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असाधारण आस

हवा की लहर का-सा

हलका स्पर्ष

कि मानो कमरे में तुम आई

मेरे कन्धे पर हलका-सा हाथ ...

छू कर मुझे, स्वपन-सृष्टि में

पुन: विलीन हो गई

कुछ कहा शायद

जो अनसुना रहा

या जो न कहा

वह मेरे खयालों ने सुना

कोई एक खयाल अधूरा

जो पूरा न हुआ

कण-कण काँप रहे तारों के

तिमिर-तल के तले

खयाल जो पूरा न हुआ

मुराद

बन कर रह गया, जैसे

अँधेरे स्वप्न से जागा कोई, सो गया

तुम्हारे दिल की धड़कन भी

इसी मुराद में थिरकती

तुम्हीं से अलग, पर तुमसे ज़्यादा

वह मुझमें धड़कती

और तुम सुन-सुन उसको

अनपेक्षित-सी, पहुँच जाती थी पास

सिर मेरे कन्धे पर

मेरी साँसों के स्पर्ष से शरमाए

आकांक्षित ओंठ तुम्हारे मुस्करा देते

पलकें कभी खुलती कभी मुंदती

उस स्वप्न-सृष्टि में अनुरंजित तुम

अधजगी-सी सोई निश्चल सरोवर-सी

तुम्हारी वह पहचानी

अपनी-सी धड़कन भी अब है

पुराने घाव-सी

थर्राता शीत-भरा रात का पक्षी

मेरा मन

नि:स्तब्ध .. उदास .. छिन्न-भिन्न

अँधियारे सूने में अब मेरी अनवस्थाएँ गहरी

एक दिया आस का फिर भी जलती लौ से

काँप-काँप है बटोरता रहा

मेरे अस्तित्व के अव्यवस्थित कण

कि लौट आएँगी तुम्हारी निर्दोश आँखे

तुम्हारे स्नेह-स्वरों की अनुगूँज लिए

                 ----------

-- विजय निकोर

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by सतविन्द्र कुमार on January 24, 2018 at 9:05pm

उत्तम उत्तम उत्तमाभिव्यक्ति। हार्दिक बधाई आदरणीय विजय निकोर सर

Comment by surender insan on January 24, 2018 at 12:26pm

बहुत सुंदर कविता जी।

Comment by vijay nikore on January 24, 2018 at 8:51am

//बढ़िया भावपूर्ण रचना//

आपका हार्दिक आभार, महेन्द्र जी। टंकण त्रुटियाँ अभी सही कर रहा हूँ...  आपका दिल से आभार।

Comment by vijay nikore on January 24, 2018 at 8:47am

//बढ़िया अतुकांत, भाव सम्प्रेषण उत्तम//

आपका हार्दिक आभार, सुरेन्द्र जी।

Comment by vijay nikore on January 24, 2018 at 8:47am

//पाठकों को भी उस अहसास से लवरेज करती हुई बहुत ही भावपूर्ण रचना//

आपका हार्दिक आभार, आ. शेख़ शहज़ाद उस्मानी जी।

Comment by vijay nikore on January 24, 2018 at 8:44am

//अनुपम अहसासों का चित्रण किया//

आपका हार्दिक आभार, बृजेश जी।

Comment by vijay nikore on January 24, 2018 at 8:43am

//अनुपम , अप्रतिम सृजन सर ... अंतर्मन के भावों का बड़ी ही कोमलता के साथ चित्रण हुआ है//

आपका हार्दिक आभार, सुशील जी

Comment by vijay nikore on January 24, 2018 at 8:42am

//अत्यंत ही हृदय-स्पर्शी रचना। मन प्रसन्न हो गया//

आपका हार्दिक आभार, मिश्रा जी।

Comment by vijay nikore on January 24, 2018 at 8:41am

//पढ़कर मज़ा आ गया ऐसे मखमली ख़्यालों को//

सराहना के लिए हार्दिक आभार, भाई मोहम्मद आरिफ़ जी।

Comment by Mahendra Kumar on January 23, 2018 at 8:09pm

बढ़िया भावपूर्ण रचना है आ. विजय निकोर जी. हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए. कुछ टंकण त्रुटियाँ हैं, देख लीजिएगा. सादर.

कृपया ध्यान दे...

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