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December 2015 Blog Posts (159)

ग़ज़ल- सारथी || दोस्त कोई न मेह्रबाँ कोई ||

दोस्त कोई न मेह्रबाँ  कोई 

काश मिल जाए राज़दाँ कोई  /१

दिल की हालत कुछ आज ऐसी है 

जैसे लूट जाए कारवाँ कोई  /२ 

एक ही बार इश्क़ होता है 

रोज होता नहीं जवाँ कोई  /३  

तुम को वो सल्तनत मुबारक हो 

जिसकी धरती न आसमाँ कोई   /४ 

सारथी कह सके जिसे अपना 

सारथी के सिवा कहाँ कोई /५ 

...........................................
सर्वथा मौलिक व अप्रकाशित

अरकान: २१२२ १२१२ २२ 

Added by Baidyanath Saarthi on December 14, 2015 at 3:14pm — 9 Comments

ग़ज़ल- सारथी || तलाशी ले रहीं आँखें हमारी ||

तलाशी ले रहीं आँखें हमारी 

न आँखें रोक दें साँसें हमारी  /१

गुजर तो जाता है दिन जैसे तैसे 

मगर कटती नहीं रातें हमारी /२ 

न जाने लग रहा है बारहा क्यूँ 

उन्हें मालूम हैं बातें हमारी  /३  

जो कहना है सो कह दो कौन जाने 

दुबारा हों मुलाकातें हमारी  /४ 

अगर तुम जा रहे हो याद रखना 

कि पल पल तरसेंगी बाँहें हमारी  /५ 

...........................................
सर्वथा मौलिक व अप्रकाशित

अरकान: १२२२ १२२२ १२२ 

Added by Baidyanath Saarthi on December 14, 2015 at 3:00pm — 5 Comments

हकीकत.....

हकीकत.....

उस दिन

जब तुमने मेरे काँधे पे

अपना हाथ रखा था

कितने ख़ुशनुमा अहसास

मेरे ज़हन में

उत्तर आये थे

लगा भटकी कश्ती को

जैसे साहिलों ने

अपनी आगोश में ले लिया हो

मगर मैं उन सुकून देते लम्हों को

कहाँ पहचान पायी थी

क्या खबर थी कि तुम

इज़हारे मुहब्बत के बहाने

मेरे कमजोर कांधों की

ताकत नाप रहे थे

मैंने तुम्हें अपना सागर मान

अपने वज़ूद को

तुम्हें सौंप दिया

आज तक

तुम्हारी उँगलियों की वो छुअन…

Continue

Added by Sushil Sarna on December 14, 2015 at 1:00pm — 4 Comments

है जनता की समस्या का -( गजल )- लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’

नेताई गजल

*************

1222 1222 1222 1222

********************

सदन में आप गर आओ वतन की बात मत करना

सहोदर  जैसे आपस में  गबन  की बात मत करना /1



उड़ाए  हमने  चुपके   से  लँगोटों  के  लिए सच है

शहीदों के हों नंगे तन कफन की बात मत करना /2



कभी  तुम  बोल  देते  हो  कभी  हम  बोल  देते हैं

चुनावी बात सबकी ही वचन की बात मत करना /3



दिखा  करते  हैं  फूलों सा मगर फितरत  है शूलों सी

गले आपस में मिलने पर चुभन की बात मत करना…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 14, 2015 at 11:36am — 13 Comments

ग़ज़ल

१२२  १२२ १२२  १२२

किसी मायने में भी कमतर नही हूँ                         

मगर पूजा जाऊं वो पत्थर नहीं हूँ

 

इसी को तो कहते है किस्मत भी शायद

तेरा हो के तेरा मुकद्दर नहीं हूँ

 

मेरी साइतों में ‘‘ठहरना’’ नही है..

मैं दरिया हूँ प्यासा ; समन्दर नहीं हूँ

 

पलटकर जरा देख इक़ बार फिर से

यही सोच लूँ गुजरा मंजर नहीं हूँ.

 

तेरे कू पे बैठा अगरचे हूँ लेकिन

जो कुछ मांगे मैं वो कलंदर नहीं…

Continue

Added by jaan' gorakhpuri on December 14, 2015 at 11:04am — 6 Comments

है देशों में वो देश महान,अपना प्यारा हिंदुस्तान (देशभक्ति गीत)

छोड़ शहर की रौनक,जिसके

गाँव में बसते प्राण।

जिसकी पावन धरती ने है

जने वीर संतान।

जिसकी गौरव-गाथा का

करे विश्व गुणगान।



है देशों में वो देश महान।

अपना प्यारा हिन्दुस्तान।।



सूरत से भी ज़्यादा उनकी

होती सीरत प्यारी।

हृदय में जिनके बहती है

करुणा जग की सारी।

वक़्त पड़े तो रणभूमि में

जौहर दिखलाती नारी।



अत्याचार को देख के जिनके

दिल में उठता है तूफ़ान।।



राजतंत्र को मिटा जिन्होंने

गणतंत्र हमें…

Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on December 13, 2015 at 9:30pm — 6 Comments

ग़ज़ल : जिसको ताकत मिल जाती है वही लूटने लगता है

बह्र : २२ २२ २२ २२ २२ २२ २२ २

 

देख तेरे संसार की हालत सब्र छूटने लगता है

जिसको ताकत मिल जाती है वही लूटने लगता है

 

सरकारी खाते से फ़ौरन बड़े घड़े आ जाते हैं

मंत्री जी के पापों का जब घड़ा फूटने लगता है

 

मार्क्सवाद की बातें कर के जो हथियाता है सत्ता

कुर्सी मिलते ही वो फौरन माल कूटने लगता है

 

जिसे लूटना हो कानूनन मज़लूमों को वो झटपट

ऋण लेकर कंपनी खोलता और लूटने लगता है

 

बेघर होते जाते मुफ़लिस, तेरे…

Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 13, 2015 at 2:49pm — 10 Comments

सलवटें

कहने को दोस्त हैं बहुत

लेकिन दोस्त,

सच में 

तुम ही  "एक"  दोस्त थी मेरी

अपरिभाषित दिशाओं के पट खोल

सुविकसित कल्पनाओं को बहती हवाओं में घोल

मुझको अँधियाले ताल के तल से

प्रसन्नता की नभचुम्बी चोटी पर ले गई थी

वह तुम ही तो थी

हर हाल में मुझको

लगती थी अपनी

इतनी

कि मैं पैरों के घिसे हुए तलवों को

मन की फटी हुई चादर की सलवटों को

दिखाने में संकोच नहीं करता था...

सवाल ही नहीं उठता…

Continue

Added by vijay nikore on December 13, 2015 at 9:17am — 12 Comments

पहल (लघुकथा)

पवन व अशोक बहुत अच्छे दोस्त, मगर जब भी कभी पवन, अशोक से समाज की किसी समस्या के बारे में बात होती तो उस का बना बनाया एक ही जवाब होता ।

“कि मेरे साथ  राजनीती की बात न करो, सायद उस ने सोच रखा है कि जिन बातों का उस के घर, बच्चों व नौकरी से संबध नहीं, वो सभी बातें फजूल है ।“  

अशोक को घर में भी ऐसी बहस फजूल सी लगती ।

पवन को बात शुरू करते ही अशोक कह देता और कोई  बात करो , राजनीती नहीं , वरना वह शुरू होते ही विराम लगा देता,और कई बार  वहाँ से उठ कर चला जाता ।  

मगर पवन ने…

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Added by मोहन बेगोवाल on December 12, 2015 at 10:30pm — 2 Comments

व्यावहारिकता (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी (43)

"सुनते हो जी, मुझे तो ये वही लग रहा है जिसने...."

"हे भगवान ! ये तो वही है ! लेकिन इस वक़्त बहू उसके साथ कहां और क्यों जा रही है?

"तो इस क़ीमत पर सुदीप का प्रमोशन और उसकी बेटी की सरकारी नौकरी ?"

"हमारी दिल से सेवा करने वाली बहू हमारी पीठ पीछे....! तो ये है 'बी प्रेक्टिकल' कहने वाली 'एक्टिव' शिक्षिका !"

(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by Sheikh Shahzad Usmani on December 12, 2015 at 10:18pm — 8 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
गुमनामियों में खो गये कुछ लोग हार के- शिज्जु शकूर

फ़ैज़ साहब की ज़मीन पर एक कोशिश



221 2121 1221 212

गुमनामियों में खो गये कुछ लोग हार के

कुछ आ गये वरक़ पे फ़साना-निगार के



सपने तमाम पलकों से मैंने उतार के

लौटा दिये हयात को लम्हे उधार के



बेचैनियाँ मिली मुझे तेरी तलाश में

तुझको ही खो दिया तेरी आर्ज़ू में हार के



काँटों के चुभते ही मैं हक़ीकत में आ गया

खुश था मुग़ालतों की वो घड़ियाँ गुज़ार के



अपनी जबाँ से जिसने जलाई हैं निस्बतें

मा’ने बता रहे हैं वही इन्कि़सार… Continue

Added by शिज्जु "शकूर" on December 12, 2015 at 8:19pm — 10 Comments

सोच सोच जो रह जाती |

लावनी छंद |

नारी की असीम ताक़त है , मिट्टी को करती सोना |

जंगल में मंगल कर देती , सारे रश्मों को ढोना |

बनती बेटी ससुराल बहू , माँ को छोड पड़े रोना |

अजनवी घर अपना बनाती , हर सुख दुःख पड़े ढोना |

नारी जीवन की धारा है , साथ साथ साथ निभाती |

खुशी खुशी बच्चों को पाले , सबके संग घर चलाती |

घरनी बिन घर सूना लागे , जब छोड़ मायके जाती |

आये जब घर आँगन खिलता , जीवन में खुशियाँ लाती |

पति जाये जब गलत राह पर , विनय कर उसे समझाती |

पर अपने को अबला समझे…

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Added by Shyam Narain Verma on December 12, 2015 at 6:00pm — 2 Comments

बिकाऊ प्रार्थना - लघुकथा

सब उसे पागल कहते थे, लेकिन एक बुद्धिजीवी का दिमाग उसे पागल नहीं मानता था|

आज उस बुद्धिजीवी ने देखा कि वो एक मंदिर में गया, वहां नमाज़ पढ़ी|

फिर एक गुरूद्वारे में गया और वहां कैरोल गाया|

और एक गिरजे में गया और आरती की|

फिर एक मस्जिद में गया और वहाँ अरदास की|

आखिर में अपनी जगह पर जाकर बहुत रोया,

बुद्धिजीवी ने कारण पूछा तो उसके उत्तर में भी एक प्रश्न था, "हर धार्मिक-स्थल पर दान दिया था| वो बिकता तो है, लेकिन मिलता कहाँ है?"

बुद्धिजीवी समझ गया वो पागल ही…

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Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on December 12, 2015 at 11:04am — 3 Comments

अभिलाषा जाग रही

सूने आंगन में जाल बिछा चांदनी रात सोयी रोकर

मेरी अभिलाषा जाग रही रागायित हो पागल होकर

मैं समय काटता रहा विकल

दायें-बायें  करवटें   बदल

घिर आये मानस-अम्बर पर

स्वर्णिम सपनीले बादल-दल

बौराया घूम रहा मारुत अपनी सब शीतलता खोकर  

सपनो में चल घुटनों के बल

सरिता तट पर आया था जब

कह डाला कुछ मन की मैंने

वह बज्र प्रहार हुआ था तब

सायक सा टूटा था अंतस निर्दयता  की खाकर ठोकर  

 यह नाग आँख में है अविरल

छोड़ता निरंतर…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 10, 2015 at 8:30pm — 5 Comments

मायरा ( लघु कथा ) जानकी बिष्ठ वाही

मानों कयामत बरपा हो गई। पूरा शहर लबालब भरा है।चारों ओर त्राही-त्राही मची हुई है। शिवानी प्रसव वेदना से तड़प रही है। शरद पैदल ही उसे अस्पताल ले जा रहा है

"अब बचना मुश्किल है।"कराहते हुए शिवानी बोली।

पानी गले-गले तक पहुँच गया।जीवन की आशा क्षीण हो चली है। एक अज़नबी तैरता हुआ करीब आया।

"मैं आप लोगों को सुरक्षित जगह पहुंचाने आया हूँ।"

उसकी मदद से शरद समय पर शिवानी को अस्पताल पहुंचाने में सफ़ल हो गया।

"शुक्रिया ! आज़ तुम न होते तो जाने क्या होता? "शरद ने कहा।

"ये तो…

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Added by Janki wahie on December 10, 2015 at 5:30pm — 10 Comments

वारिस(लघुकथा)

"ब्याह के बीस साल पाच्छे(बाद) हुआ तो वो भी एक छौरी...... . ."

ऐसा कहते हुए हस्पताल में मिलने आई जेठानी ज़ोर ज़ोर से रोने लगी और वह अचंभित सी उसकी ओर देख रही थी।

"बालक सा हो ज्याता तो..." थोड़ी देर बाद फिर फूटी जेठानी।

"के बोल री हो बहनजी?अर आप रो क्यों रही हो इस मौके पै?"

"भगवान नै इतने साल मैं कोख खोली पर बालक कोणी दिया।बालक सा हो जाता तो घर न वारिस मिल जाता।"

"इब बस करो बहन जी।जब की टसुवे (आँसू) बहा री हो।हमने तो शुकर मनाना चाहिए भगवान का।के वारिस-वारिस की रट ला रखी… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on December 10, 2015 at 11:11am — 3 Comments

"बदला"

पुलिस चौकी को कार्यक्रम स्थल मे बदल दिया गया है , सामने  लोगो का मजमा लगा हुआ है | उसे देखने के लिये सब बडे आतुर है । आज वो आत्मसमर्पण करने वाली है प्रदेश के सी.एम के सामने । तभी पीली बत्ती की गाड़ी भांय-भांय कर कार्यक्रम स्थल मे प्रविष्ट होती है । तथाकथित सारे उच्चाधिकारी उन्हे घेरे खड़े है ।

कडे सुरक्षा कवच के बीच अंतत वह अपनी बंदूक उनके चरणों मे रख आत्मसमर्पण कर देती है । अन्य औपचारिकता के बाद कार्यक्रम समाप्ती की घोषणा हो जाती है ।

सभी समाचार पत्रों के कुछ तथाकथित  …

Continue

Added by नयना(आरती)कानिटकर on December 10, 2015 at 9:26am — 3 Comments

ममता बल (लघु कथा)

सुबह से शाम तक बस काम ही काम।घर में सबसे पहले जागना और सबसे बाद में देर रात गए सो पाना।यही मीना की दिनचर्या थी।काम करने में उसे आनंद ही आता था।दो देवरानियां और एक जेठानी।चारों में अकेली शिक्षित और काम भी सबसे ज्यादा मीना ही करती थी।

इस सबके बावज़ूद जेठानी की हृदय चीरती बातें सुननी पड़ती।उसकी कोई भी बात ऐसी न होती जो ताना न हो।कभी उसके पति को, कभी उसके बच्चों को तो कभी उसे ही ओछे स्तर की बात जेठानी गाहे बगाहे बोलती रहती।

पति को उसके द्वारा कहा जाता कि ऐसी बातें वह नहीं सह पाती।पति बस… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on December 10, 2015 at 6:36am — 6 Comments

मुझको तुम्हारी याद ने सोने नहीं दिया

मुझको तुम्हारी याद ने सोने नहीं दिया

तन्हाइयों की भीड़ में खोने नहीं दिया

 

चाहा तो बार बार के हो जाऊँ बेवफ़ा

लेकिन तुम्हारे प्यार ने होने नहीं दिया

 

अब तो धुंवाँ धुंवाँ सी हुई मेरी ज़िंदगी

जलने दिया न, राख़ भी होने नहीं दिया

 

लब पे सजा लिए हैं तवस्सुम की झालरें

एहसास ग़म का दुनिया को होने नहीं दिया

 

आँखों में अश्क आप की आ जाएँ ना कहीं

इस डर से अपने आप को रोने नहीं दिया

 

अपना सका मुझे न…

Continue

Added by डॉ. सूर्या बाली "सूरज" on December 9, 2015 at 11:30pm — 9 Comments

ज़िन्दगी - बैजनाथ शर्मा 'मिंटू'

बैजनाथ शर्मा ‘मिंटू’

अरकान -  212  212  212  212

हो के मुझसे तू ऐसे खफ़ा ज़िन्दगी |

जा बसी है कहाँ तू बता ज़िन्दगी|

 

जग को ठुकरा दिया मैंने तेरे लिए,

कर न पायी तू मुझसे वफ़ा ज़िन्दगी|

 

तेरी सूरत ही थी मेरा दर्पण सदा,

तू मिले फिर सजूँ इक दफा ज़िन्दगी|

 

तू हंसाती भी है और रुलाती भी है,

तू दिखाती है क्या क्या अदा ज़िन्दगी|

 

पहले इतना बता क्या है मेरी ख़ता,

फिर जो चाहे तू देना सज़ा…

Continue

Added by BAIJNATH SHARMA'MINTU' on December 9, 2015 at 10:33pm — 2 Comments

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