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दिनेश कुमार's Blog (83)

ग़ज़ल -- रुख़-ए-पुरज़र्द को गुलफ़ाम कर दे। ( दिनेश कुमार 'दानिश' )

1 2 2 2 1 2 2 2 1 2 2

___________________



रुख़-ए-पुरज़र्द को गुलफ़ाम कर दे

तबीयत में मेरी आराम कर दे



थी अपनी इब्तिदा-ए-इश्क़ मद्धम

तू इसका सुर्ख़रू अंजाम कर दे



किसे मालूम जन्नत की हक़ीक़त

तू आना मयकदे में आम कर दे



पिला नज़रों से अपनी कुछ तो मुझको

नहीं कुछ और , ज़िक्र-ए-जाम कर दे



मोहब्बत की सज़ा ! तुझ गुलबदन को

तू आयद मुझ पे सब इल्ज़ाम कर दे



रगों में इसकी धोका झूट लालच

सियासत पल में क़त्ल-ए-आम कर… Continue

Added by दिनेश कुमार on August 20, 2016 at 4:52am — 5 Comments

ग़ज़ल -- डगर जीवन की जो समतल नहीं है। ( दिनेश कुमार )

1222--1222--122





डगर जीवन की जो समतल नहीं है

मेरी पेशानी पर भी बल नहीं है



समस्या आपकी सुलझाऊँगा मैं

मगर चिंता का कोई हल नहीं है



गवाही दे रही गलियों की रौनक

अभी उस गाँव में गूगल नहीं है



कोई तूफ़ान आएगा यक़ीनन

समन्दर में कहीं हलचल नहीं है



बनारस हो, गया, के हर की पौड़ी

कि अब गंगा कहीं निर्मल नहीं है



उसे हालात की भट्ठी ने ढाला

खरा सोना है वो पीतल नहीं है



मरेगा प्यास से फिर कोई… Continue

Added by दिनेश कुमार on July 4, 2016 at 12:55pm — 6 Comments

ग़ज़ल -- पाँव के नीचे से धरती सर से छप्पर ले गया। ( दिनेश कुमार )

2122--2122--2122--212



पाँव के नीचे से धरती सर से छप्पर ले गया

ज़लज़ला कुछ बेबसों के सारे गौहर ले गया



ज़िन्दगी के खुशनुमा लम्हों से वो महरूम है

शाम को जो साथ अपने घर में दफ़्तर ले गया



हौसला, हिम्मत, ज़वानी, ख़्वाहिशें, बे-फिक्र दिल

वक़्त का दरिया मेरा सब कुछ बहा कर ले गया



सारी दुनिया जीत कर भी हाथ खाली ही रहे

वक़्त-ए-रुख़सत इस जहाँ से क्या सिकन्दर ले गया



छु न पाये हाथ उसके जब मेरी दस्तार को

तैश में आकर वो काँधे से…

Continue

Added by दिनेश कुमार on May 18, 2016 at 5:30pm — 29 Comments

ग़ज़ल -- मेरे आँगन का बूढ़ा शजर.... ( दिनेश कुमार )

212--212--212----212--212--212



अब्र का एक टुकड़ा है वो ......और मैं हूँ बशर धूप का

दिल के सहरा में खोजूं उसे, मैं क़फ़न बाँध कर धूप का



ज़िन्दगी की लिए जुस्तजू ..एक मुद्दत से बेघर हूँ मैं,

गाम दर गाम तन्हाइयाँ....हम-सफ़र है शजर धूप का



बर्फ़ बेशक जमी है बहुत, ख़त्म लेकिन मरासिम नहीं

मैं करुँगा जो करना पड़े... इन्तिज़ार उम्र भर धूप का



नाख़ुदा है मिरा हौसला, और पतवार........ बाज़ू मिरे

अपने साहिल पे पहुँचूँगा मैं, पार करके भँवर धूप… Continue

Added by दिनेश कुमार on May 4, 2016 at 7:19pm — 9 Comments

ग़ज़ल -- मैं कमाता हूँ बड़ी मेहनत से। ( दिनेश कुमार )

2122--1122--22



भाई माँ बाप वफ़ा है पैसा

दौरे-हाज़िर का ख़ुदा है पैसा



हाथ का मैल ही मत समझो इसे

जिस्म की एक क़बा है पैसा



जा के बाज़ार में देखो तो सही

हर तरफ जल्वा-नुमा है पैसा



जिसको हासिल है वही इतराए

खूबसूरत सा नशा है पैसा



यूँ दुआ अपनी जगह काम आए

अस्पतालों में दवा है पैसा



वक़्त से पहले या किस्मत से अधिक

आज तक किसको मिला है पैसा



मैं कमाता हूँ बड़ी मेहनत से

मुझको मालूम है क्या है… Continue

Added by दिनेश कुमार on May 4, 2016 at 7:11pm — 7 Comments

ग़ज़ल -- "मैं ग़ज़ल की पलकें सँवार लूँ" बशीर साहब की ज़मीन में एक कोशिश। ( दिनेश कुमार )

11212--11212--11212--11212



लो गुनाह और सवाब की, मैं ये रहगुज़ार बुहार लूँ

या तो खुद को कर लूँ तबाह मैं , या हयात अपनी सँवार लूँ



तू हर एक शै में समाया है...के वो ज़र्रा हो या हो आफ़ताब

मेरी बन्दगी है यही ख़ुदा, के मैं खुद में तुझ को निहार लूँ



मुझे माँगने में हिचक नहीं, न वो नाम का ही रहीम है

जो लिखा न मेरे नसीब में.. उसे मैं ख़ुदा से उधार लूँ



मेरी साँस साँस तड़फ रही, तेरी इक नज़र को मिरे ख़ुदा

मुझे अपने पास बुला या फिर,मैं तुझे… Continue

Added by दिनेश कुमार on April 17, 2016 at 8:52am — 6 Comments

ग़ज़ल -- ख़बर कहाँ थी मुझे पहले इस ख़ज़ाने की ( दिनेश कुमार )

1212--1122--1212--22





ख़बर कहाँ थी मुझे पहले इस ख़ज़ाने की

ग़मों ने राह दिखाई .........शराबख़ाने की



चराग़े--दिल ने की हसरत जो मुस्कुराने की

तो खिलखिला के हँसी आँधियाँ ज़माने की



मैं शायरी का हुनर जानता नहीं ....बेशक

अजीब धुन है मुझे क़ाफ़िया मिलाने की



वजूद अपना मिटाया किसी की चाहत में

बस इतनी राम कहानी है इस दिवाने की



वो घोसला भी बनाएगा बाद में ...अपना

अभी है फिक्र परिन्दे को आबो-दाने की



मैं अश्क बन… Continue

Added by दिनेश कुमार on April 15, 2016 at 6:08pm — 4 Comments

ग़ज़ल -- फ़क़ीर हूँ मैं नवाब जैसा। ( दिनेश कुमार )

121 22 -- 121 22



बहिश्त के इक गुलाब जैसा

बदन वो जामे शराब जैसा



मैं उसको पढ़ता हूँ झूमता हूँ

सुख़न की वो इक किताब जैसा



न पूछो दीवानगी का आलम

सुकूँ का पल इज़्तिराब जैसा



हर एक ख़्वाहिश सराब जैसी

हर एक लम्हा अज़ाब जैसा



वो अपने चेहरे से कब है ज़ाहिर

कि उसका चेहरा नक़ाब जैसा



है इश्क़ करना गुनाह बेशक

गुनाह लेकिन सवाब जैसा



फिसलता मुट्ठी से वक़्त हर पल

ये अपना जीवन हुबाब जैसा



जो… Continue

Added by दिनेश कुमार on April 5, 2016 at 6:59pm — 10 Comments

ग़ज़ल -- दुनिया का ढब दुनिया जैसा होता है। -- दिनेश कुमार

22--22--22--22-22--2





दुनिया का ढब दुनिया जैसा होता है

जो भी होता है वो अच्छा होता है



शाम ढले जब चिड़िया अपने घर लौटे

चोंच में उसके यारों दाना होता है



बाद में तो समझौते होते हैं दिल के

प्यार तो केवल पहला पहला होता है



अपने दम पर अब तक़दीर सँवारो तुम

मेहनतकश हाथों में सोना होता है



सोच रहा है आँगन का बूढ़ा बरगद

घर का आखिर क्यों बँटवारा होता है



चूड़ी कंगन पायल सब बेमानी हैं

लज्जा ही औरत का गहना होता… Continue

Added by दिनेश कुमार on March 9, 2016 at 6:00am — 10 Comments

ग़ज़ल -- ज़िन्दगी मैंने गुज़ारी ख़्वाब में। ( दिनेश कुमार )

2122--2122--212



हौसले जिनके बहे सैलाब में

उम्रभर फिर वे रहे गिर्दाब में



हो मुबारक चापलूसी आपको

अपनी दिलचस्पी नहीं अलक़ाब में



ढो रहें हैं बोझ हम तहज़ीब का

गर्मजोशी अब कहाँ आदाब में



कुछ अधूरे ख़्वाब, आहें और अश्क

बस यही है अब मेरे असबाब में



कौन करता रौशनी की कद्र अब

ढूँढ़ते हैं दाग़ सब महताब में



गीत ग़ज़लें छन्द मुक्तक हम्द नात

क्या नहीं है शायरी के बाब में



इसकी ख़ुशहाली का कारण ये भी… Continue

Added by दिनेश कुमार on January 21, 2016 at 7:27am — 8 Comments

ग़ज़ल -- दोस्तों का दिनेश भाई है

2122--1212--22



पीर आँखों में जो पराई है

हम फकीरो की ये कमाई है



दौरे-हाज़िर में रोज़ सूरज ने

इन अँधेरों से मात खाई है



बाप को फिर से एक बेटे ने

उसकी नज़रों की हद बताई है



जिसने रिश्वत में रोशनाई दी

उस पे किसने क़लम उठाई है



अपनी हद में रहो, सबक देकर

मौज़ साहिल से लौट आई है



क्या ज़मीं आसमान मिल ही गए

कहकशां जो ये मुस्कुराई है



दुश्मनों का अगरचे है दुश्मन

दोस्तों का दिनेश भाई… Continue

Added by दिनेश कुमार on November 1, 2015 at 2:55pm — 4 Comments

ग़ज़ल -- आईना बना ले मुझको .... दिनेश कुमार

2122-1122-1122-22



अहले महफ़िल की निग़ाहों से छुपा ले मुझको

मैं तेरा ख़्वाब हूँ आँखों में बसा ले मुझको



अपनी मंज़िल पे यकीनन मैं पहुंच जाऊँगा

कोई बस राहनुमाओं से बचा ले मुझको



रात कटती है न अब दिन ही मेरा तेरे बग़ैर

मेरी आवारगी नेजे पे उछाले मुझको



सबके दुखदर्द में जब मैंने मसीहाई की

इस ग़मे जाँ में कोई क्यूँ न सँभाले मुझको



शख़्सियत तेरी सँवारूंगा ये वादा है मिरा

अपनी तक़दीर का आईना बना ले मुझको



दिल के दरिया में… Continue

Added by दिनेश कुमार on September 15, 2015 at 4:30pm — 11 Comments

ग़ज़ल -- कोई रास्ता मिले ...( बराए इस्लाह ) .... दिनेश कुमार

221-2121-1221-212



मंज़िल मिले न मुझको कोई रास्ता मिले

सहरा-ए-ज़िन्दगी में फ़क़त नक्शे पा मिले



मरने से भी ग़ुरेज़ न मुझ जैसे रिन्द को

लेकिन ये हो कि मर के मुझे मयकदा मिले



क़ैद-ए-नफ़स से रूह जो आज़ाद हो मिरी

फिर उसको पैरहन न कोई दूसरा मिले



बेचैन हूँ मैं गर्मी-ए-अहसास-ए-हिज्र से

अब तो तुम्हारे प्यार की ताज़ा हवा मिले



पुरपेंच पुरख़तर है ये जीवन की रहगुज़र

अच्छा हो रहनुमा जो अगर आप सा मिले



तूफाँ की ज़द में आ गयी कश्ती… Continue

Added by दिनेश कुमार on September 8, 2015 at 4:38pm — 18 Comments

ग़ज़ल -- कौन है यह रूबरू.... दिनेश कुमार

2122-2122-2122-212



वक़्त के गुज़रे हुए लम्हात की तफ़्सीर है

मेरी हस्ती मेरी माँ के ख़्वाब की ताबीर है



मुझको दुनिया भर की दौलत से नहीं कुछ वास्ता

मेरे क़दमों में पड़ी अलफ़ाज़ की जागीर है



आइना देखा जो बरसों बाद, मैं हैरान हूँ

कौन है यह रूबरू, किस शख़्स की तस्वीर है



अहले महफ़िल के लिए बेशक मआनी और हो

शाइरी मेरे ग़मों की पुरख़लिश तहरीर है



नित नई परवाज़ केवल ख़्वाब ही रह जाएगा

इन परिन्दों को बताओ बुज़दिली ज़ंजीर है



भूख… Continue

Added by दिनेश कुमार on September 4, 2015 at 7:00am — 7 Comments

तरही ग़ज़ल -- 'चलते चलते हम कहाँ तक आ गए ' ( दिनेश कुमार )

२१२२-२१२२-२१२



तीर-ए-अब्रू जब कमाँ तक आ गए

उनकी ज़द में जिस्मो-जाँ तक आ गए

.

तिश्नगी-ए-बे-कराँ तक आ गए

अब्र-ए-तर मेरे मकाँ तक आ गए

.

दाग़ सीरत पर लगे थे और हम

बस्ती-ए-सूरत-गराँ तक आ गए

.

रफ़्ता-रफ़्ता कम हुआ ज़ब्त-ए-अलम

दर्द-ए-जाँ मेरी ज़ुबाँ तक आ गए

.

हम को भी इक गुलबदन की चाह थी

हम भी कू-ए-गुलिस्ताँ तक आ गए

.

मंज़िल-ए-मक़सूद भी दिखने लगी

हम जो मीर-ए-कारवाँ तक आ गए

.

याद आया जब हमें बचपन बहुत

हम… Continue

Added by दिनेश कुमार on August 15, 2015 at 5:30pm — 7 Comments

राहत इन्दौरी साहब की ज़मीन पर एक ग़ज़ल -- दिनेश

2122-1122-1122-22



जिनको परखो, वो दग़ाबाज़ निकलते क्यूँ हैं

वक़्त पड़ने पे सभी लोग बदलते क्यूँ हैं



आज देखा जो उन्हें, हमको समझ में आया

देख कर उनको सितारे भी फिसलते क्यूँ हैं



कारवाँ दिल का लुटा था कभी जिन पर चलकर

जिस्मो-जाँ मेरे उन्हीं राहों पे चलते क्यूँ हैं



दरमियाँ अपने मरासिम जो थे सब टूट चुके

फिर मेरे ख़्वाब तेरी आँखों में पलते क्यूँ हैं



जब सियासत के हर इक रंग से हैं हम वाकिफ

रोज़ सरकारों के जुमलों से बहलते क्यूँ… Continue

Added by दिनेश कुमार on August 9, 2015 at 6:30am — 18 Comments

ग़ज़ल की कोशिश

1212-1122-1212-22

--------------------

.

यकीन कर लो समन्दर में आब-रूद नहीं

जवान दिल में अगर कोई मौज-ए-दूद नहीं

.

जुनून-ए-इश्क़ भी ढ़लता है रोज़-ए-वस्ल के बाद

ये कहकशाँ भी हक़ीक़त में बे-हुदूद नहीं

.

मैं तेरी गर्मी-ए-हिजरत से भी हूँ वाबस्ता

मेरा वुजूद कोई बर्फ का जुमूद नहीं

.

ब-रोज़-ए-हश्र ऐ दिल तेरा वह'म टूटेगा

तू सोचता, तेरे आमाल के शुहूद नहीं

.

तवील दौर है गर्दिश का तेरी क़िस्मत में

कि तेरा ताब-ओ-तवाँ खोना फ़ेल-ए-सूद… Continue

Added by दिनेश कुमार on August 2, 2015 at 6:30am — 13 Comments

ग़ज़ल -- कश्तियाँ बरसात में

2122-2122-2122-212

.

मुस्कुरा कर कह रही कुछ झुर्रियाँ बरसात में

देखीं थीं हमने कभी रंगीनियाँ बरसात में

.

आज का बचपन न जाने कौन सी चिन्ता में गुम

अब नहीं कागज़ की दिखतीं कश्तियाँ बरसात में

.

ज़ेह्न में रच बस गया है अब तो उनका ज़ायका

माँ खिलाती थी हमें जो पूरियाँ बरसात में

.

आज घर में शाम को चूल्हा जलेगा किस तरह

कह रही मजदूर की मजबूरियाँ बरसात में

.

मेरे घर की छत गिरी थी या गिरा था आसमाँ

जो हुईं उस रात थीं दुश्वारियाँ बरसात…

Continue

Added by दिनेश कुमार on June 17, 2015 at 8:34am — 14 Comments

ग़ज़ल -- दुश्मनों से भी मुहब्बत करना .

2122-1122-22.

अपनी मंज़िल की जो हसरत करना

घर से चलने की भी हिम्मत करना

.

कोई तुझको जो अमानत सौंपे

जान देकर भी हिफ़ाजत करना

.

कहना आसान है करना मुश्किल

दुश्मनों से भी मुहब्बत करना

.

आज बचपन में है वो बात कहाँ

वक़्त बे-वक़्त शरारत करना

.

तेरे भीतर का ख़ुदा जाग उठे

इतनी शिद्दत से इबादत करना

.

सिर्फ कहने को ही तेरा न हो वो

उसके दुख दर्द में शिरक़त करना

.

फ़र्ज़ औलाद का यह होता 'दिनेश'

अपने माँ बाप की…

Continue

Added by दिनेश कुमार on June 10, 2015 at 10:46am — 16 Comments

तरही ग़ज़ल -- " बहुत सलीक़े से रूठा हुआ है यार मेरा " .

१२१२-११२२-१२१२-२२

निग़ाहे नाज़ से देखो, करो शिकार मेरा

तुम आजमाओ सनम दिल ये एक बार मेरा

.

तू आरज़ू है मेरी और तू है प्यार मेरा

तेरी वफ़ा पे है अब जीने का मदार मेरा

.

तेरे शबाब को नज़रों से क्यूँ पिया मैंने

तमाम उम्र न उतरेगा अब ख़ुमार मेरा

.

मुआमलात-ए-जवानी कहे नहीं जाते

न पूछ कौन है हमदम, कहाँ क़रार मेरा

.

वो मुझसे बात तो करता है, पर वो बात नहीं

" बहुत सलीक़े से रूठा हुआ है यार मेरा "

.

वो बदगुमाँ है जो, कमज़र्फ़ मुझको…

Continue

Added by दिनेश कुमार on June 9, 2015 at 2:21pm — 20 Comments

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