For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

किनारों ने इसे बाँधा हुआ है(ग़ज़ल)

बह्र-1222/1222/122

समंदर आज तक ठहरा हुआ है
किनारों ने इसे बाँधा हुआ है[1]

जुदा आँचल से मत करना अभी तो
परिंदा छाँव में बैठा हुआ है[2]

मियाँ तक़दीर में बस मुफ़लिसों की
ज़मीन-ओ-आसमाँ लिक्खा हुआ है[3]

हमारे जिस्म की क़ीमत वही जो
हमारे इल्म में ख़र्चा हुआ है[4]

उसे तोहफे में देना आइना जो
ग़ुरूर-ए-हुस्न में डूबा हुआ है[5]

हमें लगता था तारे हम-क़दम हैं
निगाहों को बड़ा धोखा हुआ है[6]

कहाँ बुनियाद हम रिश्तों की डालें
यहाँ हर एक घर टूटा हुआ है[7]

हवाएँ शहर की लगने लगी हैं
दुप्पटा फूल का सरका हुआ है[8]

नहीं खाऊँगा उस बस्ती की रोटी
अमीरों से मेरा झगड़ा हुआ है[9]

सदा रूमाल में रखना वो मोती
जो चश्म-ए-मीत से टपका हुआ है[10]

-रूपम कुमार 'मीत'

"मौलिक व अप्रकाशित"

Views: 87

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 20, 2020 at 5:56pm

आ. भाई रूपम कुमार जी, ग़ज़ल का प्रयास बहुत अच्छा हुआ है। बधाई स्वीकार करें । शेष आ. भाई रवि जी के सुझावों पर गौर करेंगे तो और निखार आ जायेगा। 

Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on July 19, 2020 at 5:36pm

आद0 रूपम कुमार जी सादर अभिवादन। अच्छी ग़ज़ल हुई है। बधाई स्वीकार कीजिये। रवि भसीन साहब की बातों का संज्ञान लीजिये

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on July 18, 2020 at 10:53pm

जनाब रूपम कुमार 'मीत' जी आदाब, बड़ी अच्छी ग़ज़ल कही है आपने दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ। जनाब रवि भसीन 'शाहिद' जी की बातों का संज्ञान लें। सादर। 

Comment by रवि भसीन 'शाहिद' on July 18, 2020 at 7:42pm

आदरणीय रूपम कुमार 'मीत' भाई, ग़ज़ल का प्रयास बहुत अच्छा हुआ है, बधाई स्वीकार करें। कुछ अशआर बहुत अच्छे लगे, विशेष तौर पर मक़्ता। कुछ सुझाव आपकी ख़िदमत में पेश कर रहा हूँ:

/किनारों ने जिन्हें बाँधा हुआ है
वो दरिया आज तक ठहरा हुआ है[1]/
मतले के ऊला में 'जिन्हें' को 'जिसे' कर लीजिये, क्यूँकि 'दरिया' एकवचन है।

/सुकूँ मिलता है माँ आँचल में जैसे
परिंदा छाँव में बैठा हुआ है[2]/
ऊला में 'के' की कमी महसूस हो रही है (माँ के आँचल में)। अगर उचित लगे तो ऊला यूँ कर लीजिये:
मिला हो जैसे उसको माँ का आँचल

/हमें लगता था तारें हम-क़दम हैं
निगाहों को बड़ा धोखा हुआ है[6]/
ऊला में 'तारें' को 'तारे' कर लीजिये।

/कहाँ बुनियाद हम रिश्तों की डाले
यहाँ हर एक घर टूटा हुआ है[7]/
ऊला में 'डाले' को 'डालें' कर लीजिये।

/हवा, जल, आग, धरती और बादल/
हमारे जिस्म में फैला हुआ है[8]
इस शे'र के सानी में 'फैले हुए हैं' आना चाहिए, क्यूँकि ऊला में पाँच चीजें गिनवाई गई हैं, लेकिन उससे रदीफ़ निभ नहीं पाएगी। इस शे'र का ऊला बदलने का प्रयास करें।

/हवाए शहर की लगने लगी है
दुप्पटा फूल का सरका हुआ है[9]/
ऊला में 'हवाए' को 'हवाएँ' और 'है' को 'हैं' कर लीजिये।

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

Rupam kumar -'मीत' commented on Rupam kumar -'मीत''s blog post हम उनकी याद में रोए भी मुस्कुराए भी (~रूपम कुमार 'मीत')
"आ. अमीरुद्दीन साहिब जी, बहुत शुक्रिया आपका, एक कोशिश हमने भी की है, आपने मेरे ख़याल को मरने नहीं…"
21 minutes ago
अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on Rupam kumar -'मीत''s blog post हम उनकी याद में रोए भी मुस्कुराए भी (~रूपम कुमार 'मीत')
"जनाब रूपम कुमार जी,  //यक़ीन कैसे करें बे-वफ़ा की बातों पर हम उनके दिल में हैं तो चीर कर दिखाए…"
53 minutes ago
Nilesh Shevgaonkar commented on अमीरुद्दीन 'अमीर''s blog post ग़ज़ल (वो नज़र जो क़यामत की उठने लगी)
"आ. "अमीर" साहब,यूँ तो मैं अपनी आख़िरी टिप्पणी कर  चुका हूँ अत: पुन: आना ठीक नहीं लगता…"
59 minutes ago
अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on अमीरुद्दीन 'अमीर''s blog post ग़ज़ल (वो नज़र जो क़यामत की उठने लगी)
"//मेरी पिछली टिप्पणी में मुझ से एक त्रुटी हुई है जिसकी ओर ध्यान दिलाने के लिए आपका आभार लेकिन इस के…"
2 hours ago
Nilesh Shevgaonkar commented on Nilesh Shevgaonkar's blog post ग़ज़ल नूर की - तर्क-ए-वफ़ा का जब कभी इल्ज़ाम आएगा
"शुक्रिया आ. दण्डपाणी जी आभार "
2 hours ago
Nilesh Shevgaonkar commented on Nilesh Shevgaonkar's blog post ग़ज़ल नूर की - तर्क-ए-वफ़ा का जब कभी इल्ज़ाम आएगा
"शुक्रिया आ. रूपम जी,आपके लिए आज का टास्क है कि इस बह्र के अरकान लिखें..इससे आप की भी प्रैक्टिस हो…"
2 hours ago
dandpani nahak posted a blog post

ग़ज़ल 2122 1212 22

इश्क़ से ना हो राब्ता कोईज़िन्दगी है की हादसा कोईवो पुराने ज़माने की बात हैअब नहीं करता है वफ़ा…See More
2 hours ago
अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on अमीरुद्दीन 'अमीर''s blog post ग़ज़ल (वो नज़र जो क़यामत की उठने लगी)
"आदरणीय जनाब दण्डपाणि नाहक़ साहब आदाब, ग़ज़ल पर आपकी आमद हौसला अफ़ज़ाई और ग़ज़ल पसंद करने के लिए…"
3 hours ago
dandpani nahak commented on अमीरुद्दीन 'अमीर''s blog post ग़ज़ल (वो नज़र जो क़यामत की उठने लगी)
"आदरणीय अमीरुद्दीन 'अमीर' जी आदाब बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है हार्दिक बधाई स्वीकार करें"
4 hours ago
dandpani nahak commented on Nilesh Shevgaonkar's blog post ग़ज़ल नूर की - तर्क-ए-वफ़ा का जब कभी इल्ज़ाम आएगा
"आदरणीय नीलेश 'नूर' जी आदाब बेहतरीन ग़ज़ल हुई है हार्दिक बधाई स्वीकार करें ! मतला क्या ख़ूब…"
5 hours ago
Rupam kumar -'मीत' commented on Nilesh Shevgaonkar's blog post ग़ज़ल नूर की - तर्क-ए-वफ़ा का जब कभी इल्ज़ाम आएगा
"आ. निलेश 'नूर' साहिब, मतला बहूत खूब कहा आपने , मुझे बह्र एक दम से पढ़ के समझ नहीं आती,…"
6 hours ago
Nilesh Shevgaonkar posted a blog post

ग़ज़ल नूर की - तर्क-ए-वफ़ा का जब कभी इल्ज़ाम आएगा

तर्क-ए-वफ़ा का जब कभी इल्ज़ाम आएगा हर बार मुझ से पहले तेरा नाम आएगा. .अच्छा हुआ जो टूट गया दिल तेरे…See More
7 hours ago

© 2020   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service