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दिनेश कुमार's Blog – August 2015 Archive (3)

तरही ग़ज़ल -- 'चलते चलते हम कहाँ तक आ गए ' ( दिनेश कुमार )

२१२२-२१२२-२१२



तीर-ए-अब्रू जब कमाँ तक आ गए

उनकी ज़द में जिस्मो-जाँ तक आ गए

.

तिश्नगी-ए-बे-कराँ तक आ गए

अब्र-ए-तर मेरे मकाँ तक आ गए

.

दाग़ सीरत पर लगे थे और हम

बस्ती-ए-सूरत-गराँ तक आ गए

.

रफ़्ता-रफ़्ता कम हुआ ज़ब्त-ए-अलम

दर्द-ए-जाँ मेरी ज़ुबाँ तक आ गए

.

हम को भी इक गुलबदन की चाह थी

हम भी कू-ए-गुलिस्ताँ तक आ गए

.

मंज़िल-ए-मक़सूद भी दिखने लगी

हम जो मीर-ए-कारवाँ तक आ गए

.

याद आया जब हमें बचपन बहुत

हम… Continue

Added by दिनेश कुमार on August 15, 2015 at 5:30pm — 7 Comments

राहत इन्दौरी साहब की ज़मीन पर एक ग़ज़ल -- दिनेश

2122-1122-1122-22



जिनको परखो, वो दग़ाबाज़ निकलते क्यूँ हैं

वक़्त पड़ने पे सभी लोग बदलते क्यूँ हैं



आज देखा जो उन्हें, हमको समझ में आया

देख कर उनको सितारे भी फिसलते क्यूँ हैं



कारवाँ दिल का लुटा था कभी जिन पर चलकर

जिस्मो-जाँ मेरे उन्हीं राहों पे चलते क्यूँ हैं



दरमियाँ अपने मरासिम जो थे सब टूट चुके

फिर मेरे ख़्वाब तेरी आँखों में पलते क्यूँ हैं



जब सियासत के हर इक रंग से हैं हम वाकिफ

रोज़ सरकारों के जुमलों से बहलते क्यूँ… Continue

Added by दिनेश कुमार on August 9, 2015 at 6:30am — 18 Comments

ग़ज़ल की कोशिश

1212-1122-1212-22

--------------------

.

यकीन कर लो समन्दर में आब-रूद नहीं

जवान दिल में अगर कोई मौज-ए-दूद नहीं

.

जुनून-ए-इश्क़ भी ढ़लता है रोज़-ए-वस्ल के बाद

ये कहकशाँ भी हक़ीक़त में बे-हुदूद नहीं

.

मैं तेरी गर्मी-ए-हिजरत से भी हूँ वाबस्ता

मेरा वुजूद कोई बर्फ का जुमूद नहीं

.

ब-रोज़-ए-हश्र ऐ दिल तेरा वह'म टूटेगा

तू सोचता, तेरे आमाल के शुहूद नहीं

.

तवील दौर है गर्दिश का तेरी क़िस्मत में

कि तेरा ताब-ओ-तवाँ खोना फ़ेल-ए-सूद… Continue

Added by दिनेश कुमार on August 2, 2015 at 6:30am — 13 Comments

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