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March 2017 Blog Posts (106)

मैंने तन्हाई को भी पाला है। गजल

बह्र:- 2122-1212-22

जिसके तलवे में निकला छाला है।।
घर उसी हौसले ने पाला है।।।

पहले टूटा तिरा वही रिश्ता।
नौ महीने जिसे सभाला है।।

बाद मुद्दत के आज लौटी हो।
मौत कितना तुम्हे खंगाला है।।

मुश्क!.. ये ऐतबार देती है।
दिल नही जी जेहन भीआला है।।

साथ मेरे ही लौट आती है।
मैंने तन्हाई को भी पाला है।।

अप्रकाशित/ मौलिक
आमोद बिन्दौरी

Added by amod shrivastav (bindouri) on March 3, 2017 at 9:30am — 8 Comments

फागुनी हाइकु

1.

आया फागुन
भँवरों की गुंँजार
छाई बहार ।

.
2.

मन मयूर
पलाश हुआ मस्त
भँवरें व्यस्त ।

.
3.

रंगों की छटा
मस्ती भरी उमंग
थिरके अंग ।


4.

आम बौराए
उड़ा गुलाबी रंग
है हुड़दंग ।


5.

दिशा बेहाल
फूलों उड़ी सुगंध
बने संबंध ।

.
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Mohammed Arif on March 1, 2017 at 7:00pm — 12 Comments

ग़ज़ल नूर की : इश्क़ हुआ है क्या?

22. 22. 22. 22. 22. 22. 2



तन्हा शाम बिताते हो
तुम, इश्क़ हुआ है क्या?

मंज़र में खो जाते हो तुम, इश्क़ हुआ है क्या?

.

बारिश से पहले बादल पर अपनी आँखों से,

कोई अक्स बनाते हो तुम, इश्क़ हुआ है क्या?



ज़िक्र किसी का आये तो फूलों से खिलते हो,

शर्माते सकुचाते हो तुम, इश्क़ हुआ है क्या?

.

होटों पर मुस्कान बिना कारण आ जाती है,

बेकारण झुँझलाते हो तुम, इश्क़ हुआ है क्या?-…

Continue

Added by Nilesh Shevgaonkar on March 1, 2017 at 7:00pm — 12 Comments

अनबहा समंदर ....

अनबहा समंदर ....

थी

गीली

तुम्हारी भी

आंखें



थी

गीली

हमारी भी

आंखें



बस

फ़र्क ये रहा

कि तुमने कह दी

अपने दिल की बात

हम पर गिरा के

जज़्बातों से लबरेज़

लावे सा गर्म

एक आंसू

और

हमें

न मिल सका

वक़्ते रुख़सत से

एक लम्हा

अपने जज़्बात

चश्म से

बयाँ करने का

चल दिए

अफ़सुर्दा सी आँखों में समेटे

जज़्बातों का

अनबहा

समंदर

सुशील सरना…

Continue

Added by Sushil Sarna on March 1, 2017 at 1:05pm — 8 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
चुगलियाँ कर बैठी आँखें और हैरानी मेरी (ग़ज़ल 'राज'

२१२२ २१२२ २१२२ २१२

कितने रिश्ते तोड़ आई तल्ख़ मनमानी मेरी

क्यूँ गवारा हो किसी को अब परेशानी मेरी

 

शमअ के पहलू में रख कर जान  परवाना  कहे

इक कहानी खुद लिखेगी अब ये कुर्बानी मेरी

 

रूबरू आये तो धोका दे गया मेरा नकाब

चुगलियाँ कर बैठी आँखें और हैरानी मेरी  

 

टांक दो दिलकश सितारे कहकशाँ से तोड़कर

बोलती है अब्र से देखो चुनर धानी मेरी

 

शह्र भर में कू ब कू तक हो गई रुस्वाइयाँ

कर गई बर्बाद मुझको…

Continue

Added by rajesh kumari on March 1, 2017 at 11:30am — 24 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
जो अपने ख्वाब के लिए जाँ से गुज़र गए

221 2121 1221 212

.

जो अपने ख्वाब के लिए जाँ से गुज़र गए

खुद ख़्वाब बनके सबके दिलों में उतर गए

 

थोड़ा असर था वक्त का थोड़ी मेरी शिकस्त

जो ज़ीस्त से जु़ड़े थे वो अहसास मर गए

 

रिश्तों पे चढ़ गया है मुलम्मा फ़रेब का

अब जाने रंग कुदरती सारे किधर गए

 

ये सोच ही रहा था कि मैं क्या नया लिखूँ

फिर से वही चराग़ वरक़ पर उभर गए

 

बिखरे हुए थे दर्द तुम्हारी किताब में

दिल से गुज़र के वो मेरी आँखों…

Continue

Added by शिज्जु "शकूर" on March 1, 2017 at 10:30am — 8 Comments

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