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चराग़ों की यारी हवा से हुई है

122/122/122/122
चराग़ों की यारी हवा से हुई है
जहाँ तीरगी थी वहीं रौशनी है

इबादत में होना असर लाज़िमी है
वो नाज़ुक कली जो दुआ कर रही है

बिछावन मेरा क्यूँ सजाए गुलों से
मेरी आँख में नींद की अब कमी है

है सर्दी के मौसम में गर्मी का आलम
लिपट के वो मुझसे पिघलने लगी है

मैं आ तो गया हूँ फ़लक से वो लेकर
जो माँगी थी तुमने वही चाँदनी है

महब्बत के साये में बैठा हूँ थक कर
खुला आसमाँ है तुम्हारी कमी है

यहाँ कुछ न कुछ तो सभी ने है खोया
जो सब कुछ हो हासिल तो क्या ज़िंदगी है

रूपम कुमार 'मीत'
मौलिक एवं अप्रकाशि

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Comment by Samar kabeer on May 28, 2020 at 3:38pm

'मेरे आँख में नींद की अब कमी है'

इस मिसरे में 'मेरे' की जगह "मेरी" लिखें ।

एक निवेदन ये है कि इस मंच पर सिर्फ़ देवनागरी में लिखने का नियम है,कृपया रोमन में न लिखा करें ।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on May 28, 2020 at 2:38pm

जनाब रूपम कुमार जी, आदरणीय समर कबीर साहिब की इस्लाह पर अमल करने से ग़ज़ल मुकम्मल हो जाएगी। 

Comment by Samar kabeer on May 28, 2020 at 2:19pm

जनाब रूपम कुमार 'मीत' जी आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है, बधाई स्वीकार करें ।

जनाब अमीरुद्दीन साहिब ने जो टंकण त्रुटियाँ बताईं,आप दुरुस्त कर चुके हैं ।

'मेरे चश्म में नींद की अब कमी है'

इस मिसरे में 'चश्म' शब्द स्त्रीलिंग है,इसलिए 'मेरे' की जगह "मेरी" होना चाहिए,वैसे उचित ये होगा कि 'चश्म' की जगह "आँख" कर लें ।

'मुहब्बत की छाँ में जो थक के हूँ बैठा'

इस मिसरे में 'छाँ' शब्द उचित नहीं,यूँ कर सकते हैं:-

'महब्बत के साये में बैठा हूँ थक कर'

Comment by Rupam kumar -'मीत' on May 28, 2020 at 11:47am

जी आपका बहुत शुक्रिया, आपने इतना वक़्त दिया और मेरी ग़ज़ल को दुरुस्त करने की मदद की, मैं सीखने की चाह भी रखता हूँ, मैं सही करने की कोशिश करता हूँ, आप भी एक नज़र देख लीजिएगा, बड़ी इनायत होगी।।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on May 28, 2020 at 10:36am

जनाब रूपम कुमार 'मीत' जी, आदाब। ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है। बधाई स्वीकार करें।

सटीक टिप्पणी के लिए तो उस्ताद ए मुहतरम जनाब समर कबीर साहिब का ही मुझे भी इंतज़ार है। लेकिन जहाँ तक मेरी जानकारी है उस के मुताबिक़ कुछ टंकण त्रुटियां रह गयी हैं : "जहाँ तीरगी थी वहीं रोशनी है" यहांँ सहीह शब्द "रौशनी" होना चाहिए, "इबादत में होना असर लाज़मी है" यहांँ सहीह शब्द "लाज़िमी" होना चाहिए। इसके इलावा "बिछावन मेरा क्यूँ सजाए गुलों से

                                                                                                            की आँखों में नींदे कहाँ अब बची है" की आँखों में,, यहाँ क पर छोटी इ की मात्रा होनी चाहिये। इस शेअ'र में गुलों, आंखों,और नीन्दें बहुवचन है जबकि " बची है " एक वचन। बची हैं करने से रदीफ़ ग़लत हो जाएगी, इस लिए आप को इस शेअ'र को बदलना पड़ेगा।" है गर्मी के मौसम में सर्दी का आलम

                                                                                                                 लिपट के वो मुझसे पिघलने लगी है" इस शेअ'र के मिसरों में रब्त नहीं है। पहले मिसरे को " है सर्दी के मौसम में गर्मी का आलम" रब्त आ जााएगा। 

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