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लो चढ़ आया फिर पूर्वी फेरी वाला

लो चढ़ आया फिर पूर्वी फेरी वाला
सीधी कमर
उठाए स्वर्ण की छाबड़ी
दिन भर चमकेगा
बासी दृष्टि ले चुंधियाएगा
मीनारों से झाँकेगा
झोंपड़ी मे ताकेगा
लुटाने को निज उपहार
हर द्वार खटखटाएगा
पर जब कोई आँख आँख न मिलायेगी
तो निराश हो जाएगा
बेदम हो बोझिल चाल चलेगा
बची टिमटिमाहट समेटेगा
दूर चलता चला जाएगा
अंतत: प्राची मे ठौर पाएगा
हताश निराश ये फेरी वाला
सागर मे समा जाएगा
कोई शायद ध्यान भी न देगा
सृष्टि पूर्ववत चलेगी
किसी मे कोई अंतर न आयेगा
बस कलैंडर को जाने क्या हो जाएगा
कि एक पृष्ठ पता नहीं क्यों बदल जाएगा
.
"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 6, 2021 at 5:08pm

आ. अमिता जी, सादर अभिवादन । अच्छी रचना हुई है । हार्दिक बधाई।

कृपया ध्यान दे...

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