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उजड़कर क्या बसेगा गांव मेरा
यहाँ डालो ना कोई जंग-ए-डेरा

की रातें जा चुकी प्राता है शायद
घनी है तीरगी अब हो सबेरा

नज़र आये भी कैसे कोई गलती
कोई दिखता नहीं इतना घनेरा

ज़हन में देखो है नफ़रत सभी के
मिटे भी तो भला कैसे अंधेरा

तू भी रहता है बस उसके भरोसे
कोई तो आसमां भी हो की तेरा


(अप्रकाशित व मौलिक)

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Comment by Aazi Tamaam on January 31, 2021 at 4:38pm

Thanks a lot respected sir musafir

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 31, 2021 at 2:44pm

आ. भाई आजी तमाम जी, सादर अभिवादन । गजल के प्रयआस के लिए हार्दिक बधाई। शेष आ.  समर जी  कह चुके हैं।

Comment by Aazi Tamaam on January 24, 2021 at 7:58pm

धन्यवाद आ० समर कबीर गुरु जी मार्गदर्शन करते रहें

Comment by Samar kabeer on January 24, 2021 at 2:58pm

जनाब आज़ी तमाम जी आदाब, आपकी ग़ज़ल अभी समय चाहती है, अध्यन करे,इस प्रस्तुति पर बधाई आपको ।

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