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June 2011 Blog Posts (104)

मेरी त्रिवेनियाँ ....

 

1 . ये किसने इनके हाथ में ज़िन्दगी की कठिन किताब पकड़ा दी है 
      नुकीले सबक चुभ जाते हैं और आंसू बहता रहता है
 
      ये मजदूर माँ कब तक बच्चों से मजदूरी करवाती रहेगी !! 
 
 
2 . सोचता रहा सारा…
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Added by Veerendra Jain on June 19, 2011 at 11:46pm — 7 Comments

मुखौटों की दुनिया

मुखौटों की दुनिया

मुखौटों की दुनिया मे रहता है आदमी,

मुखौटों पर मुखौटें लगता है आदमी |

बार बार बदलकर देखता है मुखौटा,

फिर नया मुखौटा लगता है आदमी |

मुखौटों के खेल मे माहिर है आदमी,

गिरगिट को भी रंग दिखाता है आदमी |

शैतान भी लगाकर इंसानियत का मुखौटा,

आदमी को छलने को तैयार है आदमी |

मजहब के ठेकेदार भी अब लगाते है मुखौटे,

देते हैं पैगाम, बस मरता है आदमी |

लगाने लगे मुखौटे, जब देश के नेता,

मुखौटों के जाल मे, फँस गया आदमी |

जाति, धर्म… Continue

Added by dr a kirtivardhan on June 19, 2011 at 4:30pm — 1 Comment

सोमनाथ मे शिव

सोमनाथ मे शिव

--------------------

सोमनाथ मे शिव कि महिमा

अजब अनूठी हमने देखी|

जब-जब हुए आक्रमण इस पर,

भव्यता फिर से बढती देखी|

खंडन और विखंडन

प्रकृति का नियम है|

पुनः -पुनः निर्माण धारणा,

मानव कि उत्कंठा  देखी|

सोमनाथ है तीर्थ अनूठा,

सूर्य प्रथम शिव दर्शन करता,

सूर्यास्त पर भी सूर्य यहाँ,

शिव उपासना करता है|

समुद्र यहाँ पर चरण पखारे,

शिव कि महिमा गाता है|

अजब अनूठा शमा यहाँ है,

बच्चा -बच्चा शिव गाता… Continue

Added by dr a kirtivardhan on June 19, 2011 at 4:30pm — 1 Comment

---- सवाल खुदा से -----

ऐ खुदा   इस  जहाँ   में   तेरे ,

            कोई  हँसता ,कोई   रोता   क्यों ,,



इन्सान -इन्सान  सब  एक  समान  हैं  तो  फिर

            उंच -नीच   जाति-भेद  क्यों



इन्सान  तो  सब  तेरी  ही  सन्तान  हैं  फिर ,

            कोई  वारिस  कोई  लावारिस  क्यों ,,



तुने  ये  पेट  तो  सबको  दिया  हैं  फिर ,

            किसी  को  खाना  कोई  भूखा  क्यों ,,



दुनिया  में  कुछ  तेरा -मेरा  नही  फिर

            कोई  धनी कोई  गरीब  क्यों…

Continue

Added by Ajay Singh on June 19, 2011 at 11:44am — No Comments

--------एक असफलता के बाद ------

एक छोटी सी असफलता मिली तो क्या

हर बार सफलता भी जरूरी नही होती ,

सूरज कि ऊंचाई पर न पहुँच सके तो क्या

चाँद कि ऊंचाई भी तो कम नही होती ,

एक हसरत पूरी न हो पायी तो क्या हुआ

हसरतें लोगों  की क्या अधूरी नही होती ,

हंसती-हंसती आती है नजर दुनिया तो क्या

हर हंसी के पीछे भी तो ख़ुशी जरूरी नही होती,

हमारा एक पल अच्छा न गुजरा तो क्या हुआ

 हर पल तो जिन्दगी ख़ूबसूरत नही होती ,

बोलकर मुंह से हाल न बता सके तो क्या

कविता क्या बीते पलों की जुबानी नही… Continue

Added by Ajay Singh on June 19, 2011 at 11:40am — No Comments

दुनिया की सबसे छोटी कविता "एकादशी" (सिर्फ ११ अक्षर) का सूत्रपात OBO पर...

(१)          यमुना                                                                                           

निर्मल जल

खो गया

(२)

निशानी

ताज महल

प्यार की

(३)

आगरा

खुबसूरत

घूम लो

(४)

पत्थर

हुआ क्षरण

बचालो

(५)

योजना

कागज़ पर

सफल

(६)

यमुना

जल विहार

भूल जा

(७)

ओबीओ

साहित्य…

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Added by Admin on June 19, 2011 at 10:00am — 53 Comments

जाने कब के बिखर गये होते....

= ग़ज़ल =

जाने कब के बिखर गये होते.

ग़म न होता,तो मर गये होते.



काश अपने शहर में गर होते,

दिन ढले हम भी घर गये होते.



इक ख़लिश उम्र भर रही, वर्ना -

सारे नासूर भर गये होते.



दूरियाँ उनसे जो रक्खी होतीं,

क्यूँ अबस बालो-पर गये होते.



ग़र्क़ अपनी ख़ुदी ने हमको किया,

पार वरना उतर गये होते.



कुछ तो होना था इश्क़बाज़ी में,

दिल न जाते, तो सर गये होते.



बाँध रक्खा हमें तुमने, वरना

ख़्वाब…

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Added by डॉ. नमन दत्त on June 19, 2011 at 8:30am — 5 Comments

मै निराश हूँ……………….

कभी तो मेरा प्यार तुम्हे याद आयेगा ,

कभी तो तुम्हारा दिल मेरे लिए तड़पेगा ,

जैसे की आज मै तड़पता हूँ, ,

सुबह को न सही, दोपहर को न सही ,

शाम को न सही ,रात को न सही ,

अपने मिलन की कोइ घडी तो याद आएगी ?

जब कोइ तुम्हारा दिल दुखायेगा ,

तब मेरा प्यार याद आयेगा ,

कभी तो तुम्हारा दिल तड़पेगा ?

जैसे आज मै तड़पता हूँ, ,

तुम मेरे बेगैर एक पल भी नहीं रह पाते थे ,

मुझे न देखने पर बेचैन हो जाते थे ,

अब ओ प्यार कहाँ गया…

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Added by Sanjay Rajendraprasad Yadav on June 18, 2011 at 4:00pm — 4 Comments

रिश्ता-ए-गम





गम तो ग़म हैं ग़म का क्या ग़म आते जाते हैं
किसी को देते तन्हाई किसी को रुलाते हैं
दीपक 'कुल्लुवी' पत्थर दिल है लोग यह कहते हैं
उसको तो यह ग़म भी अक्सर रास आ जाते…
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Added by Deepak Sharma Kuluvi on June 18, 2011 at 1:00pm — No Comments

हम भी मुस्कुराएंगे

तुम जो कहते थे दोस्ती है,

हमने सोचा था आजमाएंगे;



तुम हमेशा आसरा दिखाते थे,

सोचा हम भी आशियाँ लुटाएंगे;



तुम किनारे पर मगर कैसे पहुंचे,

हमने सोचा था, दोनों डूब जायेंगे;



तुम जिस गली में रहते हो,

हम वहां अब गश्त न लगायेंगे;



तुम्हारा दामन पाक रहे हरदम,

हम गुनाहों का खाम्याज़ा पायेंगे;



तुमने तोड़े थे जो पेड़ों के पत्ते,

सूख गए हैं, हम उन्हें जलाएंगे;



तुम्हारी जिंदगी, जिंदगी रहे 'नीरज',

अज़ल से पर हम भी न… Continue

Added by neeraj tripathi on June 18, 2011 at 12:59pm — 2 Comments

खुशिओं के फूल

तलाशो तो दो जहाँ खुद में हैं ...

नहीं तो कायेनात भी झूठी है .. !!



भ्रम है कि खुशियाँ सामने किसी मोड़ पे खड़ी हैं

झांको ज़रा जो अपने दिल में ये कलियाँ तो वही खिली हैं



चाहते हो कोई आये और दामन मुस्कानों से भर दे ....

ज़रा गिरेबान में तो देखो ये करम तुमने कितनो पे किया है .....?



आकांक्षाएं अपेक्षाएं बहुत आसान राहें हैं दिल बहलाने कि

ज़रा इनपे उतर के तो देखो दिल से लहू निचोड़ लेती हैं



सुनते आये हैं बुजुर्गो से जो दोगे सो पाओगे

गर… Continue

Added by smriti yadein on June 17, 2011 at 11:30am — No Comments

दस्तक

आदरणीय सम्पादक जी,

सादर नमस्कार.

OBO हेतु मेरी स्वरचित,अप्रकाशित,अप्रसारित एक ताज़ा रचना आपकी सेवा में प्रेषित कर रहा हूँ.कृपया निर्णय से अवगत करावें.

भवदीय--

-- अशोक पुनमिया.

"""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""

आहट है किसी की,

कोई दस्तक दे रहा है…

Continue

Added by अशोक पुनमिया on June 16, 2011 at 5:29pm — 6 Comments

जब इच्छा हो मदिरा पी लूँ, प्रतिपग मधुशालायें है.

जब इच्छा हो मदिरा पी लूँ, प्रतिपग मधुशालायें है,

किन्तु सुलभ सुरा का पान, मन का मद भी जाये है.

 

नैनो में प्राण बसे तू ही है मनमीत मेरा,

बनके बजती तू सरगम तू ही है संगीत मेरा,

तुझको दिवास्वप्न में देखूँ , देखूँ भोर के तारों में,

तेरी काया होती निर्मित, हिम पर्वत जलधारो में,

तू ही अतिथि अंर्तमन की दूजा कोई न भाये है

कथित चहुँ लोक में कोटि आकर्षक बालायें हैं

जब इच्छा हो मदिरा पी लूँ, प्रतिपग मधुशालायें हैं

किन्तु सुलभ सुरा…

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Added by इमरान खान on June 16, 2011 at 1:33pm — No Comments

तेरी आँखों से लड़ गयीं आँखें !

तेरी आँखों से लड़ गयीं आँखें !

कितनी उलझन में पड़ गयीं आँखें !!



आँख से जब बिछड़ गयीं आँखें !

आंसुओ में जकड़ गयीं आँखें !!



तू जो आया बहार लौट आयी !

तू गया तो उजड़ गयीं आँखें !!



तेरे आने की इन्तेज़ारी में !

घर की चौखट पे जड़ गयीं आँखें !!



आज फिर ज़िक्र छिड गया उसका !

आज फिर से उमड़ गयीं आँखें !!



रौशनी… Continue

Added by Hilal Badayuni on June 15, 2011 at 10:30pm — 1 Comment

उसके लिए मैंने कई कलाम लिख दिए....

वसीयत मे इमरोज़-ओ-अय्याम लिख दिए,

उसके लिए मैंने कई कलाम लिख दिए.

 

न रंज ही होता न दर्द ओ अलम था,

वो आ गया होता तो बेज़ार कलम था,

एहसान, ये उसी के तमाम लिख दिए.

उसके लिए मैंने कई कलाम लिख दिए.

 

मेरी ख्वाहिशें मुलजिम मेरी रूह गिरफ्तार,

मशकूक कर दिया हालात ने किरदार,

झूटी दफा के दावे मिरे नाम लिख दिए,

उसके लिए मैंने कई कलाम लिख दिए.

 

लिखूं अगर ग़ज़ल तो वो जान-ए-ग़ज़ल है,

अलफ़ाज़-ओ-एहसास मे उसका ही दखल…

Continue

Added by इमरान खान on June 15, 2011 at 6:44pm — 2 Comments

व्यंग्य - बाबागिरी का कमाल

बाबागिरी का कमाल अभी चहुंओर छाया हुआ है। अब लोगों को समझ में आ गया है, गांधीगिरी में भलाई नहीं है, बल्कि बाबागिरी से ही तिजोरी भरी जा सकती है। गांधीगिरी से केवल आत्मा को संतुष्ट किया जा सकता है, मगर बाबागिरी में करोड़ों कमाए बगैर, मन की धनभूख शांत नहीं होती। जब से इस बात का खुलासा हुआ है कि देश का एक बड़ा बाबा महज कुछ बरसों में करोड़पति बन गया तथा अभी अरबों की संपत्ति का और राज खुलना बाकी है, उसके बाद तो हम जैसे लोग बाबागिरी की तिमारदारी में लगे हुए हैं। बरसों कलम खिसते रहो, लेकिन इतना तय है कि इन… Continue

Added by rajkumar sahu on June 15, 2011 at 4:37pm — No Comments

द्रोण दक्ष

जीर्ण है शीर्ण है

मंद है मलिग्न है

सोच से ओत प्रोत

सुस्त है

त्रस्त है

दुर्भिन है

दुर्भिक्ष है

अकाल जब

समक्ष है

कम्पशील

अशील

देह आज

प्राणहीन

रूपविहीन

रिक्त रिक्त कक्ष है

भयतीत

अन्तशील

शिला सम

भारी तन

पंख प्राण

पवन मन

घोर घोर घुर्र घुर्र

अंधकार

तेज़ रार

दीघर कृष्ण पक्ष है

अति दूर

स्वप्न पथ

डगर डगर

अग्नि पथ

समेट… Continue

Added by Raj on June 15, 2011 at 2:00pm — No Comments

नवगीत/दोहा गीत: पलाश... संजीव वर्मा 'सलिल'

नवगीत/दोहा गीत:

पलाश...

संजीव वर्मा 'सलिल'

*

बाधा-संकट हँसकर झेलो

मत हो कभी हताश.

वीराने में खिल मुस्काकर

कहता यही पलाश...

*

समझौते करिए नहीं,

तजें नहीं सिद्धांत.

सब उसके सेवक सखे!

जो है सबका कांत..

परिवर्तन ही ज़िंदगी,

मत हो जड़-उद्भ्रांत.

आपद संकट में रहो-

सदा संतुलित-शांत..

 

शिवा चेतना रहित बने शिव

केवल जड़-शव लाश.

वीराने में खिल मुस्काकर

कहता…

Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on June 15, 2011 at 1:23pm — 2 Comments

टेसू तुम क्यों लाल हुए......संजीव वर्मा 'सलिल'

नवगीत:-

टेसू तुम क्यों लाल हुए?

संजीव वर्मा 'सलिल'

*

टेसू तुम क्यों लाल हुए?

फर्क न कोई तुमको पड़ता

चाहे कोई तुम्हें छुए.....

*

आह कुटी की तुम्हें लगी क्या?

उजड़े दीन-गरीब.

मीरां को विष, ईसा को

इंसान चढ़ाये सलीब.

आदम का आदम ही है क्यों

रहा बिगाड़ नसीब?

नहीं किसी को रोटी

कोई खाए मालपुए...

*

खून बहाया सुर-असुरों ने.

ओबामा-ओसामा ने.

रिश्ते-नातों चचा-भतीजों…

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Added by sanjiv verma 'salil' on June 15, 2011 at 1:00pm — 4 Comments

पिता जी से सुनी एक कहानी.

पिता जी से सुनी एक कहानी.

 

प्राचीन काल में एक ब्रह्मण देवता थे जो अपनी पत्नी से बहुत प्रेम करते थे.एक दिन वे गंगा स्नान के लिए जा रहे थे , रास्ते में एक गिद्धिनी मिली जो गर्भिणी थी .उसने ब्राह्मण से कहा कृपया मेरा एक उपकार कर दीजिये. गंगा किनारे गिद्धराज एकांत में बैठे होंगें जो मेरे पति हैं, उनसे कह दीजियेगा की आपकी पत्नी आदमी का मांस खाना चाहती है. ब्राह्मण ने देखा गंगा किनारे बहुत सरे गिद्ध बैठे हुए हैं उसमें एक…

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Added by R N Tiwari on June 15, 2011 at 9:18am — No Comments

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