दोहा सप्तक. . . . . . विविध
कभी- कभी तो कीजिए, खुद से खुद की बात ।
सुलझेंगे उलझे हुए, अंतस के हालात ।।
खामोशी से पूछिए, क्या है उसका दर्द ।
किन राहों की है भरी, उसमें इतनी गर्द ।।
लफ्ज अकेले हो गए, ठहर गए जज्बात ।
कोई अपना दे गया, दिल को वह आघात ।।
हुई उम्र तो सामने, उभरी हर तस्वीर ।
रुखसारों पर दर्द की, शेष रही तहरीर ।।
रेजा - रेजा हो गए, जीवन के सब ख्वाब ।
चश्मे साहिल पर रहे, यादों के सैलाब ।।
लहरों सी यह जिंदगी, रहे सदा मझधार ।
कभी हकीकत ढूँढती, कभी ख्वाब से प्यार ।।
करवट काँटों से भरी , तनहा सिसकें ख्वाब ।
क्या उल्फत मानें यही, मिलता नहीं जवाब ।।
सुशील सरना / 23-3-26
दोहा सप्तक. . . .विविध
by Sushil Sarna
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