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2122 1212 22/112
फाइलातुन मुफ़ाइलुन फैलुन

वो जुनूँ है वो दिल की राहत है
हर घड़ी वो मेरी ज़रूरत है

इश्क ही कलमा इश्क ही रोज़ा
इश्क ही अब मेरी इबादत है

ज़र्रे-ज़र्रे में है महक उसकी
उसने हरसू बिखेरी जन्नत है

अब्र बन कर कभी तो बरसे वो
तर-बतर कर दे बस ये चाहत है

उसको पढ़ती हूँ बंद आँखों से
मन के मंदिर में उसकी मूरत है

वो ही दिखता मुझे जहाँ देखूँ
ये करिश्मा है या मुहब्बत है

वो शहंशाह है फकीरी में
पास जिसके ये दिल की दौलत है

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by kanta roy on February 23, 2016 at 10:51am
उसको पढ़ती हूँ बंद आँखों से
मन के मंदिर में उसकी मूरत है----- वाह ! इश्क में बहुत आज आपका यह कलमा पढा है मैने । बेहतरीन भाव है यहाँ । बहुत बहुत बधाई आपको आदरणीया प्राची जी ।
Comment by Dr Ashutosh Mishra on February 21, 2016 at 1:53pm

आदरणीया प्राची जी 

आपकी सूफी गीत में जो चाहत थी वो ग़ज़ल की इन पंक्तियों में पूरी हो गयी ..हर मंज़र में तुझको पाऊँ, मुझको साकी वही नज़र दे।....

वो ही दिखता मुझे जहाँ देखूँ
ये करिश्मा है या मुहब्बत है.......... इस शानदार ग़ज़ल के लिए ह्रदय से बधाई स्वीकार करें सादर 

Comment by Shyam Narain Verma on February 17, 2016 at 6:55pm
क्या बात है .... बहुत उम्दा | बधाई आप को 
Comment by TEJ VEER SINGH on February 17, 2016 at 5:33pm

हार्दिक बधाई आदरणीय डॉ प्राची सिंह जी!बेहतरीन गज़ल!

वो शहंशाह है फकीरी में
पास जिसके ये दिल की दौलत है

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