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अभिमन्यु की प्रेयसी:- मोहित मुक्त

गतांक से आगे

बैठी हुइ निज कक्ष में कुशुमाभूषणों से सजी।
अनभिज्ञ होनी के लेख से अभिमन्यु की प्रेयसी।
अभी-अभी कर गयी है दासी दिब्य श्रृंगार।
चूड़ामणि, कानो में कुण्डल, गले में पुष्पाहार।

स्वर्णाभूषणों से प्रखर हो चमक रहा है मस्तक।
बालपन की चौखट पर दे गया यौवन दस्तक।
अभी-अभी तो बंधी है प्रणय की रश्मि बंधों से।
नया-नया परिचय हुआ है शाश्वत प्रेम संबंधों से।

अभी तो हाथों से नहीं उतरी सुहाग की लाली।
अब तक महक रही है वो सेज फूलों वाली।
अभी-अभी तो हुई है क्वाँरी से वो भामिनी।
प्रेमरस से पगी अभिमन्यु हृदय-निवासिनी।

जी भरकर ना हो पायीं थी अब-तक प्रेम की बातें।
गिने-चुने दिन प्यारे के संग, गिनी-चुनी थी रातें।
अभी तो उर में संचय थी कितनी सारी अभिलाषा।
अभी तो मन का भौरां था प्रेम-मिलन रस प्यासा।

अभी-अभी साँसों में घुली थी यौवन की मिठास।
हृदय-वृंत पर था छाया नया-नया मधुमास।
दृग प्रियतम के दर्शन से तृप्त नहीं थे हो पाए।
कुछ दिन हीं तो बीते थे अभिमन्यु से ब्याह रचाये।

और विधाता की श्रेष्ठ कृति थी उत्तरा के रूप में।
ज्यों प्रकृति सुन्दरता समेटे बैठी हो स्वरुप में।
नीली-नीली आँखों में जैसे सागर लहराता हो।
या ले अंगड़ाई पलकों में नीला अम्बर अलसता हो।

मानों उषा का रक्तिम सूरज अधरों पर उतर सा आया है।
या गुलाब का लाल वर्ण होठों पर मचल के छाया है।
गाल मुलायम मक्खन से या खिले-खिले नव फूल से।
निर्मल शरतचंद्र सा या, पावन नदियों के मूल से।

अञ्जन लगे इन नयनों के कोर ऐसे काले हैं।
मानों अमावस की रातों में बादल बरसने वाले हैं।
और कृष्णवर्ण ये केश घने लम्बे-लम्बे प्यारे-प्यारे।
जैसे कोई श्यामल नागिन क्रोधवंत होकर फुँफकारे।

मनो कपोलों पर खिली हो बालसूर्य की आभा।
दंतों की उज्ज्वलता में मानस हंस हो जागा।
सच्चरित्र के धवल प्रकाश से चमक रहा मुखमण्डल।
अम्बर के तारे नक्षत्र सब बने हैं कानो के कुण्डल।

अधरों पे मुस्कानों से ज्यों अमृत का निर्झर फूटा है।
खिलखिलाहट में सरगम पे कोई राग सा छूटा है।
मन को शीतल करने वाली आवाज बहुत हीं प्यारी है।
कोमल ऐसी जैसे की फूल भी उसपे भारी है।

मौलिक और अप्रकाशित


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Comment by Mohit mishra (mukt) on August 30, 2017 at 10:48am

आदरणीय  डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव जी आपके मार्गदर्शन का बहुत बहुत धन्यवाद। आपकी बातों का ख्याल रहेगा। 

सिखने का क्रम चल रहा है तो गलतियाँ हो हीं जाती हैं। नमस्कार 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on August 25, 2017 at 7:59pm

आ० मोहित जी . लगता है आप किसी खंड काव्य के लेखन में प्रवृत्त हैं . किन्तु इसके लिए केवल तुकबंदी  से काम नहीं चलेगा . आपको एक या एकाधिक छंद में रचना करनी होगी और उसके नियमों में बंधना पडेगा मैं आपका एक छंद  ले रहा हूँ =

मनो कपोलों पर खिली हो बालसूर्य की आभा।
दंतों की उज्ज्वलता में मानस हंस हो जागा।
प्रथम पंक्ति में दो चरण हैं=   मनो कपोलों पर खिली हो----एक   मात्रा 15

                      बालसूर्य की आभा।       -  दो    मात्रा 12
यहाँ चर्नांत २२ है अतः यह सार छंद के करीब है .सार में मात्रा (१६,१२) होती है , इस लिहाज से पहली पंक्ति यूँ होगी-        खिली कपोलों पर मानो हो बाल सूर्य की आभा ---अब आगे आभा और जागा में तुक नहीं है . इसके लिए आपको सावधान रहना होगा . आभा का एक तुक  है द्वाभा तो दूसरी पंक्ति यूँ हो सकती है – दांतों में मिस्सी से जैसे फूट रही हो द्वाभा   

मान्यवर सभी छंदों पर व्याख्या देना संभव नहीं है पर यदि आप सचमुच गंभीर है तो छंद की गरिमा से बंधना होगा अन्यथा आपका श्रम सार्थक होने में संदेह हो सकता है .शुभ शुभ

Comment by Mohit mishra (mukt) on August 22, 2017 at 2:56pm
आगे से ऐसी लम्बी रचना नहीं डालूंगा। आपके सुझाव हमेशा से मार्गदर्शक रहे हैं।आशा है आगे भी रहेंगे। सादर
Comment by Samar kabeer on August 21, 2017 at 11:15pm
जनाब मोहित जी आदाब,रचना बहुत लम्बी हो गईं है जिसकी वजह से पाठक की रुची कम हो जाती है ।
इस रचना पर बधाई स्वीकार करें ।

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