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इक तेरी तस्वीर और अंतिम तिरा वो फैसला..

बह्र 2122-2122-2122-212

.

दे रहा है ज़िस्म को जो दर कदम पर इक सिला।।
इक तेरी तस्वीर और अंतिम तिरा वो फैसला।।

खंडरों की शानों शौक़त दिन ब दिन बेहतर हुई।
जैसे पतझड़ कह रहा हो लौट मुझको मय पिला।।

बढ़ रहा हूँ कुछ कदम, हूँ कुछ कदम ठहरा हुआ।
   बाद तेरे टूटने जुड़ने लगा है हौसला।।

ना कभी ओझल हुआ था,ना ही ओझल हो कभी।
इसमें है अहसासे उलफत ,इश्क का जो भी मिला।।

चल चलें कुछ दूर पैदल, दो कदम मंजिल बची ।
दो कदम सायद के चलकर सोंच पायें क्या मिला।।

जब फ़िजा ने रंग बदले ,जिंदगी ने राह जब।
जब हवायें तेज तूफानी चली तब घर जला।।

जीस्त बेशक़ आ खड़ी अपने मुकम्मल ठौर पर।
मौत द्वारे खटखटा कर दे रही यह इत्तला ।।

.

आमोद बिंदौरी / मौलिक अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Samar kabeer on March 23, 2018 at 10:35am

ऊला मिसरा यूँ कर लें:-

'ज़िन्दगी भर की कमाई ख़र्च हम जिनपर किये'

Comment by amod shrivastav (bindouri) on March 23, 2018 at 10:19am

आ समर दादा प्रणाम 

दादा 7 वे में इजाफत हुई है कमाई में ई की क्या ये जायज है ...??

अपनी जानकारी के लिए मार्गदर्शन चाहता हूँ 

Comment by Samar kabeer on March 22, 2018 at 11:20pm

इसमें क़ाफिये सही हैं ।

Comment by amod shrivastav (bindouri) on March 22, 2018 at 7:55pm
एक वही तस्वीर और अंतिम तिरा वो फैसला।।
बह्र 2122-2122-2122-212

एक है मंदिर ओ मस्जिद, एक है सब का खुदा।
दे जो जिस्मों को रहा है , हर कदम पर हौसला।।

बढ़ रहा हूँ कुछ कदम मैं , कुछ कदम ठहरा हुआ ।
अब बहुत उलझा रहा है जिंदगी का रास्ता।।

मन में मेरे कर रहा है हौसले से द्वन्द अब ।।
इक तेरी तस्वीर और अंतिम तेरा वो फैसला।।

चल चलें कुछ दूर पैदल, दो कदम मंजिल बची ।
दो कदम सायद के चलकर सोंच पायें क्या मिला।।

ना कभी ओझल ये लम्हा हो मेरे इस जहन में ।
इसमें है अहसासे उलफत ,इश्क में जो भी मिला।।

जीस्त बेशक़ आ खड़ी अपने मुकम्मल ठौर पर।
मौत दर को खटखटा अब कर रही ये इत्तला।।

खर्च जिनपर कर दिए हम जिंदगी भर की कमाई।
मुझसे अब वो पूछते हैं जिंदगी भर क्या किया ।।

खोज अभी है अधूरी , काश के मिल जाए वो ।
जिंदगी भर गुनगुना लूँ , हो मुकम्मल काफिया ।।


आमोद बिंदौरी / मौलिक अप्रकाशित
Comment by amod shrivastav (bindouri) on March 22, 2018 at 6:21pm

आ सर प्रणाम सर हुआ यूँ की मैं काफिये में उलझ गया था .. सुरुआत ...मतला यूँ हुआ था 

दे रहा है जिस्म को जो दर कदम पर हौसला ।

इक तेरी तस्वीर और अंतिम तेरा वो फैसला ।।

Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on March 22, 2018 at 3:34pm

आद0 आमोद जी सादर अभिवादन। काफ़ियाबन्दी मतले से की जाती है।  आपकी काफ़िया ही गलत हो गया है। आप एक बार ग़ज़ल में काफ़िया निर्धारण का नियम पढ़ लें तो यह आ जायेगा।

Comment by amod shrivastav (bindouri) on March 22, 2018 at 12:35pm
आ समर साहब प्रमाण
ठीक है सर ...देखते हैं ।
वैसे तुकान्त ही काफिया होता है जो मुझे मालूम है ।
अब इसमें इला और सला ...में सायद ला काफिया मैं समझा इस लिए लिखे ....आगे की जानकारी कंफर्म करता हूँ ./
Comment by Samar kabeer on March 21, 2018 at 10:55pm

जनाब आमोद बिंदौरी जी आदाब,आपकी ग़ज़ल के क़ाफिये सही नहीं हैं,क़ाफिये की जानकारी के लिए पटल पर आलेख मौजूद हैं,अध्यन करें ।

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