह के पांच बज गये थे.... मुझे पुलिस चाय और नास्ता कराया इस दौरान एस आई शिव नाथ त्यागी जी कहीं निकल चुके थे .... मैं चाय पीकर ठाणे से बाहर निकलने लगा तो गेट पर खड़े संतरी ने मुझे बाहर नही निकलने दिया गया..... पूछने पर उस संतरी ने मुझे कहा की आप का नाम 308 के इस मुकदमे में दर्ज है ... आप बाहर नही जा सकते ......
        मुझे काटो तो खून नही था ........ पुलिस का ये रूप देहली जैसे शहर में मेरे लिए एकदम नया था...... मेरे लिए सिफारिशों की झड़ी लग गई (यहाँ तक की तत्कालीन MLA भीष्म शर्मा जी ने मेरे लिए बहुत मेहनत की) मगर मुझे पुलिस की मेहरवानी से निर्दोष होते हुए भी पहली बार तिहाड़ जेल के दीदार का मौका मिला .........
        हालांकि सच कभी हारता नही है इस बात को मुझे जानने का पहला मौका भी इसी वाकये के दौरान मिला जब मेरे वकील राम वीर गोस्वामी ने इस केस के वास्तविक गवाह वह घायल युवक नरेंद्र वर्मा के मुंह से ये कहलवा दिया की मुझे मरने वाले राकेश गुप्ता नही है पुलिस ने इन्हें वास्तविक अपराधियों को बचाने के लिए फंसाया है .......... और तीसरे ही दिन मुझे  जमानत मिल गई ... पुलिस कोर्ट में मेरे खिलाफ कुछ भी साबित नही कर सकी और मुझे इस केस से लगभग पांच साल बाद बाइज्जत रिहा कर दिया गया और पुलिस को कोर्ट से लताड़ खानी पड़ी ..........
        खैर ये तो हुई एक घटना .......... मगर इस घटना ने मेरे जीवन की दशा  और दिशा दोनों ही बदल दी .......   11 सितम्बर 1992 के उस दिन के बाद से ही न्यू उस्मान पुर पुलिस सहित देहली पुलिस को मेरे द्वारा तमाम मोकों पर शिकस्त का सामना करना पड़ा और इस लड़ाई में मेरा साथ दिया मेरी कलम और कानून की ताकत और साथ ही मेरे कुछ पुलिस के ही दोस्तों ने पुलिस की कमजोरियां बताई जो मेने अपने लिए ताकत के रूप में इस्तेमाल किया ........ साथ ही इस लड़ाई में मेरे साथ क्षेत्रीय जनता और मेरे दोस्तों और परिजनों ने मेरा भरपूर साथ दिया ............ इस लड़ाई के चलते पुलिस  के एक आला अफसर ने मुझे बुला कर कहा की गुप्ता जी एक व्यक्ति अगर गलती करता है तो उसके लिए पूरा विभाग कभी दोषी नही हो सकता ...... आपको इस्वर ने एक आला दर्जे का दिमाग दिया आप अगर अपनी प्रतिभा का इस्तेमाल समाज के लिए करें तो आप समाज से गंदगी साफ़ करने में बेहद कामयाब हो सकते हैं ..........
        इसके बाद 08 अक्टूबर 2008  को मैंने एक एन जी ओ संघर्ष जन कल्याण समिति का गठन किया और उसके बाद क्षेत्र में अपराध और अपराधियों साथ ही भ्रष्टाचार के खिलाफ एक मुहीम चलाई जो आज तक जारी है.........
        हालांकि आज मेरे जीवन में बहुत कुछ बदल गया है मगर नही बदला तो अन्याय के खिलाफ (खास कर खाकी के द्वारा) कभी भी किसी के साथ भी कुछ गलत होने पर उसके खिलाफ खड़े होने का जज्बा .......... 
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