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सालिक गणवीर's Blog – July 2020 Archive (6)

उनके ख़्वाबों पे ख़यालात पे रोना आया.(ग़ज़ल : सालिक गणवीर)

(2122 1122 1122 22/112)

उनके ख़्वाबों पे ख़यालात पे रोना आया

अब तो मत पूछिये किस बात पे रोना आया

देखता कौन भरी आँखों को बरसातों में

फिर से आई हुई बरसात पे रोना आया

आप चाहें तो जो दो दिन में सुधर सकते हैं

उन बिगड़ते  हुए हालात पे रोना आया

मुद्दतों जिनके जवाबात को तरसा हूँ मैं

आज कुछ ऐसे सवालात पे रोना आया

मुझको मालूम था अंजाम यही होना है

जीत रोने से हुई मात पे रोना आया

दिन…

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Added by सालिक गणवीर on July 29, 2020 at 12:00pm — 13 Comments

ग़ज़ल (यहाँ तनहाइयों में क्या रखा है....)

1222 1222 122

यहाँ तनहाइयों में क्या रखा है

चलो भी गाँव में मेला लगा है

तुझे मैं आज पढ़ना चाहता हूँ

मिरी तक़दीर में अब क्या लिखा है

किनारे पर भी आकर डूब जाओ

नदी है,नाख़ुदा तो बह चुका है

निकलना चाहता है मुझसे आगे

मिरा साया मिरे पीछे पड़ा है

ज़रा आगे चलूँ या लौट जाऊँ

गली के मोड़ पर फिर मैक़दा है

उसी पर मर रहे हैं लोग सारे

जो अपने आप पर कब से फ़िदा है

सितारों चैन से…

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Added by सालिक गणवीर on July 27, 2020 at 8:00am — 13 Comments

ग़ज़ल ( गली से जाते हुए पैरों के निशान मिले....)

1212 1122 1212 22/112

गली से जाते हुए पैरों के निशान मिले

कहीं पे उजड़े हुए-से कई मकान मिले

ये अपने-अपने मुक़द्दर की बात है भाई

मुझे ज़मीं न मिली तुमको आसमान मिले

किसी ज़माने में उनके बहुत क़रीब थे हम

अभी तो फ़ासले ही सिर्फ़ दरमियान मिले

इसे भी बेचने आए थे लोग मंडी में

कहीं पे दीन मिला और कुछ ईमान मिले

मैं चढ़ के आ तो गया हूँ ऊँचाई पर लेकिन

मुझे भी ज़ीस्त में छोटी-सी इक ढलान…

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Added by सालिक गणवीर on July 23, 2020 at 8:01am — 4 Comments

ग़ज़ल ( सोचता हूँ आज तक ग़ज़लों से क्या हासिल हुआ..)

(2122 2122 2122 212)

सोचता हूँ आज तक ग़ज़लों से क्या हासिल हुआ

पहले से बीमार था दिल दर्द भी शामिल हुआ

जब तलक घुटनों के बल चलता रहा था ख़ुश बहुत

आ पड़ा ग़म सर पे जब से दौड़ के क़ाबिल हुआ

ज़िंदगी में तुम नहीं थे इक अधूरापन-सा था

जब से आए हो ये लगता है कि मैं कामिल हुआ

चलते-चलते लोग कहते हैं सफ़र आसान है

ज़िंदगानी में सरकना भी बहुत मुश्किल हुआ

वो शरीक-ए-ग़म है अब मैं क्या कहूँ तारीफ़ में

चोट लगती है मुझे वो…

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Added by सालिक गणवीर on July 21, 2020 at 9:30am — 12 Comments

ग़ज़ल ( हद में कभी थे हद से गुज़रना पड़ा हमें.....)

(221 2121 1221 212)

हद में कभी थे हद से गुज़रना पड़ा हमें

कई बार जीने के लिए मरना पड़ा हमें

शेरों की माँद में भी कभी बेहिचक गए

दौर-ए-रवाँ में चूहों से  डरना पड़ा हमें

आकर समेटता है हमें वो ही बारहा

हर बार टूटते ही बिखरना पड़ा हमें

आए नहीं वो कल भी तो हर बार की तरह

वादे से अपने आज मुकरना पड़ा हमें

मंज़िल भी होती पाँव के नीचे मगर सुनो

उसके लिए रस्ते में ठहरना पड़ा हमें

होते कहीं पे हम भी…

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Added by सालिक गणवीर on July 18, 2020 at 7:00am — 6 Comments

ग़ज़ल ( उकता गया हूँ इनसे मेरे यार कम करो....)

(221 2121 1221 212)

उकता गया हूँ इनसे मेरे यार कम करो

ख़ालिस की है तलब ये अदाकार कम करो

आगे जो सबसे है वो ये आदेश दे रहा

आराम से चलो सभी रफ़्तार कम करो

वो हमसे कह रहे हैं कि मसनद बड़ी बने

हम उनसे कह रहे हैं कि आकार कम करो

जो मेरे दुश्मनों को गले से लगा रहा

मुझसे कहा कि दोस्तोंं से प्यार कम करो

अपने घरों में क़ैद हैं , हर रोज़ छुट्टियाँ

किससे कहें कि अब तो ये इतवार कम करो

बाज़ार में तो…

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Added by सालिक गणवीर on July 11, 2020 at 7:30am — 8 Comments

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