For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

दिन गुज़रता रहा, रात ढलती रही (ग़ज़ल)

212 212 212 212

दिन गुज़रता रहा, रात ढलती रही
दिल में उम्मीद की शम्अ जलती रही

सोचकर,किस क़दर फ़ासला ये मिटे
रात-दिन ज़िंदगानी पिघलती रही

वाकया शह्र में आम ये हो गया
आदमी मर गया,साँस चलती रही

आदमी, आदमी को चबाता रहा
आदमीयत खड़ी हाथ मलती रही

बेक़ली, बेबसी, बेख़ुदी ना गई
सिर्फ कहने को ही रुत बदलती रही

कर गया था वो पूरी मेरी हर कमी
फिर,कमी उसकी ताउम्र खलती रही

एक गिरते हुए को उठा क्या दिया
ज़िन्दगी भर दुआ उसकी फलती रही
=======================
जयनित कुमार मेहता
(मौलिक व अप्रकाशित)

Views: 842

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on February 23, 2016 at 1:43pm

अच्छी ग़ज़ल हुई है जयनित जी। दाद कुबूल करें। 

"बेक़ली, बेबसी, बेख़ुदी ना गई" में "ना" को "कब" कर सकते हैं।

Comment by DR. BAIJNATH SHARMA'MINTU' on February 12, 2016 at 11:06pm

 आदरणीय जयनित  जी ..............बधाई |

Comment by जयनित कुमार मेहता on February 11, 2016 at 9:00pm
मेरे परिश्रम को सार्थक करने के लिए सभी सम्मानित सदस्यों, आदरणीय गुणीजनों के प्रति हार्दिक आभार प्रकट करता हूँ।
Comment by Ravi Shukla on February 11, 2016 at 12:53pm

आदरणीय जयनित कुमार जी बहुत खूब ग़ज़ल कही है आपने बधाई स्‍वीकार करें  आखिरी शेर तो लाजवाब हुआ है

Comment by Samar kabeer on February 11, 2016 at 10:32am
जनाब जयनित कुमार मेहता जी आदाब,बहुत उम्दा ग़ज़ल कही बधाई स्वीकार करें !
मुझे भी ग़ज़ल सुनते ही "शमा"फ़िल्म की ग़ज़ल याद आ गई |
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on February 11, 2016 at 8:46am
वाह्ह्ह्ह्ह्!बहुत ख़ूब।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 11, 2016 at 1:26am

आदरणीय जयनित जी, बहुत बढ़िया ग़ज़ल कही है आपने. शेर दर शेर दाद कुबूल फरमाएं. ये ग़ज़ल गुनगुनाते हुए  'शमा' फिल्म का ज़फर गोरखपुरी जी का लिखा गीत याद आ गया. वह गीत भी इसी जमीन पर है -

//मैं उजालों की नाकाम हसरत लिए 
उम्र भर मोम बन कर पिघलती रही
चाँद अपना सफ़र ख़त्म करता रहा
शमा जलती रही रात ढलती रही//
Comment by नादिर ख़ान on February 10, 2016 at 4:27pm

एक गिरते हुए को उठा क्या दिया
ज़िन्दगी भर दुआ उसकी फलती रही
वाह आदरणीय जयनित जी खूबसूरत ग़ज़ल कही आपने, मुबारकबाद इस उम्दा रचनाकर्म के लिए

Comment by Rahila on February 10, 2016 at 3:31pm
किसी एक शेर की तारीफ़ करू तो नाइंसाफी होगी । पूरी की पूरी ग़ज़ल ही शानदार हुई है । बहुत -बहुत बधाई आदरणीय जयनित जी । सादर
Comment by TEJ VEER SINGH on February 10, 2016 at 2:48pm

हार्दिक बधाई आदरणीय जयनित कुमार जी!बेहतरीन गज़ल!

कर गया था वो पूरी मेरी हर कमी
फिर,कमी उसकी ताउम्र खलती रही

एक गिरते हुए को उठा क्या दिया
ज़िन्दगी भर दुआ उसकी फलती रही

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

Admin replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-128 (विषय मुक्त)
"स्वागतम"
21 hours ago
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion र"ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-185
"जी बहुत शुक्रिया आदरणीय चेतन प्रकाश जी "
22 hours ago
Dayaram Methani replied to Admin's discussion र"ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-185
"आदरणीय मिथलेश वामनकर जी, प्रोत्साहन के लिए बहुत बहुत धन्यवाद।"
yesterday
Chetan Prakash replied to Admin's discussion र"ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-185
"आ.लक्ष्मण सिंह मुसाफिर साहब,  अच्छी ग़ज़ल हुई, और बेहतर निखार सकते आप । लेकिन  आ.श्री…"
yesterday
Chetan Prakash replied to Admin's discussion र"ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-185
"आ.मिथिलेश वामनकर साहब,  अतिशय आभार आपका, प्रोत्साहन हेतु !"
yesterday
Chetan Prakash replied to Admin's discussion र"ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-185
"देर आयद दुरुस्त आयद,  आ.नीलेश नूर साहब,  मुशायर की रौनक  लौट आयी। बहुत अच्छी ग़ज़ल…"
yesterday
Chetan Prakash replied to Admin's discussion र"ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-185
" ,आ, नीलेशजी कुल मिलाकर बहुत बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई,  जनाब!"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion र"ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-185
"आ. भाई मिथिलेश जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और स्नेह के लिए आभार।"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion र"ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-185
"आ. भाई नीलेश जी, सादर अभिवादन।  गजल पर उपस्थिति और स्नेह के लिए आभार। भाई तिलकराज जी द्वार…"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion र"ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-185
"आ. भाई तिलकराज जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और विस्तृत टिप्पणी से मार्गदर्शन के लिए आभार।…"
yesterday
Tilak Raj Kapoor replied to Admin's discussion र"ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-185
"तितलियों पर अपने खूब पकड़ा है। इस पर मेरा ध्यान नहीं गया। "
yesterday
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion र"ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-185
"आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी नमस्कार बहुत- बहुत शुक्रिया आपका आपने वक़्त निकाला विशेष बधाई के लिए भी…"
yesterday

© 2025   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service