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ग़ज़ल नूर की- दर्द है तो कभी दवा है ये


दर्द है तो कभी दवा है ये,
इश्क़ है या कि मोजज़ा है ये.
.
जो बिख़रने का सिलसिला है ये
ख़ुशबू होने ही की सज़ा है ये.
.
हम जो रोते हैं कुफ़्र होता है
मज़हब-ए-इश्क़ में मना है ये.
.
अपनी ताक़त को वो समझता है  
हुस्न के साथ मसअला है ये.
.
ख़त भला तेरा मैं जलाऊँगा?
आँसुओं से भभक गया  है ये.
.
हम तो फिरऔन इसको कहते हैं
ये समझता रहे ख़ुदा है ये. 
.
ग़म यहीं है यहीं कहीं होगा
तेरे देखे से छुप गया है ये.
.
निलेश "नूर"
मौलिक / अप्रकाशित 

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 9, 2022 at 6:56pm

आ. भाई नीलेश जी, सादर अभिवादन। सुंदर गजल हुई है। हार्दिक बधाई।

Comment by Nilesh Shevgaonkar on November 9, 2022 at 11:42am

धन्यवाद आ. महेंद्र जी,
मना पर विस्तृत जवाब नीचे कमेंट में है ..
सादर 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on November 9, 2022 at 11:42am

धन्यवाद आ. बृजेश जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on November 9, 2022 at 11:41am

आ. रवि जी,

ग़ज़ल पर आने का शुक्रिया.. समर सर की बात से कोई इनकार नहीं है लेकिन भाषा जिस तरह एवोल्व होती है मैं भी उसी तरह के शब्द इस्तेमाल करता हूँ.. पूरा उर्दू साहित्य स्कूल को इस्कूल पढ़ कर फूला नहीं समाता है .. पत्थर और मंदिर को एक काफ़िये में बाँधता है ...सुधार की आवश्यकता वहां है..मैं अगर मना को मना लिख रहा हूँ तो यह जानते हुए लिख रहा हूँ कि विरोध होगा क्यूँ कि 99% हिन्दी समझने वाले कभी मना को मनअ नहीं पढ़ेंगे..
संस्कृत शब्द तृष्णा अगर तिश्ना हो सकता है तो मना को मना लिखने से कौन रोक सकता है ??

आभार 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on November 9, 2022 at 11:35am

धन्यवाद आ. चेतन प्रकाश साहब ..
कार्य कि व्यस्तता मुशायरे में भाग नहीं लेने दे रही. उम्मीद है अगली बार आ सकूं 
आभार 

Comment by Mahendra Kumar on October 6, 2022 at 8:45am

आ. निलेश जी, ख़ूबसूरत ग़ज़ल हुई है। हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए। "मन'अ" के सन्दर्भ में मैं आ. समर सर से सहमत हूँ। इस पर आ.रवि भसीन जी ने मज़बूत तर्क रखा है। पूर्व में मैंने भी कई शब्दों को उनके ग़लत रूप में बरता है पर आ. समर सर के टोकने के बाद उन्हें बदल दिया या ख़ारिज कर दिया। विचार कीजिएगा। सादर।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 4, 2022 at 8:21pm

बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल हुई आदरणीय नीलेश जी...

Comment by रवि भसीन 'शाहिद' on October 1, 2022 at 9:53am

आदरणीय नीलेश शेवगांवकर साहिब, इस ख़ूबसूरत ग़ज़ल पर आपको हार्दिक बधाई।
/आपका कहना सही है लेकिन मैं मना को मनअ न लिखता हूं और न बोलता हूं।/
आपकी इस बात से मैं सहमत नहीं हूँ जनाब, ये आपके लिखने या बोलने की बात नहीं है, आख़िर 'मनअ' के एक standard हिज्जे और तलफ़्फ़ुज़ हैं। अगर हर ग़ज़लगो अशआर में अपने बोलने के हिसाब से या जो वज़्न उसे समझ आता है उसके अनुसार वज़्न रखने लगेगा तो इस कला का बुरा हश्र होगा, और फिर हमें लुग़ात और जनाब समर कबीर साहिब जैसे उस्तादों की भी कोई ज़रुरत नहीं रहेगी।

Comment by Chetan Prakash on October 1, 2022 at 8:24am

पुनश्च  : ग़ज़ल कहने के  _कौशल  ! शुभ प्रभात  !

Comment by Chetan Prakash on October 1, 2022 at 8:20am

आ. नीलेश शेवगांवकर साहब,  बहुत खूबसूरत ग़ज़ल कही आपने। विशेषत: यह शे'र मुझे अच्छा लगा,

अपनी ताक़त को वो समझता है,

हुस्न के साथ  मस अला  हे  ये "।

हाँ, लेकिन जनाब  एक  शिक़ायत भी है, ओ बी ओ के मुशायरे में आपके  ग़ज़ल कहने के  बेलौस और  परामर्श का लाभ  हमको नहीं मिल रहा है !

सादर 

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