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ग़ज़ल नूर की - तर्क-ए-वफ़ा का जब कभी इल्ज़ाम आएगा

तर्क-ए-वफ़ा का जब कभी इल्ज़ाम आएगा
हर बार मुझ से पहले तेरा नाम आएगा.
.

अच्छा हुआ जो टूट गया दिल तेरे लिए
वैसे भी तय नहीं था कि किस काम आएगा.
.

अब रात घिर चुकी है इसे लौट जाने दे
यादों का क़ाफ़िला तो हर इक शाम आएगा.`
`

उर्दू की बज़्म में कभी हिन्दी चला के देख
तेरे कलाम में नया आयाम आएगा.
.
उस सुब’ह धमनियों में ठहर जाएगा ख़िराम  

जिस भोर मेरे नाम का पैग़ाम आएगा.
.

करने लगूँगा रक्स सितारों के दरमियाँ
घर पर पहुँच के “नूर” को आराम आएगा.
.
निलेश "नूर"
मौलिक/ अप्रकाशित 

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Comment by dandpani nahak on September 27, 2020 at 5:03pm
आदरणीय नीलेश 'नूर' जी आदाब बेहतरीन ग़ज़ल हुई है हार्दिक बधाई स्वीकार करें ! मतला क्या ख़ूब हुआ है दूसरा शैर लाज़वाब तीसरा शैर भी बहुत अच्छा ! वाह क्या कहने ! बहुत बधाई
Comment by Rupam kumar -'मीत' on September 27, 2020 at 3:49pm

आ. निलेश 'नूर' साहिब, मतला बहूत खूब कहा आपने , मुझे बह्र एक दम से पढ़ के समझ नहीं आती, बच्चों के लिए बह्र लिख दिया कीजिए सादर और   ''उर्दू की बज़्म में कभी हिन्दी चला के देख''   यहाँ   "हिन्दी चला के देख"   यह    

क्या मुहावरा है?, "हिन्दी चला कर देख" शायद आपने कुछ नया कहा हो, कृपया बताए , सादर |

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