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मुँह ज़ख्मों के शे'र सुनाकर सीता है

मुँह ज़ख्मों के शे'र सुनाकर सीता है
शाइर भी तो इक दर्जी के जैसा है[1]
.
दोस्त मुझे बस तुझसे एक शिकायत है
तू पहले से काफ़ी सिगरेट पीता है[2]
.
जिसको प्यार नहीं मिल पाया वो लड़का
ज़िंदा है पर लाश के जैसे जीता है[3]
.
उसके हाथ में मेरे प्यार की मिट्टी है
जिस मिट्टी में प्यार के बीज वो बोता है[4]
.
जिस बस्ती में प्यार से सौदा हो जाए
उस बस्ती का हर इक सिक्का खोटा है[5]
.
तुमने एक किताब कही थी पढ़ने को
उसको पढ़कर 'मीत' हमेशा रोता है[6]
.

रूपम कुमार -'मीत'

मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 149

Comment

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Comment by Samar kabeer on June 4, 2020 at 2:27pm

हाँ, ठीक है ।

Comment by Rupam kumar -'मीत' on June 4, 2020 at 1:58pm
दोस्त मुझे बस तुझसे एक शिकायत है
तू पहले से काफ़ी सिगरेट पीता है   
मुहतरम समर कबीर साहब जी क्या यह शेर उचित लग रहा है अब? 
Comment by Samar kabeer on June 4, 2020 at 1:50pm

इसकी तक़ती'अ ऐसे नहीं होगी,22 से करें:-

तू पह-22

ले से-22

ज़ियादा-122 जो उचित नहीं ,

सिगरेट-22

पीता-22

है-2

'तू पहले से काफ़ी सिगरेट पीता है'

ये मिसरा बह्र के हिसाब से ठीक है ।

Comment by Rupam kumar -'मीत' on June 4, 2020 at 12:52pm

मुहतरम समर कबीर साहब जी,

तू पहले       222

से ज़ि-यादा  11-22

सिगरेट        22

पीता है        222

22/22/22/22/22/2 यह मिसरा भी तो इस बह्र पर बैठ रहा है इस में क्या दोष है ?

"तू पहले से काफ़ी सिगरेट पीता है" यह ठीक होगा साहब?

Comment by Samar kabeer on June 4, 2020 at 12:15pm

// "तू पहले से ज़्यादा सिगरेट पीता है"//

'ज़्यादा' शब्द पर जनाब अमीर साहिब से सहमत हूँ,इस मिसरे को उचित लगे तो यूँ कर सकते हैं:-

'और ज़ियादा अब तू सिगरेट पीता है'

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on June 3, 2020 at 11:01pm

रूपम कुमार जी, आज शायद उस्ताद मुहतरम ओ बी ओ पर नहीं हैं। 

तू पहले       222

से ज़ि-यादा  11-22

सिगरेट        22

पीता है        222

रूपम जी 'ज़्यादा' लफ़्ज़ सहीह नहीं है। सही लफ़्ज़ "ज़ियाद:" है जो 122 मात्रिक है। मेरी हक़ीर राय में मिसरे की तक़तीअ ऐसे समझी जाए तो शायद सहीह है। वैसे सटीक इस्लाह तो उस्ताद ए मुहतरम की ही होगी। 

Comment by Rupam kumar -'मीत' on June 3, 2020 at 4:57pm

मुहतरम समर कबीर साहब जी, अगर "तू पहले से ज़्यादा सिगरेट पीता है" यह कर दिया जाए तो क्या सही रहेगा? मार्ग दर्शन कीजिए, और हाँ अब से कुछ टिप्पणी के बाद ही इस्लाह क़बूल करूँगा। शुक्रिया

Comment by Samar kabeer on June 2, 2020 at 6:19pm

मैंने रूपम जी का मूल शैर नहीं पढ़ा,मैं सिर्फ़ ये अर्ज़ कर रहा हूँ कि ज़ख़्म सिये जाते हैं,इसमें ज़ख़्म का मुँह सीना ज़रूरी नहीं पूरे ज़ख़्म को सिया जाता है । और 'दर्ज़ी' यहाँ इस्तिआरा है ।

अब इस पर आगे बहस नहीं करूँगा ।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on June 2, 2020 at 5:23pm

मुहतरम जनाब समर कबीर साहिब, आदाब। जी हाँ मैंने डाॅक्टरों को ज़ख़्मों को सीते हुए देखा है। बल्कि एक बार ख़ुद मेरे ज़ख्मों के मुँह पर टाँके लगे थे जो मैंने लाईव देखे थे। रूपम कुमार जी ने मतले का जो ऊला मिसरा लिया था "दिल के ज़ख़्म को शे'र सुनाकर सीता है" उसको सानी मिसरे में दर्जी से मुन्सलिक किया था---"शाइर भी तो इक दर्जी के जैसा है[1]" तो यहाँ दर्जी की तरह सीने की समझ पैदा हो रही है, जैसे दर्जी उधड़े हुए या फटे हुए कपड़े सीता है, वो डाॅक्टरों की तरह (जैसे डाॅक्टर सर्जरी के दौरान ज़ख़्मों के अन्दरूनी हिस्सों को रफ़ू करता है) कपड़ों को रफ़ू नहीं करता है। 

 

दूसरी बात रूपम जी ने कहा था कि "दिल केज़ख़्म को शे'र सुनाकर सीता है" यहांँ पर "दिल के" बहुवचन हैं जबकि , " ज़ख्म" और     " शे'र" एकवचन, अगर "दिल के ज़ख्म" ही रहने दिया जाता तो क्या वाक्य विन्यास ठीक रहता? स्पपष्टीकरण सादर प्रस्तुत है। फििर भी यदि आप सन्तुष्ट नहीं हैं तो क्षमा प्रार्थी हूँ। 

 

Comment by Samar kabeer on June 2, 2020 at 3:47pm

//मतले का ऊला मिसरा "दिल के ज़ख़्म को शे'र सुनाकर सीता है" फिट नहीं है क्योंकि ज़ख़्मों को भरा जाता है सिया नहीं जाता//

जनाब अमीर साहिब,क्या आपने डॉक्टरों को ज़ख्मों पर टाँके लगाते नहीं देखा? 

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