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Ravi Prakash's Blog – June 2015 Archive (1)

मैंने जितना तुमको जाना

मैंने जितना तुमको जाना

अपने मन को पढ़ कर जाना।

॰॰॰

यूँ भी तुमने कब चाहा था

मेरा मन यूँ तुमको चाहे,

रूप तुम्हारा पूजे प्रतिपल

फिर उस पूजन पे इतराए।

लेकिन अपनी सीमाओं में

मन कब सीमित हो पाया है,

पथ के सारे पाषाणों में

तेरी प्रतिमा गढ़ कर माना।

॰॰॰

मुझको ऐसा भान कहाँ था

भाव-दशा यूँ भी होती है,

उन पहरों में मन जागेगा

जिनमें रातें भी सोती हैं।

जग कहता था खेल नहीं है

यूँ पीड़ा से क्रीड़ा करना,

लेकिन मैंने इस पीड़ा… Continue

Added by Ravi Prakash on June 19, 2015 at 2:18pm — 6 Comments

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