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रमल मुसम्मन सालिम मख़्बून महज़ूफ़ / महज़ूफ़ मुसक्किन
फ़ाइलातुन फ़इलातुन फ़इलातुन फ़इलुन/फ़ेलुन
2122 1122 1122 112 / 22

ये सफ़र है बड़ा दुश्वार ख़ुदा ख़ैर करे
राह लगने लगी दीवार ख़ुदा ख़ैर करे [1]

इस किनारे तो सराबों के सिवा कुछ भी नहीं
देखिए क्या मिले उस पार ख़ुदा ख़ैर करे [2]

लोग खाते थे क़सम जिसकी वही ईमाँ अब
बिक रहा है सर-ए-बाज़ार ख़ुदा ख़ैर करे [3]

ये बग़ावत पे उतर आएँगे जो उठ बैठे
सो रहें हाशिया-बरदार ख़ुदा ख़ैर करे [4]

कौन सी अगली तबाही की है आमद आमद
बस कि आने को है अख़बार ख़ुदा ख़ैर करे [5]

ज़ख़्म मिल जाए नया दिल को तो पाए तस्कीं
ख़ाली जाए न तिरा वार ख़ुदा ख़ैर करे [6]

भिड़ तो बैठे हैं यूँ मौजों से हम उन की ख़ातिर
ख़स्ता कश्ती है न पतवार ख़ुदा ख़ैर करे [7]

शाइरी के लिए इल्हाम जो हमने माँगा
दर्द के लग गए अम्बार ख़ुदा ख़ैर करे [8]

दिल मेरा ग़म से यूँ बेहिस जो हुआ जाता है
कैसे आएँगे अब अश'आर ख़ुदा ख़ैर करे [9]

है अलमनाक ये तन्हाई का आलम 'शाहिद'
ख़ुद से भी बंद है गुफ़्तार ख़ुदा ख़ैर करे [10]
(मौलिक व अप्रकाशित)
–––––––––––––––––––––––
कुछ कठिन शब्दों के अर्थ:
1. सराब = मृगतृष्णा
2. हाशिया-बरदार = वो लोग जो समाज के हाशिये पर हैं और अधिकारहीन हैं
3. आमद आमद = आने की ख़बर
4. इल्हाम = ईश्वरीय ज्ञान या प्रेरणा
5. बेहिस = सुन्न, एहसास कर पाने में असमर्थ
6. अलमनाक = अति दुखद
7. गुफ़्तार = बात-चीत

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Comment by रवि भसीन 'शाहिद' on March 21, 2020 at 6:20pm

आदरणीय लक्ष्मण भाई, हैसला बढ़ाने के लिए आपका बहुत शुक्रिया।

Comment by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on March 21, 2020 at 11:59am

लाजवाब अशआर हैं साहेब , ज़िंदाबाद 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 21, 2020 at 10:38am

आ. भाई रवि जी, सादर अभिवादन । अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by रवि भसीन 'शाहिद' on March 21, 2020 at 10:00am

आदरणीय वर्मा जी, नमस्ते। ग़ज़ल पसंद करने के लिए और हौसला बढ़ाने के लिए आपका हार्दिक आभार।

Comment by Shyam Narain Verma on March 21, 2020 at 9:51am
नमस्ते जी, बहुत ही सुंदर प्रस्तुति, हार्दिक बधाई l सादर

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