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आत्म मुग्ध मदारी
by
amita tiwari
Mar 17
आत्म मुग्ध मदारी
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बजा रहे डुगडुगी
नाच रहे बन्दर
सैंकड़ों ,हज़ारों
सम्मोहित बंदर
अरबों खरबों तमाशबीन
देख रहे तमाशा
पीट रहे तालियाँ
सम्मोहित तमाशबीन
मदारी
उगाह रहा दान
नितांत निजी झोली में
एक एक के पास जा
नज़रें मिला
ध्यान से देख
पहचान बना
कभी फुसला
कभी बहला
कभी
क्रोधित लाल आँखे दिखा
एक हाथ से
बाँट रहा सपने
तुरंत
बदले में
दुसरे हाथ से
माँग रहा हाथ
सम्पूर्ण हाथ
स्वप्न जगाये
हिचकिचाए
तमाशबीन
बांचते हथेली
उदार हो
कृत कृत जाल
विस्मृत सवाल
संपूर्ण निहाल हो
मदारी की झोली में
डाल रहे दान
अपने आप
अपने हाथ
अपने आप काट
भर रहे झोली
मदारी की झोली
बोल रहे
सीखी
मदारी की बोली
बार बार
लगातार
विडंबना
सम्मोहित तमाशबीन
कटे हाथ
चमत्कार
फिर फिर उग रहे
और और फिर फिर
संपूर्ण हाथ
सिलसिला जारी
नए पुराने
हाथों की बारी
विडंबना
सम्मोहित तमाशबीन
फिर फिर
काट रहे
फिर फिर
पाट रहे
मदारी की झोली
सैंकड़ों हज़ारों लाखों तमाशबीन
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मौलिक व अप्रकाशित"
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आत्म मुग्ध मदारी
by amita tiwari
Mar 17