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'सत्य अब तक!' (लघुकथा)

"ओये! .. अबकी बारी, मंदिर-मस्जिदों पे भारी!"


"नईं बे! चुनावी पारी की भेंटें 'वारि' ... ! वोटों की यारी, तैयारी जारी!"


"हां .. हां .. तुष्टिकरण जब तक, मज़हबी अतिक्रमण तब तक!"


"नईं बे! सियासी अतिक्रमण जब तक, वोट-बैंक तब तक! ... सियासत तब तक!"


"हां .. हां .. ऐसी 'ख़ुदग़र्ज़' सियासत जब तक, हमारी 'आफ़तें' तब तक!"


"नईं बे! 'ऐसी' जनता जब तक, 'ऐसी' सियासत तब तक और 'ऐसा' जनतंत्र तब तक!"


(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani 20 hours ago

अनुमोदन और हौसला अफ़ज़ाई के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत शुक्रिया मुहतरम जनाब समर कबीर  साहिब, जनाब  लक्ष्मण धामी 'मुसाफिरसाहिब और मुहतरमा नीलम उपाध्याय साहिबा।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on Wednesday

आ. भाई शैख़ शहज़ाद जी, प्रभावशाली कथा हुई है। हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Neelam Upadhyaya on Monday

 आदरणीय शेख उस्मानी जी, अच्छी लघुकथा हुई है।  बधाई। 

Comment by Samar kabeer on Sunday

जनाब शैख़ शहज़ाद उस्मानी जी आदाब,प्रभावशाली लघुकथा हुई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on Saturday

मेरी रचना पर समय देकर अनुमोदन कर विचार सांझा करने और मेरी हौसला अफ़ज़ाई हेतु तहे दिल से बहुत-बहुत शुक्रिया मोहतरम जनाब डॉ. विजय शंकर साहिब और जनाब

तेजवीर सिंह साहिब। 

Comment by TEJ VEER SINGH on Saturday

हार्दिक बधाई आदरणीय शेख उस्मानी साहब जी।बेहतरीन कटाक्ष युक्त लघुकथा । यही एक मात्र सत्य है कि साम दाम दंड भेद कुर्सी पर पहुंचो।

Comment by Dr. Vijai Shanker on September 15, 2018 at 2:49am

आदरणीय शेख़ शहज़ाद उस्मानी जी , बात तो दमदार है , “ ऐसी' जनता जब तक, 'ऐसी' सियासत तब तक और 'ऐसा' जनतंत्र तब तक!".
सच तो यही है कि एक बार सारी जनता जाग जाए और सिर्फ जनता बन कर चुनाव निपटा दे , सब कुछ बहुत अच्छे से निपट जाएगा।
इस प्रभावशाली प्रस्तुति के लिए बधाई , सादर।

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