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खूंटे (लघुकथा) राहिला

"अरे चमनलाल...! आओ-आओ भैया!कितने वर्षों बाद , गांव का रास्ता कैसे भूल गए ? " खुशी से झूमते हुए उसने , उसको कसकर गले लगा लिया।
"बस भैया चले ही आ रहे हैं , अरे...! घर में सन्नाटा सा पसरा है, कोई है नहीं का?" उसने बाखर का सरसरी तौर पर मुआयना करते हुए कहा।

"है ना..., तुम्हारी भाभी हैं भीतर,
अरे सुनती हो! चमनवा आया है ,जरा बढ़िया सी चाय तो बना लाओ दुई कप।"

"और बहुएँ कहाँ हैं ?"

" बड़ी , आंगनबाड़ी में सुपरवाइजर हो गयी है , छोटी तो मास्टरनी थी ही। आती होंगीं समय तो हो गया है।"
तभी-
"चाय"
दरवाजे की ओट से चाय की ट्रे आगे बढ़ाते हुए , उसने एक मात्र शब्द से काम चलाया।
चाय का एक घूँट पीकर चमनलाल शिकायती अंदाज में बोले -
"अरे यार! अब की चाय में वो पहले वाली बात नहीं रही। ऐसा लग ही नहीं रहा जैसे अपने गाँव की कड़क , गाढ़ी चाय पी रहे हों ।"
" मोल का दूध है भाई ! तो पहले की सी बात कहाँ रहेगी । अब तुम्हारी भाभी की भी तबियत कुछ खास ठीक नहीं रहती । फिर बहुओं को भी समय कहाँ ? अब तो खूंटे तक उखड़ गये।"
"अरे..., मैं तो मज़ाक कर रहा था। चाय में भले ही वो पहली वाली बात ना हो , लेकिन तेरी मुहब्बत तो वही गाढ़ी वाली है..।, उसने चाय का कप रखते हुए , जोर से ठहाका मारा।
"लेकिन भई ! खुशी तो इस बात की है, कि खूंटे उखड़ गए ।"
घर की बहुओं को बाहर से आता देख, उसने मुस्कुरा कर कहा।

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Nita Kasar on March 10, 2018 at 8:10pm

खूँटे उखड़ गये ।ज़रूरी भी था ।घर से ही महिलाओं के आगे बढ़ने की शुरूआत सार्थक संदेश देती कथा के लिये बधाई आ० राहिला जी ।

Comment by Mohammed Arif on March 10, 2018 at 3:22pm

आदरणीया राहिला जी आदाब,

             एक अच्छी लघुकथा श्रेणी की रचना कही आपने । कुछ वर्तनीगत अशुद्धियाँ हैं । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।

ओबीओ सीखने-सिखाने का साहित्यिक परिवार का सशक्त मंच है । आपकी मेरी तथा अन्य साथियों की टिप्पणियों से बहुत सीखने को मिलता है । लेकिन कुछ साथी ब्लॉग पोस्ट पर अपनी पोस्ट करते हैं और टिप्पणियाँ बटोरकर नदारद हो जाते हैं । ब्लॉग पोस्ट पर प्रतीक्षारत साहित्य की अन्य विधाओं पर टिप्पणी करने से गुरेज़ करते हैं । केवल अपनी पोस्ट तक सीमित रहते हैं । आख़िर ऐसा क्यों ? क्यों न आप सबको टिप्पणियाँ देने की पहल करें । सादर ।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on March 9, 2018 at 3:44pm

आदाब। बहुत बढ़िया उम्दा प्रस्तुति के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत मुबारकबाद मुहतरमा राहिला साहिबा।

Comment by Samar kabeer on March 8, 2018 at 11:45pm

मोहतरमा राहिला जी आदाब, अच्छी लघुकथा है, इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by SALIM RAZA REWA on March 8, 2018 at 9:54pm
बहन राहीला जी,
बहुत ही खूबसूरत ढंग से दृश को लघुकथा में उभारा है बहुत खूब...
अरे सुनती हो! चमनवा आया है ,जरा बढ़िया सी चाय तो बना लाओ दुई कप।"

वाह वाह ज़ुबान का इंतख़ाब.. क्या कहने..
मुबारक़बाद
Comment by somesh kumar on March 8, 2018 at 4:23pm

KHUNTE KO DO ARTHON ME PRYOG KR SKNA TTHA USSE HONE VALE CHANGES KO INGIT KRNA IS LGHUKTHA KI SAFLTA KA DHYOTK HAI

Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on March 8, 2018 at 1:26pm

आद0 राहिला जी सादर अभिवादन। बढिया लघुकथा कही आपने, इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार कीजिये

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