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ग़ज़ल (जिसको हुआ गुमाँ कि 'ख़ुदा' हो गया है वो)

2212 1211 2212 12

जिसको हुआ गुमाँ कि 'ख़ुदा' हो गया है वो 

रुस्वाई के भंवर में तो ख़ुद जा गिरा है वो

अच्छा भला था 'ख़ुल्द' में 'इब्लीस' हो गया 

झूठी अना की शान को मुन्किर हुआ है वो 

हद से ज़ियाद: ख़ुद पे भरोसे का ये हुआ

थूका जो आस्मान पे मुँह पर गिरा है वो

मिट्टी जो फेंकी चाँद पे मैला नहीं हुआ 

करनी पे अपनी ख़ुद ही तो शर्मा रहा है वो

थोड़ी सी धूप के लिये था जो रवाँ-दवाँ

सूरज को ले के दीप दिखाने खड़ा है वो

जिस ने किया घमंड वही मिट गया है यूँ 

ख़ुद अपनी आग में ही फ़ना हो गया है वो 

उसका शऊर खो गया है आज-कल 'अमीर' 

बेचारा उलझनों में जो उलझा हुआ है वो 

"मौलिक व अप्रकाशित" 

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Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on January 20, 2022 at 6:14pm

आदरणीय सुशील सरना जी आदाब, ख़ाकसार की ग़ज़ल पर आपकी पुर-ख़ुलूस नवाज़िशों का तह-ए-दिल से शुक्रिया जनाब।

Comment by Sushil Sarna on January 20, 2022 at 1:20pm
वाह आदरणीय अमीरुद्दीन साहिब बहुत खूबसूरत गज़ल बनी है सर ।हार्दिक बधाई सर
Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on January 20, 2022 at 9:22am

मुहतरमा रचना भाटिया जी आदाब, ग़ज़ल का मतला कुछ आपत्तियों के बाद मूल रूप से बदल दिया गया है, इसलिए कुछ भर्ती के शब्द आ गये हैं, सानी के लिये आपका सुझाव "रुसवाई के भँवर में जाकर ख़ुद गिरा है वो" बह्र के अनुकूल नहीं है। "गुमाँ" को "गुमान" करने वाले सुझाव से सहमत हूँ। ग़ज़ल पर आपकी आमद और ज़र्रा नवाज़ी का शुक्रिया।

Comment by Rachna Bhatia on January 19, 2022 at 5:05pm

आदरणीय अमीरुद्दीन अमीर जी अच्छी ग़ज़ल हुई है। बधाई स्वीकार करें। बहुत अधिक तो नहीं जानती फ़िर भी ..

मतले में मुझे "कि" और "तो" भर्ती के लगे।

//जिसको हुआ गुमाँ कि 'ख़ुदा' हो गया है वो 

रुस्वाई के भंवर में तो ख़ुद जा गिरा है वो//

मुझे लगता है कि "गुमाँ" को "गुमान" कर सकते हैं

सानी के लिए सुझाव

"रुसवाई के भँवर में जाकर ख़ुद गिरा है वो"

सादर।


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on January 16, 2022 at 9:36pm

आभार आदरणीय अमीरुद्दीन साहब ।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on January 16, 2022 at 9:25pm

आदरणीय गणेशजी बाग़ी साहिब आदाब, आपकी और सभी सम्मानित सदस्यों की आपत्ति के बाद मतले को एडिट करने का अनुरोध स्वीकार कर मतले को एडिट करने का प्रयास करता हूँ। सादर।


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on January 16, 2022 at 9:06pm

आदरणीय अमीरुद्दीन साहब, भाई नीलेश और साथियों के कहे से सहमत होते हुए कहना है कि मतला का कहन बिलकुल ही उचित नही लग रहा और आपके कद के अनुरूप भी नही है ।

अनुरोध है कि मतला को एडिट कर दें ।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on January 14, 2022 at 2:01pm

बहुत शुक्रिया आदरणीय तेजवीर सिंह जी। 

Comment by TEJ VEER SINGH on January 14, 2022 at 11:55am

हार्दिक बधाई आदरणीय अमीरुददीन "अमीर" साहब जी। बेहतरीन ग़ज़ल

जिस ने किया घमंड वही मिट गया है यूँ 

ख़ुद अपनी आग में ही फ़ना हो गया है वो ।

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