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Sheikh Shahzad Usmani's Blog – August 2018 Archive (16)

"फीका तिलक, मीठी राखियां" (लघुकथा)

"आज सही मौका है इसे सबक़ सिखाने का! बड़ा आया राखी बंधवाने वाला हमारी बिरादरी की लड़की से!"

"हां, ये वही तो है न 'याक़ूब', जो कल तेरी गाय के बछड़े की पूंछ पकड़ कर मज़े ले रहा था अपने दोस्तों के बीच! .. मारो साले को एक शॉट इसी खिलौना बंदूक से! .. और मैं फैंकता हूं ये पत्थर! आज यह राखी न बंधवा पाये अपनी पड़ोसन सविता से!"

निशाने साध कर दोनों ने याक़ूब पर वार किये ही थे कि तभी पास के मंदिर से घंटी की आवाज़ें और एक मस्जिद से अज़ान सुनाई दी! उन दोनों दोस्तों के क़दम वहीं थम गये। कुछ पल बाद देखा तो…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on August 26, 2018 at 6:31pm — 7 Comments

"ऊपरवाले, नीचेवाले" (लघुकथा)

"अब हमसें और न हो पेहे! दो-दो बोरे गेहूं तुम दोनों भाइयों और दो बोरे तुमाई बहना को भिजवा दये हते! अब मुंह फाड़के फिर आ गये गांव घूमवे के बहाने!"

"जे मत भूलो कि हमने अपने हिस्से के बड़े-बड़े बढ़िया खेत तुमें सस्ते में बेच दये हते! फसलों के ह़िस्से बिना मांगे हमें मिलते रहना चईये न! बड़े भाई हैं हम तुमाये; तुमाओ परिवार अकेले इते मजे करत रेहे का!"

"कौन ने कई हती कि अगल-बगल के शहरन में बस जाओ! पैसों से तो तुम औरन के मज़े हो रये हैं! हमारी मिहनत और हालात तुम कभऊं न समझ पेहो! सारी फसल तुम…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on August 26, 2018 at 12:00pm — 4 Comments

"वो रात फिर कभी नहीं आयेगी!" (लघुकथा)

भारी बारिश हो रही थी। बगीचे की टीन-शेड के नीचे बच्चे भीगे मौसम के साथ झूले के मज़े ले रहे थे। गरम पकोड़ों का लुत्फ़ लेते हुए उनके अब्बूजान अपने पुराने से अज़ीज़ ट्रांजिस्टर पर मुल्क की चुनावी राजनीतिक हलचलों, बाढ़ों के क़हर और तबाहियों के गरम समाचार सुन रहे थे । बच्चों की अम्मीजान भी समाचारों को झेल रहीं थीं। तभी बड़ी बेटी बोली - "अब्बू! ख़ुदा न करे! अगर नेताओं और अंग्रेज़ों के 'रिमोट कंट्रोल' से '1947 की रात' जबरन दुबारा रिपीट की गई और मुसलमानों को अलग किसी हिस्से में हांका गया, तो आप कहां तशरीफ़ ले…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on August 26, 2018 at 5:00am — 4 Comments

"ज़हनियत मुर्दाबाद!" (लघुकथा)

"ज़िन्दगी ज़िन्दाबाद! जान ज़िन्दाबाद! .. ज़िन्दगी ज़िन्दाबाद!"- सुंदर 'राष्ट्रीय राजमार्ग' पर मौत को करारी शिकस्त देती कुछ ज़िन्दगियां ख़ुशी की अश्रुधारा बहाती चिल्ला रहीं थीं। वहां दैनिक दिनचर्या तहत बेहद तीव्र गति में दौड़ रहे ट्रैफ़िक में एक बाइक को विपरीत दिशा से आते एक स्कूटर ने यूं टक्कर मारी कि दोनों पर सवार युवा किसी फुटबॉल या सिक्के माफ़िक टॉस करते हुए सड़क के डिवाइडर से टकराने के बावजूद चोटिल होकर ज़िंदा बच गये थे। वह बाइक अभी भी एक छोटे से बच्चे को यथावत बिठाले सड़क पर दौड़ती हुई डिवाइडर से…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on August 22, 2018 at 1:33pm — 8 Comments

'सैलाब में प्रत्याशी, मतदाता या किसान!' (लघुकथा)

"कौन? ... कौन डूब रहा है इस सैलाब में इतने रेस्क्यू ऑपरेशंस के बावजूद?"

"आम आदमी साहिब! आम मतदाता डूब रहा है, उपेक्षा के सैलाब में या फिर अहसानात के सैलाब में... इस चुनावी सैलाब में!"

"रेस्कयू में हम कोई कसर नहीं छोड़ रहे ! धन, नौकरी, छोकरी, योजना, लोन-दान, वीजा-पासपोर्ट,  नये-नये बिल-क़ानून, पशु-रक्षा, धार्मिक-स्थल-मुद्दे, मीडिया-कवरेज , वाद-विवाद, पुलिस-समर्पण ... सब कुछ तो लगा दिया उनके लिए उनके हितार्थ! .. और क्या चाहिए!"

"जनता इनको चुनावी-हथकंडे मान रही है, रेस्क्यू नहीं!…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on August 22, 2018 at 12:30am — 5 Comments

'ताटंक छंद अभ्यास'

[विषम चरण 16 मात्राएँ + यति+ सम चरण 14 मात्राएँ तुकांत पर तीन गुरु (222) सहित]

ओ री सखी नदी तुम भी हो, हुई न तुम वैसी गंदी।

हम सब पर तुम मर मिटती हो, सहकर भी सब पाबंदी।।

धुनाई-धुलाई हर पत्नी की, करते पति बस वस्त्रों सी।

मैल दिखाकर अपने मन का, पिटाई करते जब बच्चों सी।।

*

ताक-झांक बच्चे करते पीछे, दिखे आज बदले पापा।

झाग-दाग़ रिश्तों के छूटे, हृदय 'नदी' का जब नापा।।

दिन छुट्टी का अब ग़ज़ब हुआ, नदी से 'नदी' को जाना।

समय का अजब यह फेर हुआ, मां…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on August 20, 2018 at 4:00am — 11 Comments

"उन्नति और प्रत्युत्पन्नमति" (लघुकथा)

महिमा दिखने में अतिसुंदर किंतु मासूम थी। उच्च शिक्षा के बाद उच्च स्तरीय नौकरी हासिल करना उस मध्यमवर्गीय के लिए न तो आसानी से संभव था, न ही असंभव। जब दूसरे सक्षम लोग उसको नियंत्रित या 'स्टिअर' कर मनचाही दिशा देने की कोशिश करते तो उसे लगता कि वह पश्चिमी आधुनिकता की चपेट में आ रही है, कुछ समझौते कर कठपुतली सी बनायी या बनवाई जा रही है। आज वह लैपटॉप पर चैटिंग कर आभासी दुनिया के मशविरे लेने को विवश थी; पिता को सच बताने से डरती थी, किंतु 'सहेली सी' मां को भी तो सब कुछ उसने नहीं बताया था! हालांकि…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on August 19, 2018 at 2:49am — 4 Comments

"असली पहचान : नई सदी, नई मुसीबतें" (लघुकथा)

"लगता है वाक़ई बहुत गड़बड़ हो गई। कुछ ज़्यादा ही नेक साहित्य पढ़ ऊल-जलूल उसूल बना कर उलझन में डाल दिया अपनी इस शख़्सियत को!" एक मुशायरे में शामिल होने के लिए मिर्ज़ा साहिब सूटकेस जमाते हुए पिछले अनुभवों से 'सबक़' सीखने की कोशिश कर रहे थे; आजकल के हालात के हिसाब से अपने कुछ फैसले वे बदलने की सोच रहे थे।

"उस दाढ़ी वाले मुल्लाजी को रोक कर ज़रा उसकी तलाशी तो लो!" उनके पिछले अनुभव की पुनरावृत्ति करते हुए देर रात ग़श्त लगाते हुए एक पुलिस वाले ने अपने साथी को निर्देश दिया था पिछली दफ़े। मिर्ज़ा जी को आवाज़…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on August 17, 2018 at 5:00pm — 1 Comment

"आया ...आया ... गया!" (लघुकथा)

"लो! एक और गया! .. बह गया बेचारा!"



"वो देखो! एक तो अब आ गया न!" आशावादी दृष्टिकोण वाले युवक ने तेज बहाव वाले जलप्रपात के किनारे वाली चट्टान पर खड़ी भीड़ से आसमान की ओर देखते हुए कहा। रेस्क्यू ऑपरेशन में भेजे गये इकलौते चॉपर हेलिकॉप्टर से लगभग चालीस लोगों को जलसमाधि से बचाना था। घने काले बादलों के अंधकार और रुक-रुक कर हो रही बारिश को झेलते हुए रेस्क्यू दल-सदस्य 'रस्सी की सीढ़ी' से पार्वती नदी के बीच चट्टान में फंसे चार-पांच युवाओं को ही बचाने में सफल हुए। क़रीब तीन सौ मीटर दूर किनारे…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on August 15, 2018 at 10:30pm — 4 Comments

'तोप, बारूद और तोपची' (लघुकथा)

"अरे, भाबीजी तुम तो अब भी घर पर ही जमी हो!" मोती ने बड़े ताअज्जुब से कहा - "ऊ दिना तो तुम बड़ी-बड़ी बातें फैंक रईं थीं कि अब नईं रहने इते हाउस-वाइफ़ बनके; बहोत सह लई!"



"तो का अकेलेइ कऊं भग जाते! ई मुटिया को न तो कोनऊ फ़ादर है, न गोडफ़ादर.. कोनऊ लवर या फिरेंड मिलवे को तो सवालइ नईये, मोती बाबू!"



"तुम तो कैरईं थीं कि पड़ोसन के घरे झांक-झांक के दुबले-पतले होवे की कसरतें सीख लईं तुमने और डाइटिंग करवा रये थे मुन्ना भाइसाब तुमें!"



"दुबरो करावे को उनको मकसद दूसरो हतो!…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on August 11, 2018 at 6:30am — 5 Comments

'आदी की चादर' (छंदमुक्त, अतुकांत कविता)

मां, गुजराती चादर दे दे!

मैं 'फ़ादर' सा बन जाऊं!

जनता अपने राष्ट्र की

स्वामियों, बापुओं सा आदर दे दे!

अंग्रेज़ों सा व्यापारी बन कर,

तोड़ूं-फोड़ूं और मारूं-काटूं

विदेशी सूट पहन इतराऊं!

मां किसी 'गांधी' सी 'चादर' ओढ़ाकर

तस्वीरें, मूर्तियाँ मेरी सजवादे

मैं भी जिंदा लीजेंड, किंवदंती कहलाऊं!

मुग़ल, अंग्रेज़, हिटलर, कट्टर

सब से शिक्षायें ले लेकर

आतंक कर आतंकी न कहलाऊं !

मां 'धर्म' की बरसाती दे दे

बदनामियों सा न भीग जाऊं!

मां…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on August 9, 2018 at 6:38am — 8 Comments

'करुणा-सन्निधि' (लघुकथा)

आधुनिक भारत के आधुनिक शहर की आधुनिक सड़कों पर एक बार फिर भावुक और अहसानमंद भीड़ एकत्रित थी। आम आदमी तो भीड़ में थे ही, नेता-अभिनेता और मीडिया भी था। कुछ करुणाद्र थे, कुछ कृतज्ञ और कुछ समर्थक या पूजक और कुछ अवसरवादी ढोंगी समर्थक भी थे! दृश्य बेहद करुणामय था। कुछ तो रोये ही जा रहे थे अपने प्रिय व्यक्तित्व या आका के स्वास्थ्य और जीवन संबंधित शुभकामनाओं और प्रार्थनाओं के साथ। जबकि कुछ ऐच्छिक समाचार सुनने की प्रतीक्षा में थे।



"समर्थकों, उपासकों, अहसानमंदों और अवसरवादियों की मिली-जुली…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on August 8, 2018 at 12:22am — 7 Comments

'अभिव्यक्ति की आज़ादी' (लघुकथा)

"ए ऑटो वाले भैया! 'दिन्नू' तक के क्या लोगे?"



"..द..द..दिन्नू?"



"हां, भय्या 'दीनू जंक्शन'! मतलब नये नाम वाले 'डीडू यानि कि 'डीडीयू'!"



"पढ़ी-लिखी तो लगती हो आप! पूरा सही नाम 'दीनदयाल उपाध्याय' क्यों नहीं बोल पा रहीं? हम तो वहीं के चक्कर लगाते हैं न! आइए बैठिये; दस रुपये यहां से, बस!"



"भैया, पूरा नाम तो भाषण देने वाले ही कह पायेंगे! हमारे पास इतना टाइम कहां?"



"तो 'दीनसराय' कहो या फिर 'मुगलसराय' ही कहती रहो न! इसके लिए तो टाइम भी है…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on August 6, 2018 at 2:00am — 9 Comments

'बेटी फंसाओ या बचाओ?' (लघुकथा)

"अरे रुको! तुम हमारी मिहनत को यूं बरबाद नहीं कर सकते! हटाओ अपनी ये झाड़ू! रोको अपना खोखला मिशन!" अपने माथे की ओर की अपनी डोर में टपकती मकड़ी की चुनौती सुनकर भय्यन के हाथ से मकड़जाल की ओर जाती झाड़ू डंडे सहित नीचे गिर पड़ी।



"न तो तुम जैसे आम आदमी हमारे शिकारों को बचा सकते हो, न ही तुम्हारे तथाकथित सेवक और सरकारी या प्राइवेट रक्षक! सबको भक्षक और ग्राहक बनाना हमें बाख़ूबी आता है, समझे!" उस बड़ी सी मकड़ी ने मकड़जाल में फंसे और तड़पते 'बड़े से कीड़े' को देखते हुए भय्यन से कहा - "हमारी पहुंच और…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on August 5, 2018 at 9:05am — 4 Comments

'किकी-डांस चैलेंज' (लघुकथा)

"हैल्लउ! हाउ आs..यू? कैसे हैं जनाब?"



"फाइन! रॉकिंग!".. और आप सब ! कैसा लगता है अब विदेश में?"



"क्वाइट गुड! बट बेटर देन इंडिया! कुछ एक बातें तो 'अनकॉमन और पॉज़िटिव' हैं, लेकिन हम जैसे भावुक भारतीयों के लिए अधिकतर बातें 'कॉमन और निगेटिव' ही हैं पैसे, स्वार्थों की होड़ और 'तकनीक व ग्लोबलाइज़ेशन' की दौड़ में !"



"मतलब तुम सब भी हमारी तरह विदेश में भी ज़माने के साथ नाच ही रहे हो न!"



"हां, यही कह लो! लेकिन अंतर तो है! हम यहां सेहत और सुव्यवस्था के साथ…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on August 4, 2018 at 12:30am — 6 Comments

"दिलवाली अब किस की? (लघुकथा)

"अपनी तो बहुत ख़ैर-ख़बर हो गई! चलो, अब सुनें, वो दिलवाली का कहिन?" बिहार ने एक-दूसरे के हालात-ए-हाज़रा सुनने-सुनाने के बाद यूपी से कहा।



"दिलवाली! ... अच्छा वोss ... जो अपने को दिलवाली कहती रही? अब कहां रही वैसी!" व्यंग्यात्मक लहज़े में यूपी ने अपना रंगीन गमछा लहरा कर कहा।



"अपन दोनों से तो बेहतर ही है! खलबली और हड़बड़ी तो सब जगह है!" मुल्क के नक्शे पर राजधानी पर दृष्टिपात करते हुए बिहार ने कहा - "दिल तो उसका वाकई पहले से भी बड़ा हो गया है! न जाने कितने किस्म के दवाब, अन्याय…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on August 3, 2018 at 12:00am — 3 Comments

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