For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

Mohit mishra (mukt)'s Blog (36)

ग़ज़ल 2122 :- मोहित मिश्रा

2122

******

क्या कहानी,

जिन्दगानी!

मर गया जब

नयन पानी!

मोह कैसा?

देह फानी,

हम नहीं हैं,

आसमानी!

वक्त की है,

मांग जानी,

आग पर रख,

ये जवानी।

धर दबोचो

कंठ मानी,

भूल कर तुम,

कदरदानी।

खड्ग पर धर,

शांत बानी,

रोर कर दो,

आसमानी।

जय भवानी,

जय…

Continue

Added by Mohit mishra (mukt) on June 8, 2020 at 12:19pm — 4 Comments

मृत्यु और वर्तमान- लेख

मृत्यु और वर्तमान

*****************

मृत्यु, जीवन की अहर्निश साधना का प्रांजल गंतव्य है और परमाकाश के उदात्त एकांत की प्राप्ति जीवात्मा के नैसर्गिक परिणति का एकमात्र सिद्ध परिणाम। शास्त्रीय सिद्धान्तों की सम्मति में, चाहे वे पुनर्जन्म के चक्र को मान्यता दें या न दें, अनेकानेक मार्ग अन्ततोगत्वा आत्मा को उस अनंत एकांत की ओर ले जाते हैं जहाँ निस्सीम शून्य के वर्तुल प्रभामंडल में जीवन-मृत्यु का चक्र लयबद्ध रूप से अनवरत चलता रहता है। अदम्य शांति का महान…

Continue

Added by Mohit mishra (mukt) on March 31, 2020 at 8:00am — 2 Comments

ऐसा न करना लौट कर तुम फिर चले आना

कभी गर ठान लो मन में,

समर्पित हो ही जाना है।

जगत कल्याण के हित में,

जो अर्पित हो ही जाना है।

तो बंधन मोह का चुन चुन के तुमको तोड़ना होगा..

स्वजन की आँख में आँसू भी तुमको छोड़ना होगा ..

सहज है स्वार्थ का जीवन, कठिन है त्याग कर जाना ।

द्रवित होकर किसी के आँसुओं की धार से अविरल,

कहीं ऐसा न करना लौटकर तुम फिर चले आना।

तड़प कर तात ने तन को-

विसर्जित कर दिया अपने।

नयन में मर गए घुटकर,

बिचारी माँ के भी सपने ।

मगर जो लौट…

Continue

Added by Mohit mishra (mukt) on May 26, 2019 at 8:32am — 2 Comments

रंगों का उपहार :- मोहित मुक्त

प्रकाश के तंतुओं से निर्मित,

हमें मिला है प्रकृति द्वारा,

रंगीनियों का उपहार। 

और हम, उसी का धन्यवाद देते हैं,

होली के त्यौहार में।

रंगों का महापर्व, होली !

सिर्फ उत्सव नहीं,

अपितु यह तो है,

दुनिया की प्राचीनतम -

और महानतम सभ्यता का विचार तत्व।

जीवन और प्रकाश से परे,

जब शून्य था ब्रह्मांड,

काले अँधेरे की शक्ल में-

रंग तब भी विद्यमान थे।

और फिर विधाता…

Continue

Added by Mohit mishra (mukt) on March 20, 2019 at 6:01pm — 2 Comments

वेदना का गीत:-मोहित मिश्रा

चिर अखण्डित वेदना को कर समर्पित प्राण अपने-

ध्वंस के अवशेष पर नित नेह का दीपक जलाना,

अब भी है प्रिय कर्म मेरा, याद कर…

Continue

Added by Mohit mishra (mukt) on February 3, 2019 at 7:23am — 5 Comments

मानव पंछी संवाद (अतुकांत )

चानक से,

कर मुझसे,

ठलाता सा पंछी बोला।

श्वर से मानव ने तो,

त्तम ज्ञान-दान था मोला।

पर हो तुम सब जीवों में,

क अकेली जात अनोखी,

सी क्या मजबूरी तुमको-

ट रहे होंठों की शोख़ी?

र सताकर कमज़ोरों को-

अंग तुम्हारा खिल जाता…

Continue

Added by Mohit mishra (mukt) on October 22, 2018 at 8:30am — 1 Comment

श्री अटल-मृत्यु संवाद:- कविता

कहा मौत ने श्री अटल से, वक़्त गया जाने का,

स्वर्ग से आदेश मुझे है, आपको वहाँ लिवाने का।

पर साधारण नर नहीं…

Continue

Added by Mohit mishra (mukt) on August 16, 2018 at 10:00pm — 2 Comments

आत्मकेंद्रण या अभिव्यक्ति:-(छंदमुक्त कविता)

प्रेम का स्वरूप क्या है?

आत्मकेंद्रण या अभिव्यक्ति ?

असंभव सा है, इस प्रश्न का-

निष्कर्षतः एक समुचित उत्तर। 

प्रकृति और पुरुष ब्रह्म,

युग प्रेम के आदि प्रवर्तक,

आकाश सा उन्मुक्त-

स्वछंद पवन सा-

धरा से भी गंभीर उनका प्यार,

अभिव्यक्ति की अभिव्यंजना से दूर-

एकात्म में ही लीन दोनों तत्व ,

हो पृथक जिनका नहीं है अर्थ कोई,

चिर-मौन में हैं साधते वे सत्व ,

इसलिए मन को कभी आभास होता,

स्वरबद्ध करने की जरूरत है नहीं-

अपने…

Continue

Added by Mohit mishra (mukt) on August 5, 2018 at 2:12pm — 7 Comments

मेरे प्यार!

उस रात रह गया,

दिये की थरथराती लौ पर,

काँपता सुबकता हमारा प्यार

स्याह निशा की स्तब्धता-

थी छा गयी तेरे मेरे दरम्यान,

निगल लिया था अंधकार ने-

हमारे कितने किरण-पुंज,

अविरल अश्रु-प्रवाह के बीच,

थे ब्याकुल तुम, विक्षिप्त मैं ,

और साँसों की ऊष्णता से,

थी घुटती हवा हमारे आस-पास,

वेदना-संतप्त मस्तिष्क में ,

गुंजित थे तुम्हारे भीगे-भीगे शब्द,

जो डबडबाई आँखों समेत-

मुँह मोड़ कर तुमने कहा था ,

“यह मिलन आख़िरी…

Continue

Added by Mohit mishra (mukt) on July 17, 2018 at 11:00pm — 5 Comments

अब मिटा दो पास आओ:-मोहित मुक्त

कह रही है दिल की धड़कन, कुछ दिनों से दूर हो तुम,

आह सांसों की, तड़प की, अब मिटा दो पास आओ.

यह अकेलापन मुझे अब काटने को दौड़ता है ,

तन्हा पल की इस चुभन को अब मिटा दो पास आओ.

आलिंगनों के द्वार तुमसे ,कह रहे हैं खोल बाहें,

फूल के श्रृंगार जैसे गोद मेरी तुम सजा दो ,

आंख के अरमान तुमसे कह रहे हैं इंगितों से ,

देख लो तिरछी नजर से औ जरा सा तुम लजा दो ,

होठ जो प्यासे हैं अबतक बोलते हैं सुन लो सजनी ,

तुम जरा सा होठ अपने मेरे होठों से…

Continue

Added by Mohit mishra (mukt) on July 2, 2018 at 6:27pm — 4 Comments

हिमगिरी की आँखे नम हैं(कविता)

हिमगिरि की ऑंखें नम हैं|

पुनः कुठाराघात सह रहीं,

माँ भारती कुछ वर्षों से ।

पीड़ादायी दंश दे रहे ,

नवल विषधर कुछ अरसे से।

फण पर फणधर के नर्तन को,

हलधर के भाई कम हैं।

हिमगिरि की ऑंखें नम हैं|

संस्कृतियों की प्राचीन धरा पर,

देख राजनीति का अंधपतन।

सोच दुर्दशा आम जन-जन की ,

ब्याकुल-ब्यथित-द्रवित है मन।

मोहित अर्जुन को समझाने को ,

गीता की वाणी कम है।

हिमगिरि की ऑंखें नम है।

सूर्य भारत भू के…

Continue

Added by Mohit mishra (mukt) on June 18, 2018 at 6:00pm — 10 Comments

ग़ज़ल (प्रथम प्रयास ):-मोहित मुक्त

अभी भी तुमसे मिलने के कई अरमान बाक़ी हैं ,

मेरी आबादियों के अब तलक निशान बाक़ी हैं।

मैं नंगे पैर शोलों पर अभी भी चल रहा लेकिन ,

मेरे पांवों के छालों में हलक तक जान बाक़ी है।

गले में कस गयीं हैं रस्सियाँ फांसी के फंदे की ,

मगर जिन्दा हूँ क्योंकि मौत का फर्मान बाक़ी है।

फ़क़त कुछ धुप से माना कि मैं सूखता समंदर हूँ ,

मगर अश्कों की बूंदों में बहुत अहजान बाक़ी हैं।

भले ही खाक में मिलने लगा है आसियाँ मेरा…

Continue

Added by Mohit mishra (mukt) on June 10, 2018 at 10:16pm — 6 Comments

भला कैसे(अतुकांत):- मोहित मुक्त

दूर क्षितिज में-

तुम्हारे अधर की ज्यों रंगत चुराकर -

प्राची के प्रान्त पर रक्तिम सी आभा,

हो बिखरने को आकुल तभी मीत मेरे,

मुझे चूमकर तुम जगाने लगो ,

कहो कैसे गाऊँ शुभाषित सुबह के !

प्रणय-छंद ना फिर उच्चारा करूं।



शशि मुख पर-

छिटक आये केश-वेणी से खुल-

प्यारे लट को झटककर झुंझलाती तुम,

हस्त-व्यस्त हों कहीं, होके लाचार सी ,

तुम पुकारो मुझे जब बड़े प्यार से ,

मैं भला कैसे उन्माद से छूट कर ,

रुक जाऊं! तुम्हे ना सताया करूं।

ऐ…

Continue

Added by Mohit mishra (mukt) on June 1, 2018 at 3:15pm — 8 Comments

जो तुम मुझमे घुल-घुल जाते:-मोहित मुक्त

जो तुम मुझमे घुल-घुल जाते।

आंखे गातीं अनुराग राग ,

जी से मिट जाता विराग ,

उन्माद भरे किसलय दोनों ,

अधरों पर ढुल-ढुल जाते ,

जो तुम मुझमे घुल-घुल जाते।

अनुकंपित होता प्राण सखी ,

स्पंदन युत निर्वाण सखी ,

विप्लव, विषाद सूनी रातें ,

सब लम्हों में धुल-धुल जाते ,

जो तुम मुझमे घुल-घुल जाते।

मदमाते पुष्प नवीन विशद ,

उमड़ा आता मधुभावित नद ,

पलकों के अज्ञात-ज्ञात ,

अवगुंठन सब खुल-खुल…

Continue

Added by Mohit mishra (mukt) on May 12, 2018 at 10:22pm — 4 Comments

वियोग (कविता):- मोहित मुक्त

नीरव निशा, निःशब्द दिशा में ,

तारे-विहीन अंबर के निचे ,

प्रेम-अनल की हिमशिखा से,

जल-जल अपना अंतस सींचे।

मर्म लक्ष्य कर व्यंग विशिख को ,

निष्ठुर ने ब्याल सरीखे छोडे ,

मैं विकल तड़पता रहा अकिंचन ,

सहला-सहला दिल के फोड़े।

दृग में आँसू की माला टूटी ,

बिखरे मुक्ताहल गालों पर ,

ब्यथा-उर्मि करुणा-सिंधु की ,

देती दस्तक उर-छालों पर |

एक शून्य उतर सा आया ,

इस जीवन के आंगन में ,

और पर्व मना है इसका ,

किसी निर्दय…

Continue

Added by Mohit mishra (mukt) on May 6, 2018 at 12:32pm — 10 Comments

सीता वनवास (प्रथम भाग):-1 (छंदमुक्त )

लौटे राघव, जनपद भ्रमण कर, हतोत्साहित उदास ,

स्कंध निचे, द्रवित हृदय, उद्वेलित मन, कम्पित श्वास,

चिंतित मन, बार-बार करते हृदय कठोर,

पर कानों में पुनः-पुनः गुञ्जित होता वहीं शोर,

हाय निष्कपट प्रजा यह, पर बुद्धिहीन ,

अंतः विषाद से हो उठा श्याम-मुख-मलिन,

यह कैसा विकट शत्रु बन खड़ा राजधर्म ,

प्रजा बेध रही ब्यंग-विशिख से राम मर्म ,

और राम ! प्रत्युत्तर में विकल, ठगे से मौन ,

सोच रहे मुझसे हतभागा है धरा पर कौन?

हाय माता का ही नहीं…

Continue

Added by Mohit mishra (mukt) on April 5, 2018 at 7:00am — 4 Comments

ये मत सोचो रुक जाऊंगा:-मोहित मुक्त

ये मत सोचो रुक जाऊंगा।

बेताब लहर के धक्कों से -

नौका चूर हो जाएगी,

नियति की वक्र नजर मुझपर -

माना की क्रूर हो जाएगी ,

तूफां हठ ठान भले ही ले-

कर ले चाहे लाख जतन ,

जीवन यज्ञ आहुति में -

हो जाये मेरा सर्वस्व हवन,

पर जबतक धड़कन जिन्दा है-

ये मत सोचो झुक जाऊंगा।

ये मत सोचो रुक जाऊंगा।

ये मत सोचो रुक जाऊंगा।

पग-पग पर शूल मिलें चाहे-

राहों में तप्त अंगारे हों।

पावों में छाले पड़ जाएं या-

रोम-रोम प्यास के मारे…

Continue

Added by Mohit mishra (mukt) on February 6, 2018 at 3:31pm — 7 Comments

आवाहन(कविता ):-मोहित मुक्त

अंगार भर लो लोचनों में, श्वांस में फुंफकार हो ,

नस-नस अनल से पूर्ण हो , पुरुष्त्व का संचार हो।

विश्वास जन का खोकर भी सत्तासीन हो जाते हैं।

जो हर चुनावी परिवेश में नए प्रपंच रचाते हैं।

वैसे दागी लोग न जाने क्यों हमारे नायक हैं ?

क्या वे लोग ही हमपर शासन करने लायक हैं ?

जैसे मृगेंद्र के पुत्रों पर भेड़ियों का बर्चस्व हो।

जैसे गर्दभ-दौड़ में कोई हारता सा अश्व हो।

वैसे ही आज अयोग्य हाथों में हमारा देश है।

फिर भी सुप्त…

Continue

Added by Mohit mishra (mukt) on January 6, 2018 at 9:30pm — 12 Comments

ऐ जाने वाले पल कह दे, इस आने वाले पल से:-मोहित मुक्त

उम्मीदें बहुत हैं, आने वाले कल से।

ऐ जाने वाले पल कह दे,

इस आने वाले पल से।

यह वर्ष भला हो मधुमय हो,

सत्पथ की राह पे तन्मय हो,

यह खुशियों का उजियाला लाये ,

यह शांति-प्रेम का भाव सिखाये ,

इस वर्ष खड़ें हों हटकर ,

कपट-द्वेष से, छल से।

ऐ जाने वाले पल कह दे, .

इस आने वाले पल से।

यह साल नए कुछ घाव न दे ,

असमय-अनुचित वर्ताव न दे ,

इस साल कोई अवसाद न हो ,

किसी से कुछ दुर्वाद न…

Continue

Added by Mohit mishra (mukt) on January 1, 2018 at 12:30am — 14 Comments

आज फिर दर्द छलका:-मोहित मुक्त

आज फिर दर्द छलका।

आँख फिर आज रोयी।

प्रिये, दिल ने फिर से-

स्मृतियाँ संजोई।

शिशिर रात में वह-

प्रणय के मधुर क्षण।

चांदनी की चादर पर -

हम और तुहिन-कण।

नर्म लबों पर-

पीयूष सा वो पानी।

हौले हवा में -

वो घुलती जवानी।

पल पास हैं सब-

तुम हीं हो खोयी।

आज फिर दर्द छलका।

आँख फिर आज रोयी।



शलभ बन जला मैं,

शिखा प्यार की थी।

बात इच्छाओं के,

बस सत्कार की थी।

जुदा मोड़ पर ,

आज दोनों खड़े…

Continue

Added by Mohit mishra (mukt) on November 20, 2017 at 8:30am — 13 Comments

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post वफ़ा के देवता को बेवफ़ा हम कैसे होने दें(११३ )
"भाई Rupam kumar -'मीत'  जी , आपकी हौसला आफ़जाई के लिए दिली शुक्रिया | "
1 hour ago
Manoj kumar Ahsaas commented on Manoj kumar Ahsaas's blog post अहसास की ग़ज़ल: मनोज अहसास
" आदरणीय लक्ष्मण धामी मुसाफिर जी ग़ज़ल में शिरकत और हौसला अफजाई के लिए हार्दिक आभार"
1 hour ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted blog posts
3 hours ago
अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on अमीरुद्दीन 'अमीर''s blog post ग़ज़ल (क्या नसीब है)
"जनाब रूपम कुमार 'मीत' जी, ग़ज़ल पर आपकी हाज़िरी और हौसला अफ़ज़ाई के लिये बहुत बहुत…"
4 hours ago
Chetan Prakash left a comment for Rupam kumar -'मीत'
"मित्र, आपका स्वागत है !"
4 hours ago
Chetan Prakash and Rupam kumar -'मीत' are now friends
5 hours ago
अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post मौत से कह दो न रोके -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' (गजल)
"जनाब लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी, ख़ूबसूरत ग़ज़ल हुई है, बधाई स्वीकार करें। चन्द टंकण…"
5 hours ago
Rupam kumar -'मीत' commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post वफ़ा के देवता को बेवफ़ा हम कैसे होने दें(११३ )
"साहब, गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत' जी आदाब, क़बूल कीजिए, हर शेर के लिए दाद और मुबारक बाद…"
6 hours ago
Rupam kumar -'मीत' commented on सालिक गणवीर's blog post ग़ज़ल ( आएगी कल वफ़ात भी तू सब्र कर अभी...)
"सर सालिक गणवीर जी, सादर अभिवादन क़ुबूल  किजीए। हम वो नहीं हुज़ूर जो डर जाए चोट सेहमने तो…"
6 hours ago
Rupam kumar -'मीत' commented on अमीरुद्दीन 'अमीर''s blog post ग़ज़ल (क्या नसीब है)
"आदरणीय अमीरुद्दीन 'अमीर' साहिब, क्या ही  कहने वाह! बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है।"
6 hours ago
अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on अमीरुद्दीन 'अमीर''s blog post ग़ज़ल (क्या नसीब है)
"जनाब लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी आदाब, ग़ज़ल पर आपकी हाज़िरी और हौसला अफ़ज़ाई के लिये…"
7 hours ago
अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on अमीरुद्दीन 'अमीर''s blog post ग़ज़ल (क्या नसीब है)
"मुहतरम जनाब रवि भसीन 'शाहिद' साहिब, आदाब। ग़ज़ल पर आपकी हाज़िरी, दाद, और हौसला अफ़ज़ाई के…"
7 hours ago

© 2020   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service