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रानी सारन्धा (भाग -1):-मोहित मुक्त

अँधेरी रात थी पंक्षी चहककर निवीणो मे सुप्त थे।
पर बुन्देल की दो नारियों के नयन निंद्रा मुक्त थे।
अनिरुद्ध रानी शीतला के मांग सुहाग की लाली।
सारन्धा थी उस योद्धा की भोली बहन मतवाली।

था वक्त जब योद्धाओं को बाहुबल की आन थी।
रणक्षेत्र की शौर्यगाथाएं उनकी प्रखर पहचान थी।
तब युद्धभूमि से जीतकर हीं आना था तो आते थे।
वरना मस्तक रणदेवी को हँसते हंसते चढ़ाते थे।

अनिरुद्ध था बुंदेलों की आँखों का चमकता तारा।
दोस्तों का परम दोस्त दुश्मन का निर्मम हत्यारा।
ब्याह रानी शीतला को जब से महल मे लाया था।
एक दिन भी प्रणयलिप्त हो समय नही बिताया था।

ऐसा नहीं उसके ह्रदय मे प्रेमरस का प्रवाह नहीं।
ऐसा नही उस योद्धा को प्रिया मिलन की चाह नहीं।
पर वतन अशांत हो जब जब पुकारा करता है।
वीर कहाँ तब रंग रास में समय गुजारा करता है।

कितनी बार कहा शीतला ने युद्ध त्याग दो प्यारे।
मैं अरण्य मे रह लुंगी हँस के साथ तुम्हारे।
तुमसे बिछड़ कर जीना अब मुझको ना भाता है।
तुम रहते हो रण मे ,मेरा ह्रदय जलता जाता है।

पर जिनका भाग्य हीं हो लिखा गया तलवार से।
वो कहां विंध सकते हैं नशीले नयन के वार से।
उस रात भी अनिरुद्ध अपने दुर्ग से दूर था।
तभी रानी शीतला का चिंतित हृदयमयुर था।

पलंग पर लेटी शीतला थी नींद उसे ना आया।
सारन्धा ने मधुर कंठ से गीत विरह का गाया।
तुनककर बोली शीतला क्या नींद तुम्हे ना आती है।
एक तो मुझको नींद नही ,ऊपर से तू जलाती है।

सारन्धा बोली नींद कहाँ आएगी तुमको भाभी।
जो भैया लेकर गए हुए हैं तेरी नयन की चाभी।
इतने मे दुर्ग कपाट खुला अनिरुद्ध अंदर आया।
लाल मुख हथियार विहीन निस्तेज नयन में छाया।

स्तब्ध रानी क्या कहती सारन्धा ने हीं  पूछा।
कर दिया भैया तूने मस्तक सबका ऊंचा ?
वीरगति जब सबने पाई तू जिन्दा क्यों आया।
क्या हमारे इतिहास ने हमको यहीं सिखाया ?

अनिरुद्ध ने कहा बहन तूने आँख है खोला।
अपने भई के जमीर को सही वक्त पर तोला।
अब जाता हूं बन विजेता तेरे पास मै आऊंगा।
या रण मे हाहाकार मचाकर वीरगति को पाउँगा।

अनिरुद्ध तो  चला गया शीतला हतप्रभ रह गयी।
ये सारन्धा मेरे पिया से जाने क्या क्या कह गयी।
फूट पड़ा शीतला के कोप का बंद पड़ा था सोता।
चोली मे छिपा के रखती गर तेरा पति जो होता।

स्वाभिमान से ओत-प्रोत सारन्धा फुंफकारी।
अबतक चल गयी होती उसपर मेरी कटारी।
शीतला बोली देखूंगी,अरे  तेरा ब्याह भी होगा।
सारन्धा को आन के आगे प्रियपरवाह न होगा।

महरौनी को जीतकर था अनिरुद्ध वापस आया।
सारन्धा का चम्पतराय संघ उसने संबंध रचाया।
समय दूरियां तय कर गया धीरे धीरे मीलों में।
पर वह कांटा चुभा रहा दोनो नारी दिलों में।

:-मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by Mohit mishra (mukt) on March 29, 2017 at 7:18pm

आदरणीय  सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप'  बहुत बहुत धन्यवाद 

Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on March 29, 2017 at 7:27am
आदरणीय मोहित मुक्त जी सादर अभिवादन, बहुत अच्छी ऐतिहासिक घटनाओं का आधार लेकर सरल शब्दों में उमड़ा सृजन, बधाई।
Comment by Samar kabeer on March 28, 2017 at 10:02pm
ये मंच सीखने सिखाने में अपना सानी नहीं रखता,मुतमइन रहिये ।
Comment by Mohit mishra (mukt) on March 28, 2017 at 9:57pm

मैं तो अभी सीख रहा हूँ आप जैसों का मार्गदर्शन मिलता रहे तो बड़ी कृपा होगी। 

Comment by Samar kabeer on March 28, 2017 at 9:53pm
बहुत ख़ूब है भाई ।
Comment by Mohit mishra (mukt) on March 28, 2017 at 9:50pm

आदरणीय  Samar kabeer जी आपका स्नेह प्राप्त हुआ मेरे लिए यह सौभाग्य की बात है। यह रचना रामधारी जी की काब्य शैली पर आधारित है, मैं उनका प्रशंसक भी हूं 

Comment by Samar kabeer on March 28, 2017 at 9:22pm
जनाब मोहित मुक्त जी आदाब,इतिहास के पन्नों से बहुत उम्दा सिलसिला है, इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।
ये रचना किस विधा में है ?
Comment by Mohit mishra (mukt) on March 28, 2017 at 7:46pm

आदरणीय  Sushil Sarna  जी उत्साहवर्धन के लिए सहृदय धन्यवाद 

Comment by Sushil Sarna on March 28, 2017 at 2:53pm

आ.मोहित मुक्त जी इस ऐताहिसिक सुंदर प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई। 

कृपया ध्यान दे...

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