For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

December 2015 Blog Posts (159)

मार्गदर्शिका (लघुकथा) / शेख़ शहज़ाद उस्मानी (44)

"हाँ दीदी , आपने जैसा समझाया था, वैसा ही कर रही हूँ। देवरानी, जिठानी और यहाँ तक कि मेरे पति देव जी को भी पता नहीं चल पाता कि मैं सास- ससुर की कब सेवा कर उनकी पसंद की चीज़ें कब उन्हें खिला देती हूँ । पूरी पकड़ हो गई है मेरी उन पर !" - छत पर बैठे हुए उमा ने कहा।



"बढ़िया है । देवरानी और जिठानी को उनकी नज़रों में चढ़ने मत देना । सास-ससुर को यही लगना चाहिए कि तुम ही सबसे अच्छी बहू हो । कोम्पीटीशन का ज़माना है !"



"जी दीदी, अब तो आलम ये है कि सास-ससुर मेरे पति तक की नहीं सुनते,… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on December 19, 2015 at 9:15am — 7 Comments

पिज़र - लघु कथा जानकी बिष्ट वाही

" छाना बिलौरी झन दिया बौज्यू , लागला बिलौरी को घामा ." ( बेटी अपने पिता से कहती है।मेरा ब्याह छाना बिलौरी गाँव में मत करना।वहाँ की जानलेवा धूप में काम नहीं कर पाऊँगी।) गुनगुनाती हुई बसन्ती पीठ में लकड़ियों का बोझ उठाये पाले से आच्छादित रास्ते पर एक सार लय में पावँ जमा-जमा कर जंगल से नीचे उत्तर रही है।जरा सी लापरवाही उसे नीचे गरजती -उफनती काली नदी में विलीन कर देगी।



"आज़ बबा होते तो उसे ये सब क्यों करना पड़ता?" कुहासे बादलों की तरह यादें मन में घुमड़ने लगी।बबा चाहते थे बसन्ती खूब… Continue

Added by Janki wahie on December 19, 2015 at 7:16am — 6 Comments

गमख्वार समझा था मक्कार निकला- बैजनाथ शर्मा 'मिंटू'

बैजनाथ शर्मा 'मिंट'

अरकान - 122  122  122  122

गमख्वार समझा था मक्कार निकला|

जो दिखता था सज्जन गुनहगार निकला|

 

जिसे…

Continue

Added by BAIJNATH SHARMA'MINTU' on December 17, 2015 at 11:41pm — 9 Comments

हे भारत जागो !

गंगा जमुनी परंपरा को

मानव मन में झंकृत कर दो

वेद रिचाएँ महक उठे सब

मंत्रों को उच्चारित कर दो

हे! भारत जागो

 

गुंफित हो वन उपवन सारे

अवनी को शुभ अवसर दे दो

रुके पलायन गाँव गली का

हृदय में समरसता भर दो

हे! भारत जागो

 

बलिदानों के प्रतिबिम्बन में

रिश्ते फूलें खुले गगन में

छुपी हुई मंथर ज्वाला को

मानवता में मुखरित कर दो

हे! भारत जागो

 

रूप तरुण तेरा मन…

Continue

Added by kalpna mishra bajpai on December 17, 2015 at 8:44pm — 6 Comments

ख़ूबसूरती (लघु कथा ) जानकी बिष्ट वाही

विशाल प्राँगण की खूबसूरत बुलन्द इमारत की मुंढेर पर बैठा ब्लड कैंसर उदासी के साथ नीचे कड़ाके की ठण्ड में काँपते मरीज़ों के परिजनों को देख रहा है।



" इतने मायूस क्यों हो भाई ? "थके स्वर में दिल की बीमारी ने पूछा।



" बहन ! बारह साल का बच्चा अंतिम सांसें गिन रहा है। मेरे नाम एक और मौत दर्ज़ होने जा रही है।"



" ये तो यहाँ का रोज़ का ही काम है।मेरा भी दिल दुखी हो जाता है।"



तभी वहाँ किडनी की बीमारी आ गई

" मैं तो असमंजस में हूँ।अभी तक कोई डोनर नहीं मिला। न… Continue

Added by Janki wahie on December 17, 2015 at 10:50am — 11 Comments

वह रहस

आदम फितरत है

भई

राम ने आसन्न -प्रसूता

को छोड़ दिया वन में

जीने, भटकने या  मरने 

भला हो वाल्मीकि का --- I

और कुछ ऐसा ही किया

कृष्ण ने राधा के साथ

छोड़ दिया निराश्रित

जीने, भटकने या मरने I

सीता का अंत तो जानते है सभी

इसी माटी में दफ़न हुयी थी कभी

पर राधा ------?

कब तक तकती रही राह ?

भेजती रही पाती और सन्देश

फिर कहाँ गयी वह ?

कैसे हुआ उसका अंत ?

किसी ने भी याद नही रखा

लानत…

Continue

Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 16, 2015 at 7:19pm — 2 Comments

याद नहीं - कुछ अशआर

जोश-ए-वस्ल में हुजूर को, उम्र का तकाजा याद नहीं

तड़पता जिस्म, भरी आँखे, कैसे हुआ कलेजा याद नहीं

 

भूल गया था वहशी, थी फकत शरारत की इक रात

हया और ज़िल्लत-ए-ज़माना, कब उठा जनाजा याद नहीं

 

होठों पे हंसी थी उनके और आँखों में चमक झलकी थी

दफ़न ही था दर्दे-दिल फिर, कैसे हुआ अंदाजा याद नहीं

 

राह बजी जब सीटियाँ, कान बंद और नज़र झुकी रहीं  

जुनूने इश्क में जालिम ने, कब कसा शिकंजा याद नहीं

 

ज़माना क्यों नहीं देखता, मन की…

Continue

Added by Nidhi Agrawal on December 16, 2015 at 2:44pm — 5 Comments

भारत स्वच्छ बनाना है / एक कोशिश

स्वच्छता की शपथ लेकर,घर- घर अलख जगाना है

भारत स्वच्छ बनाना है, आदर्श देश बनाना है-----------

नागरिक की भागीदारी, जन-सेवा की अब तैयारी

स्वच्छता की जिम्मेदारी , जन-जन की हो भागीदारी

जन-आँदोलन स्वच्छता के , नाम पर चलाना है

भारत स्वच्छ बनाना है ,आदर्श देश बनाना है ------------------

स्वच्छता ही सम्पदा है ,बात यह तुम जान लो

सड़कों ,गलियों की सफाई ,अभियान यह ठान लो

सुव्यवस्थित शौचालय ,कचरा ठिकाने लगाना है

भारत स्वच्छ बनाना है ,आदर्श देश…

Continue

Added by kanta roy on December 16, 2015 at 1:45pm — 1 Comment

सर्द साँझ ( लघुकथा )

बेचैनी उसकी आँखों से साफ नज़र आ रही थी।उधर अमन कश्मकश भरी निगाह से कभी डॉक्टर, कभी बच्चे, तो कभी अपनी पत्नी कली को देखे जा रहे थे।

सर्दी अपने शबाब पर थी।साँझ के धुंधलके में वे दोनों खरीदारी करके लौट रहे थे तो घर के आगे भीड़ देखकर रुक गए।झाड़ियों के पास नर्म, मुलायम कम्बल से लिपटा एक नवजात शिशु पड़ा हुआ था।लोग अनर्गल प्रलाप में लगे थे पर उसे किसी ने हाथ भी न लगाया था।

" चलो,न जाने किसका पाप है " अमन ने उसकी बाँह सख्ती से पकड़ते हुए कहा।कली ने कुछ कहना चाहा पर पति के चेहरे पर कठोरता के भाव… Continue

Added by jyotsna Kapil on December 16, 2015 at 12:32pm — 4 Comments

घाव खोल कर बैठ न जाना -( ग़ज़ल )-लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

ग़ज़ल

*******

2222    2222    2222    222

********************************

आग लगाई क्या अपनों ने अरमानों के मेले में

बैठ गया जो आँसू  लेकर  मुस्कानों  के मेले में /1



कर के बहाना सब मरहम का दुखती  रग को छेड़ेंगे

घाव खोल कर  बैठ न  जाना  पहचानों  के  मेले में /2



छोड़ गए हैं अपने अकेला एक अपाहिज बोझ समझ

अब्दुल्ला  सा  मन  होता  है  अनजानों  के  मेले में /3



जब तक जेब भरी थी अपनी घर आगन सब अपना था

जेबें   खाली  तो  बदला  सब …

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 16, 2015 at 11:43am — 20 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
जाने क्यों

जाने क्यों

क्या ढूँढ़ने उतरते हो

रात के अंधेरे में ओ कोहरे,

चुपचाप, इस धरती की छाती पर

फिर अक्सर थक कर सो जाते हो

पत्तियों के ठिठुरते गात पर

और सहमी, पीली पड़ गयी

तिनके की नोक पर –

गाड़ी के शीशे से

न जाने कहाँ झाँकने की कोशिश में

चिपक जाते हो तुम,

अक्सर.

सुबह की थाप तुम्हें सुनायी नहीं देती

उद्दण्ड बालक की तरह

धरती का बिस्तर पकड़कर,

मुँह फेरकर सोये रहते हो

जब तक कि फुटपाथ पर

रात भर करवटें…

Continue

Added by sharadindu mukerji on December 16, 2015 at 2:30am — 6 Comments

धुंध [लघु कथा ]

" नानी ,आप दोनों की शादी को पचास साल के ऊपर हो गए i वाऊ "I

"और फिर भी हम दोनों खुश दिख रहे हैं ,ये ही पूछना चाह रही हो ना ?"नाना जी पीछे खड़े मुस्करा रहे थे I

"तब  ऑप्शंस  कम थे न बेटा , मोबाइल इन्टरनेट कुछ भी नहीं था ,जो माँ बाप ने ढूँढ दिया बस उसी को झेल रहे हैं I"नानी की आँखों में शैतानी थीI

"ऑप्शंस  होते तो मैडम इतनी अच्छी खिचड़ी खिलाने  वाला मिलता तुम्हे "? नानी के हाथ में गरम खिचड़ी की प्लेट थमाते नाना पास आके बैठ गएI

छःमहीने पहले जब से इस शहर में नौकरी लगी है…

Continue

Added by pratibha pande on December 15, 2015 at 11:00pm — No Comments

एक तरही गजल

2122 2122 2122 22/112



शाम लिख ले सुबह लिख ले ज़िंदगानी लिख ले

नाम अपने हुस्न के मेरी जवानी लिख ले।

कब्ल तोहमत बेवफ़ाई की लगाने से सुन

नाम मेरा है वफा की तर्जुमानी लिख ले ।

जो बनाना चाहता है खुशनुमा संसार को

अपने होंठो पे मसर्रत की कहानी लिख ले।

मंहगाई बढ़ रही है रात औ दिन चौगुनी

वादे अच्छे दिन के निकले लंतरानी लिख ले।

लाल होगी यह जमी गर इन्सानो के खूँ से

रह न जाएगा अंबर भी आसमानी लिख ले…

Continue

Added by Neeraj Neer on December 15, 2015 at 10:46pm — 16 Comments

नस्री नज़्म :- आओ सबका ग़म बाँटें

आओ सबका ग़म बाँटें,

गीतों से,कविताओं से,

ग़ज़लों से,नज़्मों से,

हल्का होगा मन का बोझ

अपने ऐसा करने से,

शायद कुछ परिवर्तन आए,

दिल की कली फिर मुस्काए,

गंगा जमुना का संगम हो,

कुछ तो रब्त-ए-बाहम हो,

सुनते हैं,ताक़त से क़लम की,

इन्क़िलाब आ जाता है

क्यूँ न फिर इस इन्क़िलाब की,

तैयारी में जुट जाऐं,

ये सब मिल जुल कर ही होगा,

आओ इस मक़सद को लेकर,

कोई ऐसा गीत रचें,

ऐसी नज़्म जो दिल को छू ले,

ऐसी कविता,जो रस घोले,

सब को अपनी… Continue

Added by Samar kabeer on December 15, 2015 at 10:24pm — 7 Comments

भौंक रहे कुत्ते (नवगीत)

हर आने जाने वाले पर

भौंक रहे कुत्ते

 

निर्बल को दौड़ा लेने में

मज़ा मिले, जब तो

क्यों ये भौंक रहे हैं, इससे

क्या मतलब इनको

 

अब हल्की सी आहट पर भी

चौंक रहे कुत्ते

 

हर गाड़ी का पीछा करते

सदा बिना मतलब

कई मिसालें बनीं, न जाने

ये सुधरेंगे कब

 

राजनीति, गौ की चरबी में

छौंक रहे कुत्ते

 

गर्मी इनसे सहन न होती

फिर भी ये हरदम

करते हरे भरे पेड़ों…

Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 15, 2015 at 9:49pm — 4 Comments

टुकड़खोर सेवादार

अइसई नहीं मिलता 

सेवादारी का ओहदा 

बड़ी कठिन परीक्षा है 

निभा ले जाना ड्यूटी सेवादारी की

हाकिम-हुक्काम तो 

कोई भी बन सकता है 

सेवादार बनना बहुत कठिन है 

सेवादार को होना चाहिए 

भाव-निरपेक्ष...संवेदनहीन 

अपने ड्यूटी-काल में 

और उसके अलावा भी 

जाने कौन सा राज़ 

कब किस हालत में फूट जाए 

और लेने के देने पड़ जाएँ 

हाकिम बना रहे 

हाकिम बचा रहे 

हुकुम सलामत रहे 

तो रोज़ी-रोटी की है गारंटी 

इतनी…

Continue

Added by anwar suhail on December 15, 2015 at 5:53pm — 2 Comments

अधजली (लघुकथा)

क्या कसूर था उसका ? मन बेबस हो ,बार - बार डायरी के पन्ने पर लिखे उसके नाम पर जाकर ठहर जाती थी। एकटक देखती जाती ,मानो नाम में उसके अक्स दिखते हों , इबारत कर रही थी वह ....! अंगुलियों को फिराते हुए सहला रही थी उन जख्मों को भी , जो वह दे गया था ।

"उमाsss ! कहाँ भावमग्न हो रही है तु ?"

"कहीं नहीं रे ? "- उसने चौंक कर डायरी बंद कर ली , शायद फिर से चोरी पकड़ी गई थी । जिगरी थी और बरसों से रूम पार्टनर भी।

"तुमने सीधी माँग काढ़ ली ? फिर से…

Continue

Added by kanta roy on December 15, 2015 at 1:00pm — 7 Comments

नई पसंद का जमाना ... (110 वीं रचना )

नई पसंद का जमाना ... (110 वीं रचना )

राम राम भाई

आज दुकान खोलने में बड़ी देर लगाई

हमने भी पड़ोसी को राम राम कहा

और अपनी नासाज़ तबियत का हवाला देते हुए

अपनी दुकान का शटर उठाया

धूप अगरबत्ति जलाकर

उसके धुऐं को दुकान और गल्ले में घुमाया

प्रभु को शीश नवाकर

अच्छी बोहनी के लिए प्रार्थना करके

धूपदानी प्रभु के आगे रखी ही थी कि

एक ग्राहक ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई

हमने चौंक कर

अपनी सुराहीदार गर्दन को

भगवान बने ग्राहक की तरफ घुमाया…

Continue

Added by Sushil Sarna on December 15, 2015 at 12:45pm — 4 Comments

गजल

गजल
*****
चैन आना मुश्किल-सा लगा है
आज रिश्ता बोझिल-सा लगा है।
पैठ करतीं बातें तीर बनकर
अंग हर अपना दिल-सा लगा है।
दर्द अपना रख लो गाँठ कर अब
तंग दिल उसका सिल-सा लगा है।
तंज कसता वह तेरी वफ़ा पे
अब रहम उसका खिल-सा लगा है।
माँगते हो तुम खैरात उससे
वह तो' मुझको बेदिल-सा लगा है।
"मौलिक व अप्रकाशित"@मनन
खिल=घाव के मवाद कीअंतिम किश्त
सिल=पत्थर

Added by Manan Kumar singh on December 15, 2015 at 8:38am — 6 Comments

अपराधी - लघु कथा ( जानकी बिष्ट वाही)

सांझी गली में सीढ़ियों के नीचे उसने अपनी गृहस्थी ज़मा ली। फ़टे- पुराने कपड़े,पुराना कम्बलऔर टूटे दो बर्तन।

धूप में बाल सुखाती, एक कॉपी में जाने क्या लिख रही थी। पूरा मोहल्ला आते-जाते कौतुहल से उसे देख रहा है।

चिथड़ों में लिपटी पगली बस स्टेशन के पास भीख मांगती थी।किसी ने उसे बोलते नहीं सुना था।छेड़ने पर पत्थर मारती थी।



"तुम ! यहाँ रहोगी ?" सुषमा ने पास जाकर पूछा।

उसने डरी -डरी आँखों से देखा कि कहीं मैं उसे दुत्कार न दूँ।फिर आश्वस्त होकर बोली -

" हाँ "

" कहाँ… Continue

Added by Janki wahie on December 14, 2015 at 4:01pm — 3 Comments

Monthly Archives

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

babitagupta replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-117
"हाइकूसघन पीरदस जन खाते हैं एक कमाता सेदोकाचिथड़े जूतेथिगड़े कपड़ों में तप्त दोपहरी में भूख मिटाने…"
2 hours ago
अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"डॉ नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है बधाई स्वीकार करें। "अपनी रानाई पे तू…"
4 hours ago
Neelam Dixit replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-117
"दोहे- रोटी रोटी की खातिर फिरे, जब बचपन लाचारखुशहाली का स्वप्न फिर, ले कैसे आकार।1। भाग दौड़ में खप…"
4 hours ago
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-117
"आदरणीय सतविन्दर कुमार राणा जी, बहुत सुंदर गज़ल कही है आपने। सुंदर सृजन के लिए बधाई।"
5 hours ago
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-117
"आभार आदरणीय दयाराम जी।"
5 hours ago
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-117
"आदरणीय सतिवन्द्र कुमार राणा जी,  प्रोत्साहन के लिए बहुत बहुत आभार।"
5 hours ago
सतविन्द्र कुमार राणा replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-117
"आदरणीय मैठाणी जी, प्रदत्त विषय पर अच्छी गजल कही है। हार्दिक बधाई"
5 hours ago
अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on रामबली गुप्ता's blog post ग़ज़ल-सफलता के शिखर पर वे खड़े हैं -रामबली गुप्ता
"जनाब रामबली गुप्ता जी आदाब, ख़ूबसूरत ग़ज़ल हुई है बधाई स्वीकार करें। सादर। "
5 hours ago
Usha Awasthi commented on Usha Awasthi's blog post क्यों ना जड़ पर चोट ?
" सादर प्रणाम, सुरेंद्र नाथ सिंह जी, उत्साह बढ़ाती टिप्पणी हेतु बहुत धन्यवाद"
7 hours ago
TEJ VEER SINGH commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"हार्दिक बधाई आदरणीय नवीन मणि  जी।बेहतरीन गज़ल। मेरा ख़त पढ़के बहुत ख़ामोश है वो…"
8 hours ago
TEJ VEER SINGH commented on Rupam kumar -'मीत''s blog post वो मेरी ज़िंदगी को सदा छोड़ क्या गया (ग़ज़ल)
"हार्दिक बधाई आदरणीय रूपम कुमार 'मीत' जी।बेहतरीन गज़ल। लगता है उसकी आंख में थोड़ा मलाल…"
8 hours ago
TEJ VEER SINGH commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post तेरे ख्वाहिशों के शह्र में- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'(गजल)
"हार्दिक बधाई आदरणीय  लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'  जी।बेहतरीन गज़ल। चाहत न कोई…"
8 hours ago

© 2020   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service