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सावन की ग़ज़ल (बह्र-22/22/22/22)

मन में आग लगाये सावन ,
यौवन को भड़काये सावन ।
दो दिल मचल रहे हैं देखो ,
ऐसा राग सुनाये सावन ।
छैल-छबीला , रंगीला-सा ,
बाग़ों में इतराये सावन ।
छन-छन छन-छन करता छत पर
बेहद शोर मचाये सावन ।
खेतों में हरियाली लाये ,
संग घटा के छाये सावन ।
मस्ती में जब झूमे नाचे
ऐसा रंग जमाये सावन ।
गीत मिलन के गाता है ये
झूलों में इठलाये सावन ।
मौलिक एवं अप्रकाशित ।

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Comment by Mohammed Arif on July 18, 2017 at 11:56am
आदरणीय गुरप्रीत जी ग़ज़ल पर प्रतिक्रिया और इस्लाह के लिए बहुत-बहुत आभार ।
Comment by Mohammed Arif on July 18, 2017 at 11:55am
आदरणीय तस्दीक़ अहमद जी ग़ज़ल की सराहना के लिए बहुत-बहुत आभार ।
Comment by Mohammed Arif on July 18, 2017 at 11:53am
आदरणीय रवि शुक्ला जी ग़ज़ल पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर कृतार्थ करने का बहुत-बहुत आभार । आजकल मैं बह्र-ए-मीर की ही साधना कर रहा हूँ ।
Comment by Mohammed Arif on July 18, 2017 at 11:50am
आदरणीय बसंत कुमार जी ग़ज़ल की सराहना के लिए बहुत-बहुत आभार ।
Comment by Mohammed Arif on July 18, 2017 at 11:48am
आदरणीय लक्ष्मण धामी जी ग़ज़ल की सराहना के लिए बहुत-बहुत आभार ।
Comment by Gurpreet Singh on July 17, 2017 at 9:10pm
आदरणीय मोहम्मद आरिफ जी..सावन पर बहुत ही खूब ग़ज़ल कही है आपने..जितनी तारीफ़ की जाए कम होगी..सावन का द्रुष्य खींचते बहुत अच्छे अशआर बने हैं..
क्या छठे शेअर को ऐसे कहा जा सकता है..
मस्ती में सब झूमें नाचें
ऐसा रंग जमाए सावन
Comment by Tasdiq Ahmed Khan on July 17, 2017 at 8:28pm
मुहतरम जनाब आरिफ़ साहिब ,सावन के कई रंग दिखाती सुन्दर ग़ज़ल हुई है ,दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमायें
Comment by Ravi Shukla on July 17, 2017 at 6:05pm
आदरणीय मोहम्मद आरिफ साहब बहरे मीर पर आपका सुंदर प्रयास हुआ है और सावन अशआर में अभिव्यक्त भी अच्छी तरह इ हुआ है ।आपसे अपेक्षा है की बहर के आगे अब कहन में भी ऐसे ही जोहर दिखाएं ।सादर
Comment by बसंत कुमार शर्मा on July 17, 2017 at 5:23pm

वाह सुंदर प्रयास 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 17, 2017 at 1:45pm
बहुत खूब...

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