भ्रम सिर्फ बारी का है

भ्रम सिर्फ बारी का है
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बरसों बरस लगे
बीज को बहलाने में
भरपूर दरखत बनाने में


बरसात नहलाती रही
धूप सहलाती रही
हवा आती रही
हवा जाती रही
बरसों बरस लगे धरा को
जड़ो की जगह बनाने में
बीज को दरख्जत बनाने में



और तुम
संवेदनहीन शिकारी आए
ताज की कुल्हाड़ी लाये
और बरसों के पाले दरख़्त का पलों में क़त्ल कर दिया
हवा पानी धरा का बरसों का प्रयास विफल कर दिया


तुम्हारे बहरों कानो ने नहीं सुनी कटते दरख़्त की दर्दीली चीत्कार
तुम्हें लगा
कि धरा आसमान हवा बादल ने भी कहाँ सुनी होगी अव्यक्त पुकार
लेकिन तुम यही समझ नहीं पाए कि
धरा और दरख्त होते हैं जनक और जनित


और अब जब चीख धरा नहीं सह पाई
धरा का सीना फटा
तुम्हारी चालाकी ने पहाड़ कटा कह दिया

और अब जब चीख अम्बर नहीं सह पाया
बादल का सीना चिरा
तुम्हारी चालाकी ने बादल फटा कह दिया

नदियों की व्याकुलता को बाढ़ भर कहा
क्योंकि उस में तुम्हारा बहुमंजिला नहीं बहा

बस्तियां बह गयी तुम्हे बस एक समाचार लगा
तुम सुरक्षित, तुम्हे सुरक्षित निज घर बार लगा
स्वाभाविक है
जिसकी रगों में लहू नहीं लालच बहता हो
हैरत कैसे हो वो कैसा भी कुछ भी कहता हो

बस इतना भर समझ जाए तो काफी है
कि सवाल तैयारी का नहीं
सारा भ्रम सिर्फ बारी का है।
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मौलिक व अप्रकाशित"