घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये
उघड़े  शरीर  आप  ही  सम्मान  हो गये।१।
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गुर्बत हटेगी बोल के कुर्सी जिन्हें मिली
उनको गरीब लोग ही जल-पान हो गये।२।
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घर में बहार नल से जो आयी गरीब के
पनघट हर एक गाँव  के वीरान हो गये।३।
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भारी हुए जो उनके ये व्यवहार कर्म पर
सारे ही फर्ज, कौम को अहसान हो गये।४।
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हाथों अपढ़ के देखते शासन की डोर है
पढ़ लिख गये जो देश में दरवान हो गये।५।
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अपनों में कोई एक भी अपना नहीं हुआ
पर हम उन्हीं के बीच में गलवान हो गये।६।
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मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'