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इश्क़ से ना हो राब्ता कोई
ज़िन्दगी है की हादसा कोई

वो पुराने ज़माने की बात है
अब नहीं करता है वफ़ा कोई

ज़िन्दगी के जद्दोजहद अपने
मौत का है न फ़लसफ़ा कोई

यहाँ सब बे अदब हैं मेरी जां
अब करे क्या मुलाहिज़ा कोई

दिल का है टूटने का ग़म 'नाहक'
था सलामत मुआहिदा कोई

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 29, 2020 at 7:33pm

आ. भाई दण्डपाणि जी, सादर अभिवादन । गजल का प्रयास अच्छा हुआ है । हार्दिक बधाई ।

मेरे हिसाब से इसे इस प्रकार बाँधते तो और बेहतर हो सकता था

२१२१/१२१२/१२
इश्क़ से नहीं राब्ता कोई
ज़िन्दगी है कि हादसा कोई
वो पुराने ज़माने की बात है

शेष गुणीजनों के विचारों का इतजार करें । सादर..

Comment by Nilesh Shevgaonkar on September 29, 2020 at 9:43am

आ दण्डपाणी जी,

ग़ज़ल के प्रयास हेतु बधाई। कुछ जगह बह्र टूट रही है।

एक टिप है कि सिर्फ मात्राएं गिनने की जगह रचना को लय और ताल पर गुनगुनाएं। 

सादर

Comment by Rupam kumar -'मीत' on September 28, 2020 at 10:27am

बहुत उम्दा शे'र हुए है, आ. नाहक साहिब , 

 

"इश्क़ से ना हो राब्ता कोई"  यहा  "ना "  ज़ियादा  उचित  होगा की "न "  का  इस्तिमाल   रौशनी  डाले इस पर सादर |

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