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गोल -गोल होती है रोटी

 गाँव-गाँव से शहर आता
आकर अपना खून बेचता
वो गँवार आदमी देखो तुम
रोटी खातिर महल बनाता |

गोल- गोल होती है रोटी...!

सच्चा कर्म-योगी वही है

प्याज-हरी धर खाता रोटी,
धरती माँ का पुत्र वही है
मोटी- मोटी उसकी रोटी |

गोल-गोल होती है रोटी..!

दुनिया बनी ये काज रोटी
बाल-ग्वाल कमा रहे रोटी
सारा शहर रचा हे, रोटी,
गाँव- गाँव बना है रोटी |

गोल-गोल होती है रोटी..!

सावन खरीदी हरी चूड़ी
सदा पहल पर होती रोटी
टूटा चश्मा गैैर - जरूरी,
बाबा बाट जोहता रोटी |

गोल-गोल होती है रोटी...

मिश्री-मक्खन, भाग्य कब उनके
कि महल बना, झोंपड़े उनके
चाहत केवल ईश - कृपा से,
येन - केन मिल जाये रोटी..

गोल - गोल होती है रोटी..!

(

मौलिक अप्रकाशित)

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 5, 2020 at 8:50am

आ. भाई चेतन जी, सादर अभिवादन ।अच्छी रचना हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Chetan Prakash on December 4, 2020 at 8:04pm

मोहतरम जनाब, समर कबीर साहब, आदाब, आप कविता, रोटी .तक पहुँचने की ज़हमत की, इसके लिए आपका बहुत-बहुत शुक्रिया ! लघु कथा को आपने सराहा, अच्छा लगा। कृपा बनाएँ रखे, आदरणीय !

Comment by Samar kabeer on December 4, 2020 at 5:17pm

जनाब चेतन प्रकाश जी आदाब, सुंदर प्रस्तुति हेतु बधाई स्वीकार करें ।

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