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बसंत कुमार शर्मा
  • Male
  • जबलपुर, मध्यप्रदेश
  • India
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बसंत कुमार शर्मा posted a blog post

यहाँ बस आदमी के भाव ही मंदे बहुत हैं - ग़ज़ल

मापनी  १२२२ १२२२ १२२२ १२२  धवल हैं वस्त्र, नीयत के मगर गंदे बहुत हैं चिरैया देख! दाने कम उधर फंदे बहुत हैं  मचा है शोर मँहगाई का चारों ओर लेकिन यहाँ बस आदमी के भाव ही मंदे बहुत हैं  जहाँ है खुरदुरा अज्ञान से मन का धरातल वहीं समतल बनाने ज्ञान के रंदे बहुत हैं  इसे हम भाग्य समझें या कहें अन्याय तेरा,  कहीं लाले मजूरी के, कहीं चंदे बहुत हैं बदलते रंग गिरगिट सा तुहारा नाम लेकर यहाँ पर काम के कम नाम के बंदे बहुत हैं"मौलिक एवं अप्रकाशित" See More
13 hours ago
बसंत कुमार शर्मा commented on सालिक गणवीर's blog post ( बेजान था मैं फिर भी तो मारा गया मुझे......(ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)
"आ. भाई सालिक गणवीर जी, सादर अभिवादन ।अच्छी गजल हुई है हार्दिक बधाई "
14 hours ago
बसंत कुमार शर्मा commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post रश्मियाँ दिखतीं नहीं - ग़ज़ल
"आदरणीय अमीरुद्दीन 'अमीर' जी सादर नमस्कार आपकी हौसला अफजाई के लिए दिल से शुक्रिया "
16 hours ago
अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post रश्मियाँ दिखतीं नहीं - ग़ज़ल
"जनाब बसंत कुमार शर्मा जी आदाब, ख़ूबसूरत ग़ज़ल पेश की है आपने दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ।  सादर।"
Saturday
बसंत कुमार शर्मा commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post रश्मियाँ दिखतीं नहीं - ग़ज़ल
"आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी सादर नमस्कार आपका स्नेह मिला सृजन सार्थक हुआ  सादर नमन आपको "
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post रश्मियाँ दिखतीं नहीं - ग़ज़ल
"आ. भाई बसंत जी, सादर अभिवादन । बहुत ही मनभावन गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।"
Saturday
बसंत कुमार शर्मा commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post रश्मियाँ दिखतीं नहीं - ग़ज़ल
"आदरणीय Aazi Tamaam जी सादर नमस्कार  आपकी हौसलाफजाई के लिए दिल से शुक्रिया "
Saturday
बसंत कुमार शर्मा commented on Aazi Tamaam's blog post नग़मा: इक रोज़ लहू जम जायेगा इक रोज़ क़लम थम जायेगी
"आदरणीय अमीर जी सादर नमस्कार  बहुत बढ़िया गजल "
Saturday
Aazi Tamaam commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post रश्मियाँ दिखतीं नहीं - ग़ज़ल
"अच्छी ग़ज़ल हुई है बेहद मधुर लयबद्ध किया गया है सादर प्रणाम आदरणीय बसंत जी बधाई स्वीकारें"
Saturday
बसंत कुमार शर्मा commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post रश्मियाँ दिखतीं नहीं - ग़ज़ल
"आदरणीया Rachna Bhatia जी सादर नमस्कार एवं प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार नमन "
Saturday
बसंत कुमार शर्मा commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post रश्मियाँ दिखतीं नहीं - ग़ज़ल
"आदरणीय Chetan Prakash जी, सादर नमस्कार , आपकी प्रेरक प्रतिक्रिया और सुझाव को सादर नमन - बसंत "
Saturday
Rachna Bhatia commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post रश्मियाँ दिखतीं नहीं - ग़ज़ल
"वाह वाह वाह बेहतरीन ग़ज़ल हुई। आदरणीय बसंत कुमार शर्मा जी हार्दिक बधाई।"
Saturday
Chetan Prakash commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post रश्मियाँ दिखतीं नहीं - ग़ज़ल
"बंधुवर, बसंत कुमार शर्मा जी अच्छी हिंदी ग़ज़ल हुई है! 'तलहटी में मुझे 'ये' रश्मियाँ दिखती नहीं ' यहाँ 'ये' के स्थान पर, सर्वनाम 'वो' होना चाहिए ! सार्थक ग़ज़ल हेतु बधाई, भाई! "
Saturday
बसंत कुमार शर्मा posted a blog post

रश्मियाँ दिखतीं नहीं - ग़ज़ल

मापनी  २१२२ २१२२ २१२२ २१२ उपवनों में फूल कलियाँ तितलियाँ दिखतीं नहीं रोज कोयल खोजती अमराइयाँ दिखतीं नहीं  हो गई आँखों से ओझल ऋतु बसंती प्यार कीतप रहा मन का मरुस्थल बदलियाँ दिखतीं नहीं कौन सा यह आवरण ओढ़ा हुआ है आपनेसुन न पाते सिसकियाँ, दुश्वारियाँ दिखतीं नहीं चमचमाते हैं महल सब, जगमगाता हर शिखर तलहटी में ही मुझे ये रश्मियाँ दिखतीं नहीं  काव्य सरिता बह रही है बंधनों को तोड़करकथ्य अनगढ़, भाव में गहराइयाँ दिखतीं नहीं  जब उजाले पास थे तब एक लश्कर साथ थाहै अँधेरा आज तो परछाइयाँ दिखतीं नहीं छुट्टियाँ…See More
Friday
बसंत कुमार शर्मा commented on अमीरुद्दीन 'अमीर''s blog post ग़ज़ल (निगलते भी नहीं बनता उगलते भी नहीं बनता)
"आ. अमीरूद्दीन जी, सादर अभिवादन  अच्छी ग़ज़ल हुई है,  बधाई स्वीकारें    "
Nov 9, 2020
बसंत कुमार शर्मा commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post फूल काँटों में खिला है- ग़ज़ल
"आदरणीय बृजेश कुमार 'ब्रज' जी सादर नमस्कार  आपकी हौसलाअफजाई का दिल से शुक्रिया "
Nov 9, 2020

Profile Information

Gender
Male
City State
जबलपुर (मध्यप्रदेश)
Native Place
धौलपुर
Profession
भारतीय रेल यातायात सेवा
About me
बोन्साई एवं कविता लेखन में रूचि

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यहाँ बस आदमी के भाव ही मंदे बहुत हैं - ग़ज़ल

मापनी  १२२२ १२२२ १२२२ १२२ 

 

धवल हैं वस्त्र, नीयत के मगर गंदे बहुत हैं 

चिरैया देख! दाने कम उधर फंदे बहुत हैं 

 

मचा है शोर मँहगाई का चारों ओर लेकिन 

यहाँ बस आदमी के भाव ही मंदे बहुत हैं 

 …

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Posted on April 19, 2021 at 12:35pm

रश्मियाँ दिखतीं नहीं - ग़ज़ल

मापनी  २१२२ २१२२ २१२२ २१२ 

उपवनों में फूल कलियाँ तितलियाँ दिखतीं नहीं 

रोज कोयल खोजती अमराइयाँ दिखतीं नहीं 

 

हो गई आँखों से ओझल ऋतु बसंती प्यार की

तप रहा मन का मरुस्थल बदलियाँ दिखतीं नहीं

 

कौन सा यह आवरण ओढ़ा हुआ है आपने…

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Posted on April 16, 2021 at 1:19pm — 10 Comments

फूल काँटों में खिला है- ग़ज़ल

२१२२ २१२२ 

फूल काँटों में खिला है, 

प्यार में सब कुछ मिला है. 

 

है न कुछ परिमाप गम का, 

गाँव है, कोई जिला है. 

 

झोंपड़ी का देखकर गम,

तख़्त कब कोई हिला है. 

 …

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Posted on October 19, 2020 at 11:30am — 6 Comments

जब-जब ख़्वाब सुनहरे देखे - ग़ज़ल

सागर से भी गहरे देखे.

जब-जब ख़्वाब सुनहरे देखे.

 

नए दौर में नई सदी में,

साँसों पर भी पहरे देखे. 

 

गांधी जी के तीनों बंदर, 

अंधे गूँगे बहरे देखे.

 …

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Posted on October 14, 2020 at 12:54pm — 10 Comments

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At 2:23pm on September 28, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आपका अभिनन्दन है.

ग़ज़ल सीखने एवं जानकारी के लिए

 ग़ज़ल की कक्षा 

 ग़ज़ल की बातें 

 

भारतीय छंद विधान से सम्बंधित जानकारी  यहाँ उपलब्ध है

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"आदरणीय  आप द्वारा रचित गीत के भाव सुन्दर हैं पर इस उत्सव के नियमनुसार प्रदत्त छंद पर ही सृजन…"
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PHOOL SINGH posted a blog post

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