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Sheikh Shahzad Usmani's Blog (331)

"मिथ्या अतिविश्वास" -- [लघु कथा -12]

"मिथ्या अतिविश्वास" - (लघु कथा)



"आप लोग मुझ पर क्यों बरस रहे हैं ? आपसे ज़्यादा पढ़ा-लिखा हूँ।अख़बार और क़िताबें ही नहीं पढ़ता, इन्टरनेट तक खंगाल डालता हूँ !"



रूपेश के ये शब्द सुनकर पड़ोसी शर्मा जी ने उसे समझाया- " अच्छी बात है, लेकिन जो तुमने किया, उसे सही नहीं कह सकते। क्या ज़रूरत थी अपने मन से दवाओं में कटौती करने की और दवायें खुद ही बदलने की ? आखिर तुमने अपने पिताश्री को इतनी कम उम्र में इतनी सीरियस कन्डीशन में पहुंचा ही दिया न ! साइड इफेक्ट्स के बारे में अपने डॉक्टर… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 6, 2015 at 12:07pm — 4 Comments

"कड़वी याद" -- [लघु कथा-11]

"कड़वी याद"--(लघु कथा)



ख़ूबसूरत पूजा ने बुरा सा मुँह बनाकर डैडी को कोहनी मार के सामने बैठे श्रीमान की तरफ संकेत किया। डैडी ने इसी तरह अपनी पत्नी को इशारा किया, तो होंठ भींचते हुए उन्होंने इशारे से उन दोनों को शान्त रहने को कहा। कुछ सकपकाते-घबराते से श्रीमान अपनी पत्नी से धीमे स्वर में बोले- "चलो शालू, आगे वाली बोगी पूरी खाली हो गई है, वहां अच्छी सीट मिल जायेगी ।"

"क्यों भला, यहीं तो ठीक है ?"

"मैंने कहा न, उठो"- पत्नी का हाथ खींचते हुये शर्म से आँखें झुकाये श्रीमान वहां से… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 6, 2015 at 8:29am — 3 Comments

"माया और काया" -- [लघु कथा-10]

"माया और काया" - (लघु कथा)



"वाकई बहुत अच्छा गुजरा यह एक घंटा पार्क में ... पर अब तो बताओ, तुम ने लेगी-जीन्स वगैरह छोड़ कर आज मेरी पसंद की ये साड़ी क्यों पहनी ?"-अपने पति के इस सवाल को अनसुना सा कर मालती उसे काफी दिनों बाद एक टक देख रही थी।



"पीयूष, तुम सचमुच सुंदर हो, सूरत से ....और... सीरत से भी !" अपना सिर उसकी गोदी में रखकर वह बोलती गई-"मेरे बिना मेकअप वाले सादे रूप में जिस सहजता से मुझे निहारते हुये जब तुम मुझसे बातें करते हो न, तो... तो पता नहीं क्यों मुझे अजीब सी सुखद… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 6, 2015 at 7:31am — 6 Comments

"नन्दू रिक्शे वाला" - [लघु कथा]

"नन्दू रिक्शे वाला" - (लघु कथा)



"कक्का तुम काहे को परेशान हो रहे हो, रोज़ की तरह मैं तो पैदल ही चला जाता।"- हत्थू- रिक्शे पर बैठे ज़ाहिद ने एक बार फिर गुज़ारिश की ।



"न बेटा न, मैं तेरे बुलन्द हौसले को तो जानता हूँ, लेकिन सड़क के गड्ढों और गाड़ियाँ दौड़ाने वालों पर भरोसा नहीं है मुझे। विधाता ने वैसे ही तेरी आँखों को लाइलाज़ बीमारी दे दी, कुछ दिखाई देता नहीं तुझे, कोई और चोट न लगे, बस यही चाहता हूँ।" यह कहते हुए बूढ़ा नन्दू रिक्शे वाला जैसे अतीत में खो गया। ज़ाहिद को वह बचपन… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 2, 2015 at 9:44pm — 14 Comments

"तीन प्रत्युत्तर"-- [प्रत्युत्तर संदर्भित लघु कथा]

"तीन प्रत्युत्तर" [ प्रत्युत्तर संदर्भित लघु कथा]



पति देव जी की ज़िद पर आज पैदल ही दोनों एक समारोह में शामिल होने घर से निकले थे।

बाज़ार में एक सड़क पर एक सात-आठ साल का बच्चा स्कूल बैग लिए बुरी तरह रो रहा था। ट्यूशन से लौटते समय शौच पर नियंत्रण न कर पाने से उसका पैन्ट और पैर पतले 'मल' से सने हुये थे।



पत्नी के विरोध के बावजूद सक्सेना जी ने उस अनजान बच्चे को पास की ही एक प्याऊ तक ले जाकर उसकी सफाई करने में सहायता की। बच्चे का चेहरा खिल उठा। वह सामान्य हो कर घर की ओर चल… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on September 30, 2015 at 12:51am — 11 Comments

"माँ तो माँ है न "- (लघु कथा)

गुड्डी पर स्नेह की वर्षा पर उस समय क्षणिक विराम लगा जब सुमित ने अचानक कक्ष में प्रवेश किया।

"अरे, क्या आज ज़ल्दी आ गयीं थीं स्कूल से?"- सुमित ने आश्चर्य से पूछा।

"नहीं, आज मैं गई ही नहीं, छुट्टी ले ली मैंने ! मालूम है न तुम्हें, आज मैं कितनी अपसेट हूँ !"

"तुमसे कितनी बार कहा दीपा कि जब हमारे बीच बहस शुरू हो जाती है, तो तुम कुछ देर के लिए चुप्पी साध लिया करो। कहीं की भड़ास कहीं निकाली तुमने। सोचो अगर ये फोम का गद्दा न होता तो क्या होता। गुड्डी को इतनी ज़ोर से चांटा मारा तो… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on September 28, 2015 at 12:58pm — 6 Comments

'लक्ष्मी का तकनीकी सफ़र'--(लघु कथा)

"वाह, भाभी इस बार तो ग़ज़ब की जीन्स-टोप लायी हो आगरा से ....लेकिन कुछ ज़्यादा ही महंगा है.....भाई साहब को मना ही लिया आपने !"- शालू ने चहकते हुये लक्ष्मी से कहा ।

"देखो, अभी यहाँ किसी को बताना मत, वरना ख़ानदानी सड़ल्ले रीति-रिवाज़ों के भाषण अभी शुरू हो जायेंगे। जहाँ तक महंगे होने की बात है, तो सुन मैं लक्ष्मी हूँ लक्ष्मी ! मुझे 'लक्ष्मी' को टेकल करने और हैण्डल करने की टेकनीक अच्छी तरह आती है। मेरी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ ये मुझे बीमार ननंद जी को देेखने जबरन आगरा ले तो गये, लेकिन मैं धन-दौलत…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on September 26, 2015 at 2:00pm — 3 Comments

"आतंकी सोच"-- (लघु कथा)

"आतंकी सोच"- (लघु कथा)



"अजी सुनते हो, संगीत सोम है न जो उसको धमकी भरा ख़त मिला है .....और..."



"और क्या ? तुम तो समाचारों की सुर्खियां सुनाती भर जाओ"- सुबह सुबह बिस्तर पर पड़े हुए खन्ना साहब ने अपनी पत्नी से कहा।



"और फ़िल्म कलाकारों के घर में लाखा !!!"



"लाखा ?"



"हां 'लाखा'....होंगे किसी गुट के आतंकी !

जूही चावला, जितेन्द्र और अनिल कपूर के घर में 'लाखा' !"



"अरे ! वो 'लाखा' नहीं ' लार..वा' है 'ला..र..वा' डेंगू का लारवा ! मतलब… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on September 24, 2015 at 10:25am — 5 Comments

"चिंगारियां"- (लघु कथा)

"चिंगारियां" - (लघु कथा)



"और ये देखो मनोविज्ञान और समाजशास्त्र के वो नोट्स जो तुमने मुझे सिविल सर्विस परीक्षा की तैयारी के लिए मुझे दिये थे।इन्हें आज भी मैं संभाल कर रखे हुए हूँ। "- अस्त-व्यस्त से कमरे में वीरेंद्र ने पाँचवीं सिगरेट से एक लम्बा सा कश लेते हुए कहा- " सुमित , तुमने मेरे अंदर भी एक चिंगारी पैदा कर दी थी सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी के लिए.... और विश्वास करो... वह एक आग में भी तब्दील हो गई थी तुम्हारे नियमित सान्निध्य में। तुम एक सच्चे दोस्त और मार्गदर्शक बने रहे… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on September 22, 2015 at 12:22am — 2 Comments

'मुखाग्नि'- (लघु कथा)

आज सुबह उस चाय की गुमटी पर गरमा गरम चाय पीते-पीते कुछ मुखों से शब्दों के अग्नि-बाण से निकल रहे थे।

"अरे सुना तुमने, मज़हब की बंदिशें तोड़ ग़रीब दोस्त संतोष को मुस्लिम युवक रज़्ज़ाक ने कल मुखाग्नि दी !"

यह सुनकर एक पंडित जी बड़बड़ाने लगे-

"सारा अंतिम संस्कार अपवित्र हो गया, पता नहीं आत्मा को कैसे शान्ति मिलेगी ?"

इस पर एक शिक्षित युवक बोला-

"अरे ये सब वो धर्मान्तरित मुसलमान हैं जो आज भी अपने मूल धार्मिक कर्मकांड गर्व से करते हैं।"

तभी एक दाढ़ी वाले ने दाढ़ी पर…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on September 21, 2015 at 9:30am — 24 Comments

बिट्टू वाली नाव- (लघु कथा)

'बिट्टू वाली नाव'- (लघु कथा)



तीनों में से सिर्फ बिट्टू की नाव ही तैर पायी।दोनों बहनें फिर पीछे रह गयीं थीं। रह रह कर पल्लवी को नदी में अपनी और छोटी बहन की डूबती नावों का दृश्य याद आ रहा था।

बेचैन हो कर वह अपनी माँ से पूछ ही बैठी-"हमारी ज़िद पर इतने दिनों के बाद दादाजी ने हमारे लिए नावें बनायीं थीं। ऐसा क्यों मम्मी कि केवल बिट्टू की ही नाव सही तरीके से बनी और वह अच्छे से तैरती रही ?"

शिल्पा बेचारी बच्चों से क्या कह पाती, लेकिन भावुक होकर दोनों बेटियों के सिर पर हाथ फेरते समय… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on September 19, 2015 at 8:42am — 12 Comments

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