२१२२ १२१२ २२/११२
तमतमा कर बकी हुई गाली
कापुरुष है, जता रही गाली
भूल कर माँ-बहन व रिश्तों को
कोई देता है बेतुकी गाली
कुछ नहीं कर सका बुरा मेरा
खीझ उसने उछाल दी गाली
ढंग-व्यवहार के बदलने से
हो गयी विष बुझी वही गाली
कब मुलायम लगी कठिन कब ये
सोचना कब दुलारती गाली
कौन कहिए यहाँ जमाने में
अदबदा कर न दी कभी गाली
नाज से तुम सहेज कर रखना
संस्कारों पली-बढ़ी गाली
***
मौलिक व अप्रकाशित
सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey
आदरणीय धर्मेन्द्र भाई, आपसे एक अरसे बाद संवाद की दशा बन रही है. इसकी अपार खुशी तो है ही, आपके अनुमोदन से इस प्रस्तुति और मेरे रचनाकर्म को समर्थन मिल रहा है, सो अलग. हार्दिक धन्यवाद, भाईजी.
आपने जो तुरंता/ फिलबदीह शेर अपनी ट्प्प्पणी के साथ साझा किया है, वह इसी भाव का सुंदर प्रतिरूप है.
जय-जय
Sep 12, 2025
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
आदरणीय सौरभ सर, गाली की रदीफ और ये काफिया। क्या ही खूब ग़ज़ल कही है। इस शानदार प्रस्तुति हेतु हार्दिक बधाई। सादर
Sep 16, 2025
सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey
आदरणीय मिथिलेश भाई, रचनाओं पर आपकी आमद रचनाकर्म के प्रति आश्वस्त करती है.
लिखा-कहा समीचीन और समुचित प्रतीत हुआ, यह उत्साहवर्द्धक है,
अनुमोदन के लिए हार्दिक धन्यवाद
जय-जय
Sep 17, 2025