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मेरे किरदार पर धब्बा नही था

ग़ज़ल : 1222,1222,122

मेरे किरदार पर धब्बा नहीं था
तुम्हीं ने ग़ौर से देखा नही था

मेरे ग़म को समझता कोई कैसे
कोई मेरी तरह तनहा नहीं  था

मैं इक ठहरा हुआ तालाब था बस
वो दरिया था कभी ठहरा नहीं  था

तेरी हर बात सच्ची थी हमेशा 
फ़क़त लहजा ही बस अच्छा नहीं था

न आया जो नदी के पास यारो
वो प्यासा था मगर इतना नहीं था

नज़र मेरी थी मंज़िल पर हमेशा
थकन का पाओं से रिश्ता नहीं  था

तुम इसको जीत समझो "जोहना" पर 
हक़ीक़त ये है वो हारा नहीं था

साध्वी ‘जोहना’

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by Ram Ashery on May 23, 2021 at 8:34pm
अति सुंदर अभिव्यक्ति आप्को इस कृति के लिए बहुत बहुत बधाई स्वीकार हो
Comment by Chetan Prakash on April 6, 2021 at 10:05am

आदाब, 'अमीर' साहब, मकते के सानी का तक्तीअ , 'अमीर +' अब , अमीरब ( 1212) इश्क़ ( 21 ) +में खुद (  22 ) को ज (11 ) ला के (22 ) देख ते हैं ( 2122 ) होता है, आभार  ! 

Comment by Sadhvi Saini on September 13, 2020 at 10:41am

लक्ष्मण धामी जी, अदाब, मैंने एडिट करने की कोशिश की थी मगर हुई नहीं! आपका तहे -दिल से शुक्रियाI प्रणाम!

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 13, 2020 at 8:30am

आ. साध्वी सैनी जी, गजल का प्रयास अच्छा हुआ है । हार्दिक बधाई । सुधीजनों के मार्गदर्शन से रचना बेहतर निखार पा सकती है।

Comment by Sadhvi Saini on September 13, 2020 at 12:04am

आदरणीय Samar kabeer जी,मेरी ग़ज़ल को ओ बी ओ  में शामिल करने के लिए शुक्रिया और सभी सुझावों के लिए भी आपका   तहे- दिल से शुक्रगुज़ार हूँ! सादर प्रणाम!

Comment by Sadhvi Saini on September 12, 2020 at 11:57pm

आदरणीय Harsh Mahajan ji अदाब, ग़ज़ल पर आपकी आमद और सुख़न नवाज़ी का तहे-दिल से शुक्रियाI सादर!

Comment by Sadhvi Saini on September 12, 2020 at 11:52pm

आदरणीय DR ARUN KUMAR SHASTRI जी आदाब, ग़ज़ल पर आपकी आमद और सुख़न नवाज़ी का तहे -दिल शुक्रिया I सादर!

Comment by Sadhvi Saini on September 12, 2020 at 11:46pm

आदरणीय अमरूदीन अमीर जी स्वागत के लिए तहे दिल से शुक्रिया! सभी सुझावों  के लिय आपकी शुक्रगुज़ार हूँI सादर प्रणामI 

Comment by Harash Mahajan on September 12, 2020 at 8:25pm

बहुत ही खूबसूरत ख्यालों भरी रचना आदरणीय सैनी जी। 

सादर

Comment by Samar kabeer on September 12, 2020 at 4:23pm

मुहतरमा साध्वी सैनी जी आदाब, ओबीओ पर आपका स्वागत है ।

ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,और इस ग़ज़ल की फ़ीचर ब्लॉग में शामिल होने पर बधाई स्वीकार करें ।

बहुत कुछ समझाइश जनाब अमीर जी दे ही चुके हैं ।

'तिरी हर बात सच्ची थी हमेशा 
फकत लहज़ा ही बस अच्छा नहीं था'

उचित लगे तो इस शैर को यूँ कर लें:-

'तेरी हर बात सौ फ़ीसद थी सच्ची

मगर लहजा तेरा अच्छा नहीं था'

'नदी के पास आया ही नहीं वो
वो प्यासा था मगर इतना नहीं था'

इस शैर के दोनों मिसरों में 'वो' शब्द खटकता है,इस शैर को यूँ कह सकती हैं:-

'न आया जो नदी के पास यारो

वो प्यासा था मगर इतना नहीं था'

'वो बाज़ी ‘जोहना’ जीती थी तुमने
मगर सच ये है वो हारा नहीं था'

मक़्ते के दोनों मिसरों में 'वो' शब्द खटकता है,कथ्य भी साफ़ नहीं है,यूँ कर सकती हैं :-

'तुम इसको जीत समझो 'जोहना' पर

हक़ीक़त ये है वो हारा नहीं था'

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