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अशान्तिदूत (लघुकथा)

“उफ्फ़... थक गया ऐसे भाषणों, नारों और झांकियों से!” हांफते हुए वह एक सूखे से पेड़ की शाखा पर जा बैठा। स्वाधीनता दिवस समारोह में सरे आम अपने कुछ साथियों के साथ क़ैद रहा ‘शांति का प्रतीक’ वह कबूतर लम्बे इन्तज़ार के बाद साथियों के साथ गगन में मुक्त तो कर दिया गया था, लेकिन उसने एक अलग उड़ान भरी और धोखे से क़ब्रिस्तान जा पहुंचा था।

“परेड मैदान और मंच पर मौजूद लोगों में से कोई तो तोता, शेर, गधा, बंदर, कुत्ता, गिद्ध या गीदड़ नज़र आ रहा था, तो कोई पप्पू जैसा।” यह सोचते हुए अभी भी उसके कानों में नेताओं के लिए मीडिया से सुने हुए ये नाम गूंज रहे थे। वह बेसुध होकर बैठा रहा।

“लगता है रास्ता भूल गया, तुम ज़रा समझाओ उसको!” कबूतर के पास बैठे गिद्धों में से एक ने अपने साथी से निवेदन किया।

“घबराओ नहीं; तुम सही, सुरक्षित जगह हो! यहां तुम्हें केवल शांति ही दिखाई देगी, शांति ही मिलेगी!” अपने एक पंख से कबूतर को ढांकते हुए वह गिद्ध बोला, “हम शहरों के उन मानव-गिद्धों जैसे नहीं हैं, जो मरे हुए ज़मीर वालों को खाते रहते हैं; अपना ज़मीर मार चुके हैं, अशांति फैला चुके हैं!”

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on November 19, 2017 at 2:33am
मेरी इस लघुकथा पर समय दे कर मेरी हौसला अफ़ज़ाई के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत शुक्रिया मुहतरम जनाब डॉ. आशुतोष मिश्रा जी और आदरणीया नीता कसार जी।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on November 19, 2017 at 2:31am
मेरी इस रचना पर समय दे कर प्रोत्साहित करने के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत शुक्रिया मुहतरम जनाब समर कबीर साहिब, जनाब सलीम रज़ा रीवा साहिब, जनाब तेजवीर साहिब, जनाब मोहम्मद आरिफ़ साहिब, और जनाब सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' साहिब।
Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on November 16, 2017 at 4:19am
आद0सहजाद शेख उस्मानी साहब स्आदर अभिवादन, कटाक्ष करती और एक सन्देश देती इस लघुकथा पर आपको बहुत बहुत बधाई।
Comment by Dr Ashutosh Mishra on November 14, 2017 at 2:09pm

आदरणीय शेख शहजाद उस्मानी जी बहुत ही सटीक लघु कथा है आपकी लघु कथाओं में कुछ नया चिंतन हमेश परिलक्षित होता है इसका शीर्षक भी बहुत अच्छा लगा इस रचना के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें सादर 

Comment by TEJ VEER SINGH on November 14, 2017 at 11:03am

हार्दिक बधाई आदरणीय शेख उस्मानी साहब जी।आदाब।बेहतरीन प्रस्तुति।

Comment by Mohammed Arif on November 13, 2017 at 6:40pm
आदरणीय शेख शहज़ाद उस्मानी जी आदाब, बहुत ही कसावट लिए कटाक्षपूर्ण कथा । बहुत अच्छा कटाक्ष किया आपने शहरी गिद्दों पर । दिली मुबारकबाद क़ुबूल करें ।
Comment by Samar kabeer on November 13, 2017 at 5:01pm
जनाब शैख़ शहज़ाद उस्मानी जी आदाब, बहुत ही उम्दा लघुकथा,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Nita Kasar on November 13, 2017 at 4:54pm
मूक प्राणियों ने अपनी भाषा के जरिये शांति पाठ पढा दिया,उम्दा कथा के लिये बधाई आद० शेख़ शहज़ाद उस्मानी जी ।
Comment by SALIM RAZA REWA on November 13, 2017 at 1:14pm

जनाब शेख़ शहज़ाद उस्मानी साहिब ,
खूबसूरत लघुकथा अशान्तिदूत (लघुकथा)के लिए मुबारक़बाद।

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