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जनता(ब्यथा और प्रण ):-मोहित मुक्त

अन्तर्वेदना से छिन्न-भिन्न
आक्रांत उर की मर्म कराहें ,
अश्रुनिमग्न कातर स्वर में
पूछती हैं किसको पुकारें |

आह भारत-वर्ष हाय
क्या यहीं रह गया है शेष ?
स्वर्णयुक्त इतिहास का-
कुछ ,रहा नहीं भग्न-अवशेष ?

क्यों नहीं कुक्षि तेरी
अब कोई अशोक जन्माती है ?
क्यों नहीं स्वसम्मान की
आज ललकारें लहलहाती हैं ?

जनता कोई खिलौना है-
क्या, गणतंत्रता की सत्ता में ?
नहीं तो फिर गौण-
क्यों ,बन गयी है महत्ता में ?

रे जागो जनतंत्र के-
प्रहरी, उर्जस्वित-मतवालों ,
रे हिमगिरि सदृश्य-
मसृण, माँ भारती के लालों |

निकलो, मैले वस्त्रों को
धारण कवच सा कर कर के ,
बढ़ चलो राजपथ पर-
तुम, अपना स्वर मुखर कर के |

हाँ एक प्रश्न होगा
शायद, कुढ़ता तुम्हारे जिय में ,
करें विद्रोह किसका
यहाँ? सब नेता हैं जनप्रिय के |

तो शमशीर नहीं उठाना
है, बस प्रश्न मुखर करना है |
देशहित के कर्तब्य-भान
का, तुम्हें ज्योति प्रखर करना है |

प्रण करो तुम आज
हम भारत को स्वर्णतरू बना देंगे ,
कल के विश्वगुरु को फिर,
हम कल का विश्वगुरु बना देंगे |


मौलिक और अप्रकाशित

Views: 347

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Comment by Mohit mishra (mukt) on July 25, 2017 at 5:30pm
आदरणीय विजय निकोर जी कविता पर ध्यान देने एवं उत्साह बढ़ाने के लिए तहे दिल से शुक्रिया
Comment by vijay nikore on July 25, 2017 at 3:54pm

प्रण करो तुम आज 
हम भारत को स्वर्णतरू बना देंगे ,
कल के विश्वगुरु को फिर,
हम कल का विश्वगुरु बना देंगे |

... अच्छी, प्रेरणा से भरपूर रचना के लिए बधाई।

Comment by Mohit mishra (mukt) on July 23, 2017 at 7:13pm
आदरणीय आरीफ जी आपकी इस टिप्पणी ने गदगद कर दिया। आपके सुझावों का आगे भी हमेशा की तरह मुझे आवश्यकता रहेगी
Comment by Mohit mishra (mukt) on July 23, 2017 at 7:10pm
आदरणीय समर सर उत्साह वर्धन के लिए तहे दिल से शुक्रिया
Comment by Samar kabeer on July 23, 2017 at 5:53pm
जनाब मोहित मुक्त जी आदाब,बहुत उम्दा कविता लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Mohammed Arif on July 23, 2017 at 4:20pm
प्रिय मोहित मुक्त जी आदाब, प्रस्तुत कविता के स्वर में एक आग्रह भी है , आक्रोश भी झलकता है , देशभक्ति की छटपटाहट भी है, मातृभूमि को बचाने और एकजुटता का आग्रह भी धीमे स्वर में मुखरित होने का प्रयास कर रहा है । कुल मिलाकर संदेश भी है, आग्रह भी है और देश के प्रति पुकार भी । भाषाई सौष्ठव क्लिष्ट ज़रूर हो गया है । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।

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