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Ashok Kumar Raktale's Blog – October 2015 Archive (1)

कुछ दोहे !

झुमका झांझर चूड़ियाँ, करधन नथ गलहार |

बिंदी देकर मांग भर,.....कर साजन सिंगार ||

 

सूनी सेज न भाय रे, छलकें छल-छल नैन |

पी-पी कर रतिया कटे,....दिन करते बेचैन ||

 

उस आँगन की धूल भी, करती है तकरार |

अपनेपन से लीपकर , जहां बिछाया प्यार ||

 

हरियाली घटने लगी, कृषक हुए सब दीन |

राजनीति जब देश की, खाने लगी जमीन ||

 

टहनी के हों पात या, हों फुनगी के फूल |

दोनों तरु की शान हैं, तरु दोनों का मूल ||…

Continue

Added by Ashok Kumar Raktale on October 8, 2015 at 7:00pm — 8 Comments

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