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महज चाहत का रिस्ता है - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'( गजल)

१२२२/१२२२/१२२२/१२२२


जमाने की नजर में यूँ बताओ कौन अच्छा है
भले ही माँ पिता  के  वास्ते हर लाल बच्चा है।१।
**
हदों में झूठ बँध पाता  नहीं  है आज भी लोगों
जुटाली भीड़ जिसने बढ़ लगे वो खूब सच्चा है।२।
**
लगे बासी भरा जो भोर को घर में जिन्हें सन्ध्या
मगर बोतल में जो पानी कहा करते वो ताजा है।३।
**
महज चाहत का रिस्ता है यहाँ हर चीज से मन का
सुना है नेह से  मिलता  सभी  को  विष सुधा सा है।४।
**
भले ही तोड़ सकता हो  इसे नन्हा परिन्दा तक
बहन भाई को बाँधे तो  ये  धागा कौन कच्चा है।५।
**
कोई सुख हेतु अपनाता कोई सुख हेतु तज देता
अगर गहरे में सोचो  तो  यहाँ जीवन भी सौदा है।६।

  • ( रचना : सितम्बर २००)
    मौलिक-अप्रकाशित
    लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 9, 2020 at 3:57am

आ. भाई सुरेंद्र जी, सादर अभिवादन । गजलपर उपस्थिति व समालोचना के लिए आभार । आपके कथनानुसार गजल पर पनः विचार करता हूँ ।

Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on August 7, 2020 at 4:56pm

आद0 लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर' जी सादर अभिवादन

अच्छा प्रयास है ग़ज़ल का। मतले के दोनों मिसरों में मुझे राब्ता समझ में नहीं आया

बढ़ लगे से क्या आशय है आपका

और भी शैर में कथ्य उभर कर नहीं आया है। बहरहाल बधाई स्वीकार कीजिये

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