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मुझको भी अब पढ़ना है

लाओ, मेरा बस्ता दे दो,
मुझको भी अब पढ़ना है.
सीढियाँ सफलता की,
जीवन में अब चढ़ना है.
भूखे रहकर बहुत मैं सोया,
पेट मुझे भी भरना है.
फटे-पुराने छोड़ चीथड़े,
कपड़े नए पहनना है.
बोझ तले मैं तड़प रहा था,
अम्बर में अब उड़ना है.
पुरुषार्थ-चतुष्टय प्राप्ति के पथ पर,
मुझको आगे बढ़ना है.

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Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on January 13, 2011 at 9:07pm
बहुत ही सुंदर रचना , पढ़ने और पढ़ने हेतु प्रेरित करती यह रचना यक़ीनन खुबसूरत है , बधाई राजेश मिश्रा जी |
Comment by आशीष यादव on January 13, 2011 at 9:53am

sab padhe, sab badhe.

ji awashya, aaj ka bachpan hi to desh ka bhawishya hai| agar aaj wo padhne ko kahe to fir hamaare desh ko aage jaane se koi nahi rok sakta.

achchhi rachna ke liye badhaai.

Comment by Ratnesh Raman Pathak on January 12, 2011 at 7:33pm
aadraniya mishra jee
aapki is rachna ki chand laaine bahut kuchh bayan kar rahi hai.....aisa lag raha hai ...koi desh ka bhavishya apne adhikaar ki maang kar karta hua ....gattar se nikalkar duniya dekhne ko betab hai.......dhanyawad.

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