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आडंबर - लघुकथा -

मेरा बचपन का दोस्त कबीर इस बार तीन साल बाद दुबई से ईद मनाने खास तौर पर अपने देश आया था। मुझे  खाने पर बुलाया था। तीन साल पहले वह  आया था तो नया मकान बनवाया था। मैं उस समय देश से बाहर था तो नहीं जा पाया था। इस बार तो जाना ही था। दोस्तों से सुना था कि खूब कमाई कर रहा है दुबई में।

शाम को कुछ मिष्ठान, चॉकलेट और गुलाब के फूलों  का  गुलदस्ता लेकर खोजते पूछते पहुंचा तो घर का बाहरी आवरण देख कर बड़ी निराशा हाथ लगी।घर की बाहरी दीवार पर सीमेंट भी नहीं था।पानी की निकासी की  नाली  में बिजली का पोल…

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Added by TEJ VEER SINGH on August 17, 2019 at 10:00am — No Comments

सच बात तो यह

सुनो

वहम है तुमको

कि स्वर मिला स्वर में तुम्हारे.

मैं कृत -कृत हो  जाऊंगी…

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Added by amita tiwari on August 17, 2019 at 2:00am — No Comments

तिरंगे तुझे सुनानी है ....

तिरंगे तुझे सुनानी है ....

सन ४७ की रात में

आज़ादी की बात में

दर्दीले आघात में

छुपी जो एक कहानी है

तिरंगे तुझे सुनानी है

आज़ादी के शोलों में

रंग बसन्ती चोलों में

जय हिन्द के बोलों में

छुपी जो एक कहानी है

तिरंगे तुझे सुनानी है

राजगुरु सुखदेव भगत

और मंगल पण्डे लक्ष्मी बाई

गाँधी शेखर और शिवा की

छुपी जो एक कहानी है

तिरंगे तुझे सुनानी है

आज़ादी के दीवानों की

सरहद के जवानों की…

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Added by Sushil Sarna on August 16, 2019 at 6:44pm — 2 Comments

मत्तगयंद सवैया

छंद - मत्तगयंद सवैया
******************************
शिल्प= भगण×7+2 गुरु ,
23 वर्ण यति 12,11 

सावन मास रही तिथि पूनम,
क्रूर महा शिशुपाल सँहारे।

युध्द मझार उतार दिया रिपु ,
शीश सुदर्शन को कर धारे।
घायल अंगुलिका हरि रक्षति,
द्रौपदि अंबर को निज फारे।

वस्त्र हरे बलवान दुशासन,
चीर बढा हरि कर्ज उतारे।।

मौलिक व अप्रकाशित

Added by Satyanarayan Singh on August 15, 2019 at 8:07pm — No Comments

वियोग

￰मिले थे हम यूँ किनारे समंदर था पहाड़ थे ,
जीवन शैली के कुछ नए अरमान थे ,
कुछ नए पुराने से आयाम थे,
कुछ तड़प थी कुछ झड़प थी ,…
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Added by Pratibha Pandey on August 15, 2019 at 5:30pm — 2 Comments

एक ग़ज़ल । हम हैं नाकाम ऐ हम-नवा

फाइलुन फाइलुन फाइलुन
2 1 2 ,2 1 2 , 2 1 2

हम हैं नाकाम ऐ हम-नवा,
काम आई तेरी बद-दुआ ।

इश्क़ की है अभी इब्तिदा ,
यार मुझ को न तू आज़मा।

रात भर जागता रहता है,
चाँद क्यों इतना है ग़म-ज़दा ।

आखरी बार मुझ से मिलो ,
आखरी बार है इल्तिजा ।

अब नही देखता तुझ को मैं,
रायगाँ है सवरना तेरा ।
- शेख ज़ुबैर अहमद

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Shaikh Zubair on August 15, 2019 at 12:54pm — No Comments

ज़मी ये हमारी वतन ये हमारा  - सलीम 'रज़ा' रीवा

ज़मी ये हमारी वतन ये हमारा 

उजड़ने न देंगे चमन ये हमारा 

वतन के लिए जो मेरी जान जाए

ख़ुदारा यहीं  फिर जनम लें दुबारा 

 …

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Added by SALIM RAZA REWA on August 15, 2019 at 11:30am — 2 Comments

नया भारत

बरसों से जो ख्वाब थे देखे, पूरे हमने कर डाले

मंसूबे हर एक दुश्मन के, बिना सर्फ़ के धो डाले



धाराओं के जाल में, मज़लूमों का जो हक थे मार रहे

हमने ऐसी धाराओं के हर्फ वो सारे धो डाले



सदियों से जो जमी हुई थी, साफ़ नही कर पाया कोई

हमने ऐसी जमी मैल के, बर्फ वो सारे धो डाले



तीन दुकाने चलती रहती थीं, कश्मीर की घाटी में

हमने ऐसे बीन बीन कर, ज़र्फ वो सारे धो डाले



बार बार समझाया सबको, पर वो समझ नही पाए

हमने 'दीप' फ़िर मजबूरी में कम-ज़र्फ़…

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Added by प्रदीप देवीशरण भट्ट on August 15, 2019 at 9:00am — 3 Comments

लेती है इम्तिहान ये उल्फ़त कभी कभी

221 2121 1221 212

लेती है इम्तिहान ये उल्फ़त कभी. कभी ।

लगती है राहे इश्क़ में तुहमत कभी कभी ।।

आती है उसके दर से हिदायत कभी कभी ।

होती खुदा की हम पे है रहमत कभी कभी ।।

चहरे को देखना है तो नजरें बनाये रख ।

होती है बेनक़ाब सियासत कभी कभी ।।

यूँ ही नहीं हुआ है वो बेशर्म दोस्तों ।

बिकती है अच्छे दाम पे गैरत कभी कभी ।।

मुझ पर सितम से पहले ऐ क़ातिल तू सोच ले ।

देती सजा ए मौत है कुदरत कभी कभी…

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Added by Naveen Mani Tripathi on August 14, 2019 at 6:42pm — 4 Comments

भला करे कश्मीर का, संशोधित सम्विधान - दोहे ( लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर')

दोहे

***

वो तो बढ़चढ़ बाँटते, नफरत जिसका नाम

जन्नत में  सद्भावना, शेष  वतन  का  काम।१।

****

वैसे तो हम सब रहे, विविध रंग के फूल

किन्तु सूख अब हो गये, जैसे तीखे शूल।२।

****

पड़े जंग आतंक की, निसदिन जिन पर मार

उन्हें जिन्दगी फिर लगे, बोलो क्यों ना भार।३।

****

तन से तो अब देश में, बिलय हुआ कश्मीर

मन से भी जब हो  बिलय, बदलेगी तस्वीर।४।

****

बिस्थापित थे जो हुये, समझो उनकी पीर

जा पायें निज  ठाॅ॑व  वो, कश्मीरी…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 12, 2019 at 6:55am — No Comments

बरकत - लघुकथा -

बरकत - लघुकथा -

सासुजी के देहांत के पश्चात सुधा के ससुर जी गाँव से शहर आ गये थे। उनके आने से सुधा की गृहस्थी तितर बितर हो रही थी। बात बात पर ससुर जी का हस्तक्षेप सुधा को अखरता था। उसने एक दो बार सुरेंद्र से भी इस मामले में चर्चा की लेकिन उसका रवैया बिलकुल तटस्थ था। क्योंकि उसे अपने पिता की सीरत का पूरा ज्ञान था। वे अनुशासन और संस्कार के कट्ट्रर पक्षधर थे।

आज तो उन्होंने हद ही कर दी। उधर सुधा भी आर पार की स्थिति में आ गयी। बात थी तो मामूली लेकिन दोनों की ज़िद के कारण…

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Added by TEJ VEER SINGH on August 10, 2019 at 3:30pm — 10 Comments

चाँद सितारे

दिन ढला तो शाम हुई, शाम ढली तो रात,

रात जो आई तो ख़ुश हुए, चाँद और तारे हज़ार||

तारे बोले ऐ चाँद, 

तरसते रहते दिनभर, हम तेरे दीदार को,

पर सूरज भैया को कैसे धमकाएँ,

राज करते धरती और आसमान पर जो||…

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Added by Pratibha Pandey on August 9, 2019 at 5:01pm — 8 Comments

दशा (लघुकथा )

‘छी: कितने गंदे, कुत्सित और बदबूदार हो तुम I तुम्हें देखकर घिन आती है I’ नदी ने मुंह बनाते हुए नाले से कहा I

‘बुरा न मानना दीदी आजकल तुम्हारी दशा भी मुझसे अच्छी नहीं है I’ नाले ने मुस्कराते हए जवाब दिया I

(मौलिक ?अप्रकाशित )

Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on August 9, 2019 at 10:30am — 14 Comments

संबंधों का जाल

अचानक अजीब मनोदशा

अँधेरी हो रही हैं धुँधली आँखें

कुछ नहीं जानता मैं अब भँवर में

कुछ भी नहीं पहचानता हूँ अंत में

यह निसत्बध्ता, यह काया

एकाकार हो रहे हैं  क्या ?

 

साथ बंधी आ रही हैं  कभी  की

रात देर तक करी हमारी बातें

समुद्र की लहर-सी छलकती

अमृत के झरनों-सी हम दोनों की हँसी

आँखों में  ठहरे कभी के अनुच्चरित प्रश्न

पल में तुम्हारा परिचित चिंता में डूब जाना

उफ़्फ़.. इतने वर्षों के बाद भी वही है…

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Added by vijay nikore on August 8, 2019 at 6:14pm — 7 Comments

संतान (क्षणिकाएं ) ....

संतान (क्षणिकाएं ) ....

बुझ गए बुजुर्ग
करते करते
रौशन
अपने ही चिराग

.....................

कर रही
वृक्षारोपण
वृद्धाश्रम में
वृद्धों की हाथों
उनकी ही संतान

.......................

हो गया
संस्कारों का
दाहसंस्कार
मौन बिलखता रहा
कहकहों में
संतान के


सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on August 8, 2019 at 12:57pm — 6 Comments

एक ग़ज़ल इस्लाह के लिए मनोज अहसास

2×15

कोई अपना साथ न आए, हर कोशिश नाकाम लगे

मेरे पास चले आना जब, जीवन ढलती शाम लगे

इसको पिछले जन्मों का फल,कहते हैं दुनिया वाले

पेड़ बबूल के बोये फिर भी,उसके हाथों आम लगे

बिक जाने की लाचारी का,एक तजुर्बा ये भी है

जितनी ज्यादा खुद्दारी थी,उतने ही कम दाम लगे

चौथ का चांद देखने वाले,पर लगता है झूठा दोष

हमने तो पूनम को देखा फिर भी सौ इल्जाम लगे

टूटा मन है ,रोगी तन है, रिश्तों में बेगानापन

यारो कुछ…

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Added by Manoj kumar Ahsaas on August 7, 2019 at 9:13pm — 4 Comments

श्रमेव जयते

उद्मम करते जो सदा
कर्मनिष्ठ , मतिधीर
वे सम्पन्न समाज की 
रखते नींव , प्रवीर

श्रमेव जयते में सदा
जिनका है विश्वास
उनके ही श्रम विन्दु से 
ले वसुन्धरा श्वास

मेहनत भी एक साधना
नहीं कोई यह भोग
लक्ष्य केन्द्रित वृत्ति ही
बन जाए फिर योग

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Usha Awasthi on August 6, 2019 at 7:00pm — 3 Comments

अभिव्यक्ति का संत्रास ...

अभिव्यक्ति का संत्रास ...

वरण किया
आँखों ने
यादों का ताज
पूनम की रात में

होती रही स्रावित
यादें
नैन तटों से
अविरल
तन्हा बरसात में

वीचियों पर
यादों की
तैरती रही
परछाईयाँ
देर तक
तन्हा अवसाद में

कर न सके व्यक्त
अधरों से
अन्तस् के
सिसकते जज्बातों की
अव्यक्त अभिव्यक्ति का संत्रास
शाब्दिक अनुवाद में

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on August 6, 2019 at 5:06pm — 10 Comments

मैं कोई तारा नही खुर्शीद हूँ

मुझसे ना उलझे कोई ये जान ले

मैं कोई श्लाघा नही ताकीद हूँ

तेरी मंज़िल तक तुझे पहुँचाऊगाँ

मैं कोई छलिया नही मुर्शिद हूँ

हंस रहे हैं मुझपे वो ये जान…

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Added by प्रदीप देवीशरण भट्ट on August 6, 2019 at 4:30pm — 5 Comments

'देखो हिंदौस्तान फूँकता है'

2122 1212 112/22

जिस्म में पहले जान फूँकता है

बाद-अज़-जाँ अज़ान फूँकता है

सब्र कर शब गुज़र ही जाएगी

क्यों ये अपना मकान फूँकता है

अपनी नफ़रत की आग से कोई

देखो हिंदौस्तान फूँकता है

पास आकर वो गर्म साँसों से

मेरे दिल का जहान फूँकता है

आग तो सर्द हो चुकी कब की

क्यों अबस राखदान फूँकता है

हुक्म से रब के ल'अल मरयम का

देखो मुर्दे में जान फूँकता है

रोज़ आयात पढ़…

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Added by Samar kabeer on August 6, 2019 at 3:00pm — 9 Comments

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